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Monday, July 29, 2019

निराकार और साकार



साकार और निराकार की बहुत चर्चाएं हुई हैं.  यह सम्माननीय तर्क भी है, विचार भी है.  इसका समाधान भी उतना ही सम्मान करने योग्य है.  अस्तित्व को यदि समझना है तो यह ध्यान देना आवश्यक है कि साकार और निराकार अलग-अलग होता नहीं है.  हमारा अभी तक का प्राणसंकट रहा है कि साकार और निराकार अलग-अलग है.  हमारे पूर्वज (आदर्शवाद) बताये - साकार अलग चीज़ है, निराकार अलग चीज़ है.  इसको मैंने पाया - "साकार और निराकार सदा-सदा साथ ही रहते हैं."  यदि यह हमें अच्छे से समझ में आता है तो इसमें ९९% समस्याओं का समाधान है.  मैंने इसको लिखा है - "सहअस्तित्व नित्य वर्तमान है.  साकार वस्तु के बिना निराकार वस्तु का पहचान नहीं है, निराकार के बिना साकार वस्तु में ऊर्जा सम्पन्नता का स्त्रोत नहीं है."  इससे ज्यादा क्या शब्दों में लिखा भी जा सकता है?  इससे ज्यादा क्या लिखना भी चाहिए?


निराकार और साकार साथ-साथ रहने के आधार पर हम निराकार को भी पहचानते हैं, साकार को भी पहचानते हैं.  यदि ये दोनों साथ-साथ न हों तो दोनों की पहचान नहीं हो सकती.  इसकी गवाही है - साकार को विज्ञानी जो पहचानने गए, पहचान नहीं पाए.  निराकार को ज्ञानी जो पहचानने गए, पहचान नहीं पाए.  इस धरती के ७०० करोड़ आदमी के सामने यह गवाहित हो चुका है.  और इस तरह सिर कूटना हो तो कूट लें!

विज्ञानी साकार को लेकर सत्य को खोजना शुरू किया, ज्ञानी निराकार को लेकर सत्य को खोजना शुरू किया.  दोनों खोजते रह गए, पराभावित हो चुके.  सत्य का अता-पता नहीं चला.  आज तक कोई विज्ञानी यह कहने योग्य नहीं है कि यह सत्य है.  कोई भी ज्ञानी इस धरती पर नहीं है जो सत्य को प्रमाणित करने के योग्य हो.  इस धरती पर तो नहीं है.  यह मैं अपनी जिम्मेदारी से कह रहा हूँ.  इसको मैं अच्छी तरह से जांच चुका हूँ.  मेरे ज्ञान पटल पर गुजर चुका है धरती का मानव.  मेरे चित्रमाला में न आया हो ऐसा कोई घटिया आदमी नहीं, ऐसा कोई बढ़िया आदमी नहीं.  सबको मैं देख चुका हूँ.  समाधि-संयम जो मैंने किया उसका यदि कोई त्राण-प्राण है, तो वह यही है.

ऐसा समीक्षित होने पर मेरे प्रस्तुत होने का ताकत बढ़ी.  इस प्रस्ताव को हम "विकल्प" स्वरूप में रख सकते हैं - यह ताकत बनी.  आज के संसार के सामने "यह विकल्प है" - ऐसा प्रस्तुत कर देना आसान तो नहीं है.  यह महत पुण्य का प्रताप ही है.  इसको मैंने लिखा है - "मानव पुण्य के आधार पर यह घटित हुआ है."  मानव पुण्य इतना विकसित हो चुका है - इसीलिये इस विकल्प के प्रकटन होने की घटना घटित हुई.

निष्कर्ष यह निकला:  अनिश्चित लक्ष्य के लिए की गई साधना करके इस उपलब्धि (मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना) को हम प्रमाणित करेंगे - ऐसा कभी हो ही नहीं सकता.

अनिश्चित लक्ष्य के लिए साधना के लिए मैं कोई उपदेश दे नहीं पाऊंगा.  मैं यह ठोक-बजाऊ विधि से अवश्य कहूँगा - पूरा का पूरा सच्चाई को मैं शब्द स्वरूप में प्रस्तुत किया हूँ, वह आपके लिए सूचना है.  सूचना के आधार पर आपमें जिज्ञासा होता है तो हम आपको अध्ययन करायेंगे.  अध्ययन पूर्वक आपको सत्य बोध करायेंगे.  बोध कराने पर आपमें उसको प्रमाणित करने का तीव्र संकल्प होगा, फलस्वरूप वह अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित होगा.  इसको मैं देखा हूँ - यह सभी मनुष्यों के साथ रखी सम्भावना है.  यह सम्भावना ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी तीनो में समान रूप से है.  जो जितना confusion में है उसको उतना ज्यादा ध्यान देना होगा.  IIT जैसे सर्वोच्च कहलाने वाले संस्थानों में मैंने देखा - वे जितना पढ़े हैं, उतना उनमे confusion है, निर्णय ले पाने में असमर्थता है.  जितना ज्यादा पढ़ा उनका उतना मानसिक रूप में टुकड़ा बना रहता है.

प्रश्न:  क्या ईश्वर साकार स्वरूप भी है और क्या उसका साक्षात्कार संभव है, जैसा आपको बनारस में साधना के दौरान (समाधि-संयम से पहले) हुआ?

उत्तर: यदि कोई साक्षात्कार हुआ होगा तो वह "साकार" होना ही होगा.  साक्षात्कार प्रकृति का ही होता है.  प्रकृति का आकार बनाना हमारा मानसिक कला है.  वह कला हमारे मन में बनता है और बिगड़ता भी है.  मुझ में वह थोड़ा ज्यादा देर तक रह गया - इसलिए उसको साक्षात्कार माना.  इसमें किसको क्या तकलीफ है?  मनाकार स्थिर होने से उसको हम साक्षात्कार मानते हैं.  मनाकार स्थिर नहीं होने से हम साक्षात्कार नहीं मानते हैं.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (२००५, रायपुर)

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