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Thursday, February 17, 2011

प्रत्यक्ष और प्रमाण

प्रमाण का स्वरूप है - अनुभव प्रमाण, व्यवहार प्रमाण, प्रयोग प्रमाण

अनुभव में यदि सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान होता है तो अनुभव-प्रमाण है – अन्यथा कोई अनुभव-प्रमाण नहीं है।

व्यव्हार में न्याय होता है तो व्यव्हार-प्रमाण है – अन्यथा कोई व्यव्हार-प्रमाण नहीं है।

प्रयोग में यदि उत्पादन यदि पूरा होता है तो प्रयोग-प्रमाण है – अन्यथा कोई प्रयोग-प्रमाण नहीं है।

प्रश्न: “प्रत्यक्ष” क्या है?

उत्तर: सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति प्रत्यक्ष है। इसको प्रत्यक्ष नहीं मानेंगे तो किसको प्रत्यक्ष मानेंगे? “सत्ता में जड़-चैतन्य प्रकृति प्रत्यक्ष है” – इस बात को प्रमाणित करने वाला मानव ही है, और कोई इसको प्रमाणित नहीं करेगा।

प्रश्न: “प्रमाण” क्या है?

उत्तर: जो परंपरा में आता है, वही प्रमाण होगा। जो परंपरा में नहीं आता है, वह प्रमाण कहाँ हुआ? प्रमाण की ही परंपरा होगी।

मानव जीव-जानवरों जैसे चार विषयों को पहचानने से ही शुरुआत किया। फिर पाँच संवेदनाओं को पहचानने तक पहुँच गया। संवेदनाओं को पहचानने के आधार पर ही विज्ञान ने यंत्र को प्रमाण मान लिया है। मानव जितना अच्छा देख सकता है, उससे ज्यादा अच्छा यंत्र देख सकता है – इसलिए यंत्र प्रमाण है। मानव जितना याद रख सकता है, उससे ज्यादा अच्छा यंत्र याद रख सकता है – इसलिए यंत्र प्रमाण है। मानव जितना जोर से चिल्ला पाता है, उससे ज्यादा जोर से यंत्र चिल्ला सकता है – इसलिए यंत्र प्रमाण है। सभी यंत्र संवेदनाओं की परिकल्पनाओं को विस्तार देने के अर्थ में ही बने हैं। विज्ञान ने यंत्र को प्रामाणिक माना, मानव को प्रामाणिक नहीं माना। इस तरह विज्ञान ने मानव के अध्ययन को छोड़ दिया। जबकि यंत्रवत कोई मानव जीता नहीं है।

प्रश्न: विज्ञान में जैसे निरीक्षण-परीक्षण-सर्वेक्षण करते हैं, और मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन में जैसे निरीक्षण-परीक्षण-सर्वेक्षण करते हैं – उनमे क्या अंतर है?

उत्तर: विज्ञान में निरीक्षण-परीक्षण-सर्वेक्षण केवल “करने” के लिए है। यहाँ निरीक्षण-परीक्षण-सर्वेक्षण “समझने” के लिए है, “जीने” के लिए है। जीवन में जो समझ आता है, वही जीने में प्रमाणित होता है। इसकी ज़रूरत है या नहीं?

हर मानव समझना चाहता है, और समझदारी की पराकाष्ठा तक पहुंचना चाहता है। यह आधार है – इस प्रस्ताव के प्रमाणित होने के लिए।

प्रश्न: “अनुभव ही प्रत्यक्ष” से क्या आशय है?

उत्तर: पदार्थ-अवस्था में "रूप" प्रत्यक्ष है। प्राण-अवस्था में "गुण" प्रत्यक्ष है। जीव-अवस्था में "स्व-भाव" प्रत्यक्ष है। ज्ञान-अवस्था के मानव में समझ ("अनुभव") ही प्रत्यक्ष है। मानव में जो ज्ञान है वह प्रत्यक्ष होने से ही मानव की पहचान हुई, नहीं तो मानव की पहचान कहाँ हुआ? मैं क्या ज्ञान से संपन्न हूँ, यह आपको समझ में आता है तो आप मुझे पहचाने। वह समझदारी जब आप का स्वत्व बनता है तो आप अन्य के लिए प्रत्यक्ष हुए। इस तरह ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में अंतरित होता है। अभी तक (आदर्शवादी या भौतिकवादी विचार में) ज्ञान समझ में न आने से, “ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे में अंतरित हो सकता है” – यह माना ही नहीं! जबकि यहाँ हम कह रहे हैं – तदाकार-तद्रूप विधि से ज्ञान एक से दूसरे में अंतरित होता है। तदाकार-तद्रूप होने के लिए हर व्यक्ति के पास कल्पनाशीलता है।

ज्ञान का प्रत्यक्ष होना = मानव द्वारा अपने कार्य-व्यव्हार में प्रमाणित होना। कार्य-व्यव्हार में प्रमाणित होना = समाधान-समृद्धि स्वरूप में जीना। “ मैं समझा हूँ” - इसको जांचने का आधार मेरे अपने कार्य-व्यव्हार में ही है।

जीवन का प्रत्यक्ष होना ज्ञान के प्रत्यक्ष होने से ही है. दूसरी कोई विधि से जीवन प्रत्यक्ष होता नहीं है। ज्ञान-विधि से (कार्य-व्यव्हार में प्रमाणित होने से, समाधान-समृद्धि स्वरूप में जीने से) जीवन के होने-रहने का प्रमाण मिलता है।

प्रमाण को लेकर यहाँ जो कहा जा रहा है – वह रहस्य मूलक आदर्शवाद और अनिश्चयता मूलक भौतिकवाद (विज्ञान) से बिलकुल भिन्न बात है। इसको कैसे संसार के सम्मुख प्रस्तुत करना है – उसमे ऊल-जलूल कुछ नहीं चलता है, perfection ही चलता है. विज्ञान-संसार को यदि यह बात रमती है तो उसका काया-कल्प होगा।

प्रश्न: आपने संयम में यह सब देखा/समझा – इसका क्या “प्रमाण” है?

उत्तर: मेरा अपने जैसा दूसरे को बना देना ही इसका प्रमाण है। मेरा प्रत्यक्ष होना ही इसका प्रमाण है। मेरा समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना ही इसका प्रमाण है। ये तीनो मौलिक बातें हैं। इसकी ज़रूरत है या नहीं – इसको पहले तय करो! जरूरत नहीं है - तो इससे दूर ही रहो। जरूरत है - तो इसको समझो! मेरे अकेले के मेहनत करने से सबका काम चल जाएगा – ऐसा नहीं है। सबको नाक रगड़ना ही पड़ेगा। नहीं तो आपका “नाक” ही अडेगा! “नाक अड़ने” से आशय है – अहंकार। अहंकार से ही अटके हैं।

आदर्शवाद ने भी अहंकार को लेकर बहुत कुछ कहा है। उसमे सत्य उनको कुछ भासा होगा – तभी उन्होंने ऐसा कहा है। वे प्रमाणित नहीं हो पाए, रहस्य में फंस गए – वह दूसरी बात है।

मध्यस्थ-दर्शन के प्रस्ताव की शुरुआत ही यहाँ से है – “मैं समझ गया हूँ, मेरी समझ दूसरे में अंतरित हो सकती है”। किसको समझाओगे? जो समझना चाहते हैं, उनको समझायेंगे। ऐसे शुरुआत हुआ। दूसरा लहर शुरू हुआ – शिक्षकों को समझायेंगे। तीसरा लहर शुरू हुआ – अभिभावकों को समझायेंगे। शिक्षक समझ कर स्वयं बच्चों और अभिभावकों को समझायेंगे – ऐसा मैं मान कर चल रहा हूँ।

-  श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, अमरकंटक)

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