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Thursday, April 2, 2026

मानवीयता - देव मानवीयता - दिव्य मानवीयता

क्रियापूर्णता होने पर सतर्कता पूर्ण होता है, जो मानवीयता है.  अब क्रियापूर्णता तो है ही, सजगता के साथ आचरण पूर्णता की ओर चले.  सतर्कता पूर्ण सजगता सहित देव मानवीयता है.  सजगता पूर्ण सहजता सहित दिव्य मानवीयता है. 


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

उपदेश

उपदेश है:  जाने हुए को मान लो, माने हुए को जान लो.

उपदेश की परिभाषा है - उपाय सहित आदेश।  


स्वयं का आदेश होने पर हम स्वयंस्फूर्त होते हैं.  हमारा संकल्प ही आदेश है.  इसके आधार पर हम काम करते ही हैं.  स्वयं भी आदेश का पालन करते हैं, वैसे ही संसार द्वारा पालन करने की इच्छा रखते हैं.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Wednesday, April 1, 2026

ऊर्जा, चेतना, ज्ञान

 व्यापक वस्तु में प्रत्येक एक वस्तु अविभाज्य है.  प्रत्येक एक ऊर्जा संपन्न है, चेतना संपन्न है, ज्ञान संपन्न है.  व्यापक वस्तु रासायनिक भौतिक संसार में ऊर्जा, जीव संसार में चेतना और मानव संसार में ज्ञान स्वरूप में प्राप्त है.  रासायनिक भौतिक संसार कोई गलती करते नहीं हैं, जीव संसार कोई गलती करते नहीं हैं, मानव तमाम गलती करता है.  मानव ज्ञान स्वरूप में जीने का अवसर पाया किन्तु जीवों के सदृश जीने गया.  मानव द्वारा जीवन और शरीर के भेद को पहचानना, जीवन की आवश्यकता को पूरा करना, शरीर की आवश्यकता को पूरा करना।  जीवन के लिए समाधान चाहिए, न्याय चाहिए, सत्य में अनुभूत रहना चाहिए - इनको पूरा करते हुए जी पाते हैं तो मानव जिया, नहीं तो जीव जिया।  जैसा जीना हो जी लो.  


व्यापक वस्तु और एक-एक वस्तु है - यह पहला सिद्धांत है.  व्यापक वस्तु में एक-एक वस्तु डूबा-भीगा-घिरा है - यह दूसरा सिद्धांत है.  ऊर्जा सम्पन्नता, चेतना सम्पन्नता, ज्ञान सम्पन्नता - यह तीसरा सिद्धांत है.  मानव ज्ञान सम्पन्नता को प्रमाणित करता है - यह चौथा सिद्धांत है.  मानव में ही संज्ञानीयता पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहते हैं - यह पांचवा सिद्धांत है.  यह सन्देश सभी भाषाओं में दौड़ने की आवश्यकता अब आ गयी है.  सभी भाषाओं में इस प्रस्ताव को ले जाने का आधार है - हर भाषा को कारण-गुण-गणित के संयुक्त रूप में पहचानना।  सभी भाषा वालों में समझदारी को लेकर समानता है.  हर भाषा में परिभाषाएं होंगी।  परिभाषा के आधार पर हर भाषा में दर्शन, वाद, शास्त्र प्रकट होंगे और व्यवस्था को व्याख्यायित करने के लिए संविधान होगा।  समझदारी को स्पष्ट करने के लिए दर्शन, जीने की विधि को स्पष्ट करने के लिए वाद और शास्त्र।  


इन सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है, लोग सहमत होते हैं, कोई कोई involve भी होते हैं - यह तो आ गया.  प्रतिबद्ध होने के बाद कोई-कोई जी पा रहे हैं, कोई-कोई नहीं जी पा रहे हैं - यह भी आ गया.  इस प्रस्ताव के प्रभाव को यहाँ तक तो शोध कर लिया है.  अब ज्यादा लोग और सभी लोग कैसे involve होंगे, इस बारे में काम हो सकता है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Monday, March 30, 2026

जो छूटना चाहता है, उसके लिए सीधा रास्ता बना है.

अभी सरकार स्वयं शराब बनाने, कसाईखाने का लाइसेंस देती है.  वन काटने, खनिजों का दोहन करने के लिए विभाग ही बना है.  इस तरह अपराध परम्परा में सभी सरकार पल रहा है.  आदमी को अपराधी बनाने के लिए शिक्षा परम्परा काम कर रहा है.  अपराध को पनपाने के लिए सरकार काम कर रहा है.  सभी इसमें दसों उंगली फंस गए हैं.  फिर भी इससे जो छूटना चाहता है, उसके लिए सीधा रास्ता बना है.  उनके लिए रास्ता बंद नहीं हो पाया है.  इससे जो छूटना चाहता है, उसको पकड़ने वाला कोई नहीं है.  जैसे मैं छूटना चाहा - मुझे कौन पकड़ा?  कोई अड़चन पैदा नहीं किया, कोई अवरोध नहीं है.  अभी तक शिक्षा विधा में इस प्रस्ताव में यह ठीक नहीं है, कहने वाला कोई लाल पैदा हुआ नहीं।  सरकार में कोई लाल पैदा हुआ नहीं।  मैं डाकुओं, व्यभिचारियों, सतत झूठ बोलने वालों से भी बात किया हूँ - उनके पास भी इसको रोकने का कोई जुगाड़ नहीं है.  अतः सहीपन का रास्ता बना ही है, उसको रोकने वाला कोई नहीं है.  एक तरफ हर व्यक्ति समझदार होना चाहता है, दूसरे तरफ उसको रोकने वाला कोई नहीं है.  समझदारी पूर्वक मनुष्य स्वेच्छा से जियेगा।  इस तरह मैंने आजादी का अनुभव किया।  इसमें कोई मजबूरी की बात नहीं है, थोपने की बात नहीं है, स्वयं स्फूर्त विधि से जैसे जीना है जिए.  


  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Saturday, March 28, 2026

कुछ कौतुहल वाले प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न: अस्तित्व में ज्यादा धरतियां समृद्ध हैं या कम धरतियां समृद्ध हैं?

उत्तर: कम धरतियां समृद्ध हैं.  


प्रश्न: कुछ धरतियाँ आवेशित स्थिति में दिखती हैं.  जैसे सूरज।  वो कैसे उस स्थिति तक पहुंचे?


उत्तर: जहाँ जहाँ सूरज है, वहाँ आदमी ने बर्बाद करके सूरज बनाया है.  


प्रश्न: क्या किन्हीं धरतियों पर मानव जागृत भी हैं?


उत्तर: कई धरतियों पर जागृत मानव हैं.   


प्रश्न: यदि अस्तित्व अनंत है, जिसमें अनंत धरतियां हैं तो हमारी धरती से हर कोण पर किसी न किसी दूरी पर कोई धरती होनी चाहिए।  


उत्तर: कोई न कोई पदार्थ होना चाहिए, वह रहता ही है.  


प्रश्न: पर आँख से तो ऐसा दीखता नहीं है.


उत्तर:  आँख से बहुत सीमित ही दीखता है.  ज्ञान दृष्टि से पता चलता है, अनंत धरतियां हैं, बहुत सारी धरतियों पर मानव जागृत है. यहाँ भी जागृत होने का रास्ता आ गया है.  है इसीलिये यहाँ आया, नहीं होता तो कहाँ से आता.  


प्रश्न: इस धरती पर जितने जीवन परमाणु हैं, क्या वे इसी धरती के द्रव्य से बने हैं?


उत्तर: सभी धरती पर जीवन परमाणु तैयार होना है, ऐसा कोई नियम नहीं है.  परमाणु का गठनपूर्ण होना किसी एक धरती पर होना पर्याप्त है.  एक आधा तोला द्रव्य में असंख्य परमाणु होते हैं.  उतना गठनपूर्ण परमाणु सारे संसार के लिए पर्याप्त हो जाते हैं.  


प्रश्न: कोई धरती कब समृद्ध होगी, इसकी क्या कोई गति है?  


उत्तर: यह मनुष्य का हविस है.  नियति विधि से जीवन बनना होता है, धरती पर चारों अवस्थाओं का प्रकट होना होता है.  इसमें जहाँ जहाँ मानव है, उसको सऊर से जीने की आवश्यकता है.  यह आवश्यकता पूरा होने के लिए हमने प्रस्ताव प्रस्तुत किये।  यदि इस धरती पर जागृति प्रमाणित होती है तो भविष्य में हो सकता है यहाँ से जागृत जीवन जिन धरतियों पर राक्षस मानव, पशु मानव रह रहे हैं, वहाँ पहुंचेंगे!  यह बहुत साधारण बात है.  


धरती के समृद्ध होना मानव के हाथ में नहीं है.  मानव के हाथ में है - वह जीव चेतना में भी जी सकता है, मानव चेतना में भी जी सकता है, देव चेतना में भी जी सकता है, दिव्य चेतना में भी जी सकता है.  क्योंकि मानव को कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता नियति प्रदत्त है.  


प्रश्न: एक परमाणु के गठनपूर्ण होने के बाद उसकी क्या अग्रिम गति है?  


उत्तर: पहले आशा बंधन में आएगा, फिर विचार बंधन में आएगा, फिर इच्छा बंधन में आएगा, फिर बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न करेगा।  बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न चाहे आज कर लो, कल कर लो, या करोड़ वर्षों के बाद कर लो.  इस धरती पर आदमी तीनों बंधनों से पीड़ित हो चुका है, पीड़ित करना हो चुका है.  बंधन मुक्ति के लिए प्रयत्न होना शेष है.  उसके लिए प्रस्ताव है.  भौतिकवादी विधि से इसका कोई दवाई निकला नहीं, आदर्शवादी विधि से इसका कोई दवाई निकला नहीं - इसलिए विकल्प विधि को प्रस्तुत किया।  


जीवों में जीवन के आशा बंधन के साथ जीने की बात रहती है.  मानव में आशा बंधन, विचार बंधन और इच्छा बंधन ये तीनों हैं.  इन तीनों बंधनों से मुक्ति के लिए इच्छा हो जाना जल्दी भी हो सकता है, देर से भी हो सकता है.  धरती के बीमार होने के बाद समझदार होने की बाध्यता तो आती ही है।  अभी भी समझदार होंगे या नहीं, इसको कौन बताएगा?  मानव के सम्मुख एक प्रस्ताव आया है, इस आधार पर हम आशा कर रहे हैं कि मानव इसको अपनाएगा।  हमारा सत्यापन तो यहीं तक है.  इसीलिये कह रहे हैं जीजान लगाकर पूरी बात को वेबसाइट में रखा जाए.  



  • श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Tuesday, March 24, 2026

भौतिक क्रिया के समृद्ध होने से आशय

प्रश्न: आपने लिखा है, भौतिक क्रिया के समृद्ध होने के उपरान्त यौगिक क्रिया में प्रवृत्त हुआ.  भौतिक क्रिया के समृद्ध होने से क्या आशय है?  


उत्तर: जितने प्रकार के परमाणु की प्रजातियाँ होना है, उनके प्रकट होने के उपरान्त यौगिक क्रिया में प्रवृत्त हुआ.  यही भौतिक क्रिया के समृद्ध होने का अर्थ है.  परमाणुओं की प्रजातियाँ, परमाणुओं से अणुओं की प्रजातियाँ, अणुओं की रचनायें ये सब इसमें शामिल हैं.  सभी मृद, पाषाण, मणि और धातु क समृद्ध होने के बाद ही यौगिक संसार है.  यौगिक विधि में सबसे पहले रसायन पानी का प्रकटन हुआ.  जिसमें एक जलने वाला है, एक जलाने वाला है - ये दोनों मिलकर प्यास बुझाने वाले हो गए.  धरती पर पानी खड़ा होता है. धरती अम्ल और क्षार पानी को देता है, जिससे अम्ल और क्षार के विभिन्न अनुपातों से विभिन्न रस-रसायनों का प्रकटन हुआ.  वही आगे चल करके पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व में परिणित होते हैं.  पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व के योगफल में अनेक परम्पराएं बनी.  पुष्टि-तत्व और रचना-तत्व का योग ही बीज है.  


पहले प्राकृतिक विधि से बीज बनता है, फिर उसके बाद उसका परम्परा होता है.  हरेक आगे स्थिति के लिए बीज पीछे स्थिति में बना रहता है.  पदार्थावस्था में बीज रूप बनकर के प्राणावस्था में प्रकटन और परम्परा।  प्राणावस्था अपने में समृद्ध होकर के जीवावस्था का बीज तैयार करना, जीवावस्था प्रकट होना और परम्परा स्वरूप में स्थापित होना।  वैसे ही जीवावस्था में ज्ञानावस्था का बीज होना, ज्ञानावस्था प्रकट होना और परम्परा होना।  यह सब क्रम से हुआ है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

दर्शन के अंग्रेजी अनुवाद के लिये मार्गदर्शन

दर्शन के अंग्रेजी अनुवाद के लिए परम्परा के शब्दों को वापरना चाहिए, और उसकी परिभाषा कारण-गुण-गणित विधि से प्रतिपादित होना चाहिए।  यदि यह होता है तो सर्वशुभ होने का रास्ता बन पाता है.  यह नहीं होता है तो नहीं होगा.  इसमें अपने को धारारत करने की बात, आजीवन निष्ठा से काम करने की बात है.  एक दिन की बात नहीं है यह.  यह fictional program नहीं है.  यह परम्परा की विधि से है, आर्यश्रेय विधि से है, अनंत काल के लिए विधि से है.  इसमें कहीं रुकने की बात नहीं है, enrich होने की बात हो सकती है.  क्या enrich करना है?  कारण-गुण-गणित को संप्रेषणा में enrich करना है.  कुल मिला कर सम्पूर्ण अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन के लिए मूल कारण सहअस्तित्व ही है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)