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Friday, June 29, 2018

अनुसन्धान और शोध



जागृति के प्रमाणीकरण तक पहुँचने के दो रास्ते हैं: -

(१) जागृत व्यक्ति का अनुसरण-अनुकरण --> अध्ययन --> प्रमाणीकरण
(२) परंपरा में जो उपलब्ध है उसका शोध --> परंपरा की रिक्तता का पता लगना --> अनुसंधान --> प्रमाणीकरण

अनुसन्धान हर व्यक्ति करेगा नहीं, इसलिए वह रास्ता हर व्यक्ति के बलबूते नहीं है.  अध्ययन वाला रास्ता हर व्यक्ति के बलबूते का है.

प्रस्ताव को ज्यूँ का त्यूँ ग्रहण किये बिना अध्ययन होता नहीं है.  इसमें अपनी कल्पना से कुछ और लगाने से गुड़-गोबर ही होता है.

परंपरा में जो नहीं रहा किन्तु उसकी अपेक्षा रही, उस अपेक्षा के अर्थ में अनुसंधान होता है.  परंपरा में जिसकी अपेक्षा ही नहीं है तो काहे के लिए कोई अनुसंधान करेगा? 

प्रश्न:  लेकिन मनुष्य है तो उसमें अपेक्षा होगी ही न?

उत्तर:  वही कह रहे हैं.  मनुष्य में अपेक्षा रही, परम्परा में उस अपेक्षा को पूरा करने का प्रावधान नहीं रहा, इसकी पीड़ा होने से मनुष्य अनुसंधान करता है.  अनुसंधान बिरला व्यक्ति ही करता है, सामान्य आदमी नहीं करता.  परंपरा में क्या रिक्तता है उसको शोध करके पता लगाना सामान्य आदमी का काम नहीं है.  सामान्य आदमी तो जो परंपरा में होता है उसी को लेकर चल देता है, चलके वह कहीं न कहीं कुंठित होता है, निराशित होता है, या आशित होता है - जो अनिश्चित है.

प्रश्न:  सामान्य आदमी जो परंपरा में है उसी को मान के क्यों चल देता है?

उत्तर:  सामान्यतः आदमी सुगमता चाहता है, दुर्गमता नहीं चाहता.  जीव चेतना में ऐसा ही है.  जीव चेतना में जीता हुआ आदमी सामान्यतः जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता है.  जैसे - हाथी अपना पेट भरता है, पर पेट भरने के लिए वस्तु को पैदा करने की जिम्मेदारी नहीं लेता.  चींटी अपना पेट भरता है पर शक्कर बनाने की जिम्मेदारी उसका नहीं है.  ऐसे ही जीव चेतना में जीता हुआ आदमी अपनी जिम्मेदारी से बुचका हुआ है.  जीव चेतना में आदमी सोचता है - हमारा पेट भरने में जानवरों जैसी सुगमता हो जाए!  मानव चेतना में जिम्मेदारी लिए बिना आदमी एक कौर खाना नहीं खा सकता!  जमीन-आसमान का फर्क है दोनों में!  इसको मैं स्वयं अनुभव करके चला आया हूँ.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अमरकंटक)

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