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Wednesday, October 6, 2010

व्यवस्था का मूल स्वरूप

परमाणु-अंश में आचरण निश्चित नहीं होता। किसी गठन से पृथक होने पर परमाणु-अंश किसी एक तरह का आचरण नहीं करता, उसका आचरण बदलता रहता है। गठन से पृथक परमाणु-अंश अस्तित्व में बहुत कम मिलते हैं।

परमाणु-अंश में व्यवस्था में होने की अपेक्षा है। परमाणु-अंश में व्यवस्था का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता।

व्यवस्था के स्वरूप की शुरुआत दो अंश के परमाणु से है। परमाणु व्यवस्था का आधार है - इसीलिये आगे अवस्था का भ्रूण तैयार कर दिया, स्वयं के यौगिक स्वरूप में प्रवृत्त होने के स्वरूप में। सहअस्तित्व नित्य प्रगटनशील है, इसलिए यह प्रगटन है।

यौगिक-क्रियाओं के बाद प्राण-कोशाओं का प्रगटन है - जिनमे सांस लेने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। प्राण-कोशाओं में निहित प्राण-सूत्रों में रचना-विधि में उत्तरोत्तर विकास के आधार पर अनंत रचनाएं तैयार हो गयी। जिसके फलस्वरूप स्वेदज, अंडज, पिंडज संसार का प्रगटन हो गया। इस प्रकार अनंत रचनाओं को हम देख पाते हैं, उनमें से एक मनुष्य-शरीर रचना भी है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)

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