Wednesday, July 4, 2012

तृप्ति की अपेक्षा

  

सर्व मानव में तृप्ति की अपेक्षा है पर तृप्ति बिंदु मिला नहीं है।  अभी मानव न्याय की अपेक्षा में ही अपराध करता है, शान्ति की अपेक्षा में ही युद्ध करता है। न्याय और शान्ति उससे मिला नहीं.  उसका कारण है, मानव में जो कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता है, उसके तृप्ति-बिंदु का न मिलना।  अभी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता संग्रह-सुविधा से तृप्ति पाने में व्यस्त है।  जबकि संग्रह-सुविधा का कोई तृप्ति बिंदु होता नहीं है।

तृप्ति के लिए स्वयं में विश्वास होना आवश्यक है।  स्वयं में विश्वास शिक्षा विधि से आएगा, न कि उपदेश विधि से या घटना विधि से।  कोई एक व्यक्ति में तृप्ति घटित भी हो जाए तो उससे संसार तृप्त हो जाए - ऐसा होता नहीं है।

सहअस्तित्व को मैंने देखा है - व्यापक वस्तु में प्रकृति के डूबे, भीगे, घिरे रहने से उसमे स्वयं स्फूर्त प्रगटन है।  उसी से एक अवस्था से दूसरी अवस्था प्रगट होती गयी।  मानव को जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में देखा गया।  जीवन भी मूल में एक परमाणु ही है।  इस तरह भौतिक-क्रिया, रासायनिक क्रिया और जीवन क्रिया अस्तित्व में हैं।  तीन ही तरह की क्रियाएं हैं।  जीवन द्वारा कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता को व्यक्त करने का प्रावधान मानव शरीर में हुआ।  मानव शरीर रचना का ऐसा प्रगटन हुआ कि जीवन उससे अपनी कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता को व्यक्त कर सके।  इसी लिए मानव शरीर को श्रेष्ठ रचना माना गया।  

- श्री ए नागराज के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)

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