"स्वयं के लिए मूल्याँकन : जीवन तृप्ति के लिए काम कर रहे हैं या शरीर तृप्ति के लिए काम कर रहे हैं? जीवन संतुष्टि के लिए न्याय की आवश्यकता और उपयोगिता स्पष्ट है. यह जागृति या अनुभूति पूर्वक ही सफल है. जीवन संतुष्टि में ही जीवन मूल्य प्रभावित होते हैं अथवा जीवन संतुष्टि का प्रभाव ही जीवन मूल्य है. जीवन संतुष्टि ही व्यवहार व व्यवसाय में परावर्तित होता है और फलस्वरूप परिवार, समाज, परस्परता में तृप्ति व व्यवस्था तथा प्रकृति में संतुलन घटित होता है. व्यव्हार में न्याय, व्यवसाय में विनिमय सुलभता, समाज में न्याय पूर्ण व्यवस्था ही संतुष्टि का अथा से इति है." - श्री ए नागराज
This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
Tuesday, March 1, 2016
स्वयं के लिए मूल्याँकन
"स्वयं के लिए मूल्याँकन : जीवन तृप्ति के लिए काम कर रहे हैं या शरीर तृप्ति के लिए काम कर रहे हैं? जीवन संतुष्टि के लिए न्याय की आवश्यकता और उपयोगिता स्पष्ट है. यह जागृति या अनुभूति पूर्वक ही सफल है. जीवन संतुष्टि में ही जीवन मूल्य प्रभावित होते हैं अथवा जीवन संतुष्टि का प्रभाव ही जीवन मूल्य है. जीवन संतुष्टि ही व्यवहार व व्यवसाय में परावर्तित होता है और फलस्वरूप परिवार, समाज, परस्परता में तृप्ति व व्यवस्था तथा प्रकृति में संतुलन घटित होता है. व्यव्हार में न्याय, व्यवसाय में विनिमय सुलभता, समाज में न्याय पूर्ण व्यवस्था ही संतुष्टि का अथा से इति है." - श्री ए नागराज
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