Saturday, July 27, 2019

सम-विषमात्मक प्रभाव की सीमा

प्रश्न:  जड़ परमाणुओं के नाभिक में पाए जाने वाले सभी अंश मध्यस्थ क्रिया के लिए जिम्मेदार होते हैं, या एक ही अंश मध्यस्थ क्रिया के लिए जिम्मेदार होता है?  

उत्तर: जड़ परमाणुओं में परिवेश में जितने अंश रहते हैं, उतने या उससे अधिक नाभिक में रहते हैं.  ये सभी अंश मध्यस्थ क्रिया के लिए जिम्मेदार हैं.  नाभिक में हर अंश एक ही काम करता है - मध्य से दूर भागने वाले परिवेशीय अंशों को अच्छी दूरी में आकर्षण पूर्वक स्थापित कर लेता है और अच्छी दूरी से पास आने पर विकर्षण पूर्वक दूर भगा कर अच्छी दूरी में स्थापित कर लेता है.

विकास क्रम में परमाणुओं की एक यथास्थिति से दूसरी यथास्थिति में परिवर्तन होते समय प्रस्थापन-विस्थापन प्रक्रिया द्वारा नाभिक में अंशों की सख्या में भी परिवर्तन होता है, तथा परिवेश में अंशों की संख्या में भी परिवर्तन होता है.  यौगिक व रासायनिक क्रिया में भागीदारी करते हुए परमाणुओं के अंशों की संख्या में परिवर्तन नहीं होता है.  यदि परमाणु के अंशों की संख्या में परिवर्तन होता है तो वे यौगिक क्रिया में नहीं रह पाते हैं, उससे भिन्न कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं.
  
प्रश्न:  आपने लिखा है - "आत्मा पूर्ण मध्यस्थ व नित्य शांत है, इसीलिए इस पर सम या विषम का आक्रमण सिद्ध नहीं होता है."  इसको स्पष्ट कर दीजिये.

उत्तर: यह चैतन्य परमाणु (जीवन) के बारे में बात है.  जड़ परमाणु में भी यह बात है.  मध्य में जो अंश रहते हैं उन पर सम विषम का प्रभाव होता ही नहीं है.  जड़ परमाणुओं में मध्य में रहने वाले अंशों का प्रभाव अच्छी दूरी में होने के रूप में आकर्षण-विकर्षण विधि पूर्वक होता रहता है.  चैतन्य परमाणु में आकर्षण-विकर्षण नहीं होता है.  शरीर के अनुसार जीना और ज्ञान के अनुसार जीना - ये दो ही होता है.  शरीर के अनुसार जीना जीव प्रकृति में जीवनी क्रम स्वरूप में है.  मानव में ज्ञान पूर्वक जीने की बात है, वो अभी तक हुआ नहीं.  आखिरी बात तो इतना ही है. अनुभव करने वाले जीवन के मध्यांश को "आत्मा" नाम दिया है.   उस पर सम-विषमात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है, इसीलिये वह सुरक्षित रहता है.  जब आवश्यकता बनता है तब वह अनुभव में आ जाता है.  अनुभव मानव परम्परा में ही प्रमाणित होता है, और कहीं यह प्रमाणित नहीं होता.

प्रश्न: क्या जीवन के प्रथम परिवेश "बुद्धि" पर सम-विषम का आक्रमण हो सकता है?

उत्तर:  नहीं.  बुद्धि पर भी सम विषम का आक्रमण सिद्ध नहीं है.  चित्त के चिंतन भाग पर भी नहीं.  शरीर मूलक जीते तक साढ़े चार क्रिया में चित्रण, तुलन, विश्लेषण, आस्वादन व चयन पर सम-विषम का प्रभाव होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

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