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Sunday, May 18, 2008

ज्ञान और मनुष्य

इकाइयों की परस्परता में खाली स्थली जैसे जो दिखती है - वह खाली नहीं है, ऊर्जा है। यह ऊर्जा सब में पारगामी है - परमाणु अंश से धरती तक में। पारगामी होने का गवाही है - इकाइयों की ऊर्जा सम्पन्नता। मानव में ऊर्जा सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है।

मानव में ज्ञान १३ स्वरूपों में करने के रूप में प्रकट होता है।
चार विषयों का ज्ञान (आहार, निद्रा, भय, मैथुन)
पाँच संवेदनाओं का ज्ञान (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)
तीन ईषणाओं का ज्ञान (पुत्तेष्णा, वित्तेष्णा, और लोकेष्णा)
और उपकार का ज्ञान (समझे हुए को समझाना, सीखे हुए को सिखाना, किए हुए को कराना )

ज्ञान के बिना मानव में यह सब नहीं होता। चार विषयों को समझे बिना हम उनको उपयोग नहीं कर सकते। पाँच संवेदनाओं को समझे हुए बिना हम उनका उपयोग नहीं कर सकते। उसी तरह ईषणाओं और उपकार को समझे बिना हम उनको नहीं कर सकते। वह समझना ही ज्ञान है।

मानव में व्यापक ज्ञान के रूप में काम कर रहा है। उपरोक्त १३ स्वरूपों में जो भी मानव काम करता है - उसके मूल में ज्ञान रहता है। इनमें से चार विषयों को पहचानने की बात जीव-संसार में भी है। जीव जानवर चार विषयों में जीने के अर्थ में पाँच संवेदनाओं का उपयोग करते हैं। (जैसे - जीव जानवर गंध को इस्तेमाल करके अपने आहार को खोजते हैं।) जबकि मनुष्य पाँच संवेदनाओं को राजी रखने के लिए विषयों को पहचानता है। (जैसे - मनुष्य अपनी रस-इन्द्रियों को राजी रखने के लिए आहार ढूँढता है। ) यह संवेदनाओं को राजी रखने की बात मनुष्य में है, जो जीवों में नहीं है। यह मनुष्य और जीवों में मौलिक अन्तर है।

मनुष्य जो कुछ भी करता है - उसके मूल में "अच्छा लगने" की इच्छा है। सबसे पहले मनुष्य को संवेदनाओं में ही अच्छा लगता है। यही मानव की कल्पना-शीलता और कर्म-स्वतंत्रता का पहला प्रभाव है। इसी आधार पर मानव को ज्ञान-अवस्था में कहा है। मनुष्य का सारा क्रिया-कलाप सुख की अपेक्षा में है - यहीं से मानव का अध्ययन शुरू होता है। इस विधि से जब हम मानव का अध्ययन करने जाते हैं - तो यह विगत के इतिहास में जो कुछ भी हुआ, उससे जुड़ता नहीं है। इसके साथ विगत का सारा screen ख़त्म। मानव के अध्ययन का reference-point यह हुआ, न की विगत की कोई भी चीज़।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

Monday, May 12, 2008

प्रश्न, शंका, और जिज्ञासा में भेद

प्रश्न = वस्तु क्यों और कैसा है? (जैसे मैं क्यों हूँ, और मुझे कैसे रहना है? जैसे - यह अस्तित्व क्यों है, और कैसा है?)

शंका = जो हमको समझ में नहीं आया, उसके प्रति हम शंका करते हैं।

जिज्ञासा = जो अस्पष्ट है, उसको स्पष्ट करने के अर्थ में जिज्ञासा है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

जीवन ही जीवन को कैसे देखता (समझता) है?

मन का दृष्टा वृत्ति होता है। मन में निरंतर जो आस्वादन की क्रिया चल रही है - उसको वृत्ति देखता है, मूल्यांकित करता है, विश्लेषित करता है। मनुष्य में कल्पनाशीलता के ज्ञान-सम्पन्नता को छूने का पहला घाट यही है। स्वयं में निरंतर आस्वादन क्रिया हो रही है - इसको देख पाना मनुष्य में ही सम्भव है। जीव-जानवर इस तरह नहीं देख पाते। इसीलिए जीव-जानवर अपने शरीर वंश की व्यवस्था के अनुसार विषयों में जीते रहते हैं।

वृत्ति का दृष्टा चित्त होता है। यह मनुष्य में कल्पनाशीलता के ज्ञान-सम्पन्नता को छूने का दूसरा घाट है। वृत्ति द्वारा मन का किया गया विश्लेषण कहाँ तक ठीक हुआ? कहाँ तक न्याय है? कहाँ तक धर्म है? कहाँ तक सत्य है? चित्त में उपरोक्त का मूल्यांकन होता है। यही अध्ययन है। न्याय, धर्म, और सत्य को अस्तित्व में वास्तविकताओं के रूप में पहचानने का प्रयास ही अध्ययन है।

इसी क्रम में बुद्धि चित्त का दृष्टा होता है। अर्थात बुद्धि चित्त के क्रियाकलाप का दृष्टा रहता है। सह-अस्तित्व सहज अध्ययन की स्वीकृति बुद्धि में ही होती है। बुद्धि में बोध होने के लिए सर्व-सुलभ विधि अध्ययन-विधि ही है। अध्ययन के लिए मन को लगा देना ही अभ्यास है।

आत्मा बुद्धि का दृष्टा होता है। अध्ययन पूर्वक बुद्धि में सत्य-बोध पूर्ण होने पर आत्मा का सह-अस्तित्व में अनुभव करना भावी हो जाता है। जीवन का मध्यांश (आत्मा) अनुभव करने के योग्य रहता ही है। बुद्धि में बोध के बाद आत्मा सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में अनुभव करता ही है। जब आत्मा अस्तित्व में अनुभव करता है तो सारा जीवन अनुभव में भीग जाता है। मन वृत्ति में, वृत्ति चित्त में, चित्त बुद्धि में, बुद्धि आत्मा में, और आत्मा सह-अस्तित्व में अनुभव करता है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६)

अकेलापन हमारा दूसरों को ग़लत चाहने वाला मान लेने के कारण होता है.

प्रश्न: अकेलापन क्या है?  अकेलापन कैसे दूर हो?

उत्तर: अकेलेपन के मूल में यह मान्यता है - "मैं तो सही हूँ, लेकिन संसार ग़लत है और सही करने योग्य नहीं है।" अकेलापन असहअस्तित्ववादी है। अकेलापन सहज नहीं है। इस बात की सच्चाई को अपने में जांचने की ज़रूरत है।

अकेलेपन को दूर करने का इलाज है, इस बात की सच्चाई को स्वीकार लेना कि - "संसार सही (अच्छाई) को ही चाहता है।" "मैं अच्छा चाहता हूँ" - यह स्वीकृति हम में होती ही है। संसार को भी जब अच्छाई के लगावदार के रूप में जब हम स्वीकार लेते हैं - तो हमारा अकेलापन भाग जाता है। संसार से विश्वास करने का सूत्र मिल जाता है।

समझने के क्रम में विद्यार्थियों के बीच में विश्वास का सूत्र - "समझ" लक्ष्य की समानता है। "बाकी विद्यार्थीजन भी मेरी तरह समझना, और समझ कर जीना चाहते हैं, और उसी के लिए प्रयासरत हैं।" - यह स्वीकारने पर ही साथियों के बीच विश्वास और स्नेह का सूत्र निकलता है। यह प्रतिस्पर्धा से बिल्कुल भिन्न स्थिति है - इसमें परस्पर पूरकता है।

स्वयम समझे होने पर संसार को समझ सकने योग्य मानने पर ही हम संसार के साथ व्यवहार कर सकते हैं। संसार को पापी, अज्ञानी, स्वार्थी मान कर हम किसी को कुछ समझा नहीं पायेंगे। "समझाने की जिम्मेदारी " को हम संसार के साथ इस तरह विश्वास करने के बाद ही स्वीकार सकते हैं। यही दया, कृपा, और करुणा का सूत्र है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (२००८)

Friday, April 18, 2008

अनुभव का प्रमाण परम्परा में ही हो सकता है.

अनुभव का प्रमाण एकांत में नहीं हो सकता। एक व्यक्ति को अनुभव हो गया - लेकिन वह अपने जैसा दूसरों को नहीं बना पाया, तो उसका कोई प्रमाण नहीं हुआ। परम्परा में प्रमाण होने का मतलब है अनुभव की व्याख्या का - आचरण में आना, शिक्षा में आना, संविधान में आना, और व्यवस्था में आना।

अनुभव में दृष्टा-पद प्रतिष्ठा हो जाती है। दृष्टा पद का मतलब है - अस्तित्व जैसा है उसको वैसा देख पाना। अनुभव का प्रमाण जागृति है। जिसको मानव-चेतना भी कहा है। मानव-चेतना ही स्वभाव में धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, और करुणा है। मानव अपनी स्वभाव-प्रतिष्ठा में स्थापित होने पर ही व्यवस्था में जी पाता है।

मानवीयता पूर्ण आचरण आज तक किसी ने किया या नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है, की यदि किया भी हो तो वह आज तक परम्परा में स्थापित नहीं हुआ। शिक्षा में नहीं आया। संविधान में नहीं आया। व्यवस्था में व्याख्या नहीं हुआ। मानवीयता पूर्ण आचरण को मूल्य, चरित्र, और नैतिकता के स्वरूप में व्याख्या विगत के किसी साहित्य में नहीं हुआ।

भक्ति-विरक्ति का मार्ग परिवार संबंधों में अविश्वास से ही शुरू होता है। भौतिकवाद के मार्ग में तो शुरू से आख़िर तक संघर्ष ही बताया है।

मानवीयता पूर्ण आचरण मन की स्वस्थता का ही स्वरूप है। आदर्शवाद में मनः स्वस्थता न होने की पीड़ा को व्यक्त तो किया है - लेकिन उपलब्धि की जगह में नहीं पहुँचा पाए। भौतिकवाद मनः स्वस्थता की कोई बात ही नहीं करता। दोनों के द्वारा मानव की परिभाषा नहीं मिल पाती।

मध्यस्थ-दर्शन से मानव की परिभाषा मिली - "मनाकार को साकार करने वाला, और मनः स्वस्थता को चाहने और प्रमाणित करने वाला मानव है।" मानव को जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप बताया। जिसमें से जीवन की ४.५ क्रिया पूर्वक मनाकार को साकार करना बन गया। मनः स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा रहा। मनः स्वस्थता की आकांक्षा मानव में है - क्योंकि मानव सुख-धर्मी है। यह आकांक्षा मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन से पूरी हो सकती है। अध्ययन से अनुभव तक पहुँचा जा सकता है। अनुभव पूर्वक ही व्यवहार में मूल्य प्रमाणित होते हैं। अनुभव पूर्वक समाज में चरित्र प्रमाणित होता है। अनुभव पूर्वक व्यवस्था में नैतिकता प्रमाणित होती है। इस तरह अनुभव का प्रमाण मानव-परम्परा में बहता है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८)

Wednesday, March 26, 2008

साक्षात्कार

(१) अध्ययन मूलक विधि से हम साक्षात्कार तक पहुँचते हैं।
(२) परिभाषा-विधि से हम शब्द के अर्थ को अपनी कल्पना में लाते हैं।
(३) उस कल्पना के आधार पर अस्तित्व में वस्तु को पहचानने जाते हैं। कल्पनाशीलता समझ नहीं है। कल्पनाशीलता सबका अधिकार है। कल्पनाशीलता का प्रयोग करते हुए हमको वस्तु को पहचानना है। परिभाषा आपकी कल्पनाशीलता के लिए रास्ता है। आपकी कल्पनाशीलता वस्तु को छू सकता है। वस्तु को जीवन ही समझता है। जीवन समझता है तो वह साक्षात्कार ही होता है।
(४) अस्तित्व में वस्तु पहचानने पर वह वस्तु साक्षात्कार हुआ। वस्तु के रूप में ही वस्तु साक्षात्कार होता है - शब्द के रूप में नहीं होता।
(५) ऐसे साक्षात्कार होने पर वह बोध और संकल्प में जा कर अनुभव-मूलक विधि से पुनः प्रमाण-बोध में आ जाता है।
(६) प्रमाण बोध में आ जाने से निश्चयन हो जाता है - कि यह वस्तु ऐसे ही है!
(७) सह-अस्तित्व पहले साक्षात्कार होना। उसके बाद जीवन साक्षात्कार होना। जीवन साक्षात्कार होने के साथ ही अजीर्ण और भूखे परमाणु भी साक्षात्कार होना। हमको जैसे हुआ, वैसे ही होगा आपको। तभी आपका अध्ययन हुआ, जिससे आप प्रमाणित होंगे।
(८) अध्ययन एक निश्चित पद्दति है। निश्चित लक्ष्य को लेकर यदि आपमें कोई अवरोध नहीं है - तो आपको समझने में समय नहीं लगेगा। निश्चित लक्ष्य = समाधान। सर्वतोमुखी समाधान संपन्न होना ही अध्ययन का लक्ष्य है। सर्वतोमुखी समाधान संपन्न हो कर जब हम जीने के लिए जाते हैं, तो समृद्धि स्वाभाविक रूप में आता है। रास्ता निकलता है। समृद्धि के लिए अनेक विधियाँ है। सर्वतोमुखी समाधान में अपने को प्रमाणित होना है - इतना भर लक्ष्य रखने से ही आप पूरा समझ सकते हैं।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७ )

Monday, March 17, 2008

ज्ञानावस्था की mutiplication theory

दर्शन का मतलब है "जीना" = "मैं जैसा हूँ"।

मेरा जीना आपके लिए दर्शन है। आपका जीना मेरे लिए दर्शन है। मेरा आचरण मेरे लिए दर्शन है। मेरे आचरण को मैं जानता-मानता हूँ, इसलिए यह मेरा, मेरे लिए दर्शन है। मेरे आचरण को जो आप देखते हैं - आपके लिए प्रेरणा रूप में वह दर्शन है। अध्ययन पूर्वक यह प्रेरणा आपका स्वत्व बनता है। आपका जब यह स्वत्व बन जाता है - तब यह आपका दर्शन हो गया। इस तरह ज्ञानावस्था की multiplication theory बनी। 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७)