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Saturday, February 26, 2011

जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न: मानव व्यव्हार दर्शन में अध्यायों का जो क्रम है, उस क्रम का निर्धारण आपने कैसे किया?

उत्तर: जिस क्रम में मैंने अनुभव किया था, उस क्रम में प्रस्तुत किया है।

प्रश्न: मानव व्यव्हार दर्शन के पहले अध्याय में - “मैं नित्य, सत्य, शुद्ध एवं बुद्ध परमात्मा रुपी व्यापक सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति को अनुभव पूर्वक स्मरण करते हुए मानव व्यवहार दर्शन का विश्लेषण करता हूँ।” - इसमें “मैं” संज्ञा से कौन इंगित है.

उत्तर: इसको लिखने वाला। लिखने वाला मानव है। तात्विक रूप में “मैं” आत्मा है. व्यव्हार रूप में “मैं” शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव है। “ मैं” यह एक मानव-संतान के रूप में लिखा हूँ – न कि केवल जीवन के रूप में। अनुभव मूलक विधि से अनुभव का व्यवस्था के अर्थ में चिंतन-चित्रण करते हुए यह प्रस्तुत है। अनुभव मूलक विधि से चित्रण जो करते हैं, उसका स्मरण रहता है।

इस एक वाक्य में पूरे मानव व्यव्हार दर्शन का सार है। सहअस्तित्व में कोई दबाव या परेशानी नहीं है – इसलिए सहअस्तित्व सुखप्रद है. सारी समस्याएं मानव की अहमता वश कल्पित विधि से हैं। सहअस्तित्व में समस्या का अत्याभाव है, समाधान की सम्पूर्णता है – सुखप्रद नहीं होगा तो क्या होगा? सहअस्तित्व को भुलावा दिए बिना, स्वयम को धोखा दिए बिना मानव समस्या पैदा ही नहीं कर सकता। समाधान सहअस्तित्व विधि से ही आता है। दूसरी किसी विधि से समाधान आने वाला नहीं है. स्वयं का अध्ययन नहीं हो पाना ही स्वयम के साथ धोखा है।

मानव को व्यापक-वस्तु चेतना के रूप में प्राप्त है। चेतना के बिना मानव है ही नहीं. मानव शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में है। मानव-संज्ञा जब तक है तब तक चेतना को प्रकट करता ही रहता है। चेतना के चार स्तर हैं – जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। इसमें से जीव-चेतना में मानव जी चुका है, समस्या को पैदा कर चुका है। यह प्रस्ताव मानव-चेतना, देव-चेतना, दिव्य-चेतना में जीने के लिए है। जीने की आशा के रूप में जीव-चेतना है। अनुभवमूलक विचार के रूप में मानव-चेतना है। अनुभवमूलक बोध के रूप में देव-चेतना है। अनुभवमूलक प्रमाण के रूप में दिव्य-चेतना है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, अमरकंटक)

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