व्यापक वस्तु में प्रत्येक एक वस्तु अविभाज्य है. प्रत्येक एक ऊर्जा संपन्न है, चेतना संपन्न है, ज्ञान संपन्न है. व्यापक वस्तु रासायनिक भौतिक संसार में ऊर्जा, जीव संसार में चेतना और मानव संसार में ज्ञान स्वरूप में प्राप्त है. रासायनिक भौतिक संसार कोई गलती करते नहीं हैं, जीव संसार कोई गलती करते नहीं हैं, मानव तमाम गलती करता है. मानव ज्ञान स्वरूप में जीने का अवसर पाया किन्तु जीवों के सदृश जीने गया. मानव द्वारा जीवन और शरीर के भेद को पहचानना, जीवन की आवश्यकता को पूरा करना, शरीर की आवश्यकता को पूरा करना। जीवन के लिए समाधान चाहिए, न्याय चाहिए, सत्य में अनुभूत रहना चाहिए - इनको पूरा करते हुए जी पाते हैं तो मानव जिया, नहीं तो जीव जिया। जैसा जीना हो जी लो.
व्यापक वस्तु और एक-एक वस्तु है - यह पहला सिद्धांत है. व्यापक वस्तु में एक-एक वस्तु डूबा-भीगा-घिरा है - यह दूसरा सिद्धांत है. ऊर्जा सम्पन्नता, चेतना सम्पन्नता, ज्ञान सम्पन्नता - यह तीसरा सिद्धांत है. मानव ज्ञान सम्पन्नता को प्रमाणित करता है - यह चौथा सिद्धांत है. मानव में ही संज्ञानीयता पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहते हैं - यह पांचवा सिद्धांत है. यह सन्देश सभी भाषाओं में दौड़ने की आवश्यकता अब आ गयी है. सभी भाषाओं में इस प्रस्ताव को ले जाने का आधार है - हर भाषा को कारण-गुण-गणित के संयुक्त रूप में पहचानना। सभी भाषा वालों में समझदारी को लेकर समानता है. हर भाषा में परिभाषाएं होंगी। परिभाषा के आधार पर हर भाषा में दर्शन, वाद, शास्त्र प्रकट होंगे और व्यवस्था को व्याख्यायित करने के लिए संविधान होगा। समझदारी को स्पष्ट करने के लिए दर्शन, जीने की विधि को स्पष्ट करने के लिए वाद और शास्त्र।
इन सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है, लोग सहमत होते हैं, कोई कोई involve भी होते हैं - यह तो आ गया. प्रतिबद्ध होने के बाद कोई-कोई जी पा रहे हैं, कोई-कोई नहीं जी पा रहे हैं - यह भी आ गया. इस प्रस्ताव के प्रभाव को यहाँ तक तो शोध कर लिया है. अब ज्यादा लोग और सभी लोग कैसे involve होंगे, इस बारे में काम हो सकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)