Saturday, November 3, 2018

मानव चेतना में परिवर्तित होना संभव है



मानव चेतना में परिवर्तित होना संभव है - आचरण विधि से, संविधान विधि से, अध्ययन विधि से, और व्यवस्था विधि से.  मूल वस्तु इसमें अध्ययन है.  अध्ययन विधि से मानव चेतना में परिवर्तित हुए और मानवीयता पूर्ण आचरण में पक्का हो गए.  मानवीयता पूर्ण आचरण में मूल्य, चरित्र, नैतिकता तीनो आ गयी.  अब उसका कहीं भी आक्षेप नहीं हो सकता.  इससे इसके multiply होने की सम्भावना आ गयी.  आक्षेप विहीन आचरण यदि हो तो वह multiply होगा या नहीं?  जैसे एक वृक्ष से अनेक बीज हो कर अनेक वृक्ष हो जाते हैं, वैसे ही मानवीयता का multiply होना ही मानव का बीज है.

इसमें सिद्धांत है - "त्व सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी".  इसी सिद्धांत में हमको पार पड़ना होगा.  इसकी अनदेखी करेंगे तो हम फंसे ही रहेंगे.

मैं एक बार एक बड़े अधिकारी से मिला था उन्होंने कहा - "हम अभी जैसे रहते हैं वैसे रहते रहे और हम मानव चेतना में परिवर्तित हो जाएँ, ऐसा आप कुछ बात बताइये".  यह कैसे हो सकता है भला!  आप कुछ भी अनाचार-व्यभिचार करते रहे और साथ में सुधर भी जाएँ - यह हो नहीं सकता.  अपने द्वारा होने वाले अतिवाद का आंकलन करना आवश्यक है.  सुविधा-संग्रह एक अतिवाद है.  भक्ति-विरक्ति एक अतिवाद है.  इन दोनों अतिवादों ने मानव को बर्बाद किया.

प्रश्न: भक्ति-विरक्ति ने लोगों को कैसे बर्बाद किया?

उत्तर:  भक्ति-विरक्ति में वे ही लोग गए जो अपने आप को बहुत अच्छा मानते रहे.  ऐसे लोगों को अन्य लोग भी विद्वान मानते रहे, सम्मान देते रहे.  ये लोग अपने पत्नी-बच्चों को छोड़ कर सन्यासी हो गए, जिससे उनका परिवार क्षति-ग्रस्त हो गया.  इस ढंग से भक्ति-विरक्ति से लोग बर्बाद हुए.

अभी सुविधा-संग्रह के दरवाजे पर ज्ञानी-विज्ञानी-अज्ञानी तीनो भिखारी बने खड़े हैं.  इनमे से ज्ञानी और विज्ञानी ज्यादा चालाक होते होंगे, अज्ञानी कम चालाक होते होंगे.  लेकिन तीनो समान रूप से दरिद्र हैं.  दरिद्रता से मुक्ति पाने की सम्भावना तीनो में समान है.  लेकिन इस दरिद्रता से मुक्ति पाने के लिए ज्ञानी और विज्ञानी को अज्ञानी की तुलना में ज्यादा परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि उनकी मानसिकता में ज्यादा कचड़ा है.  मैं इस प्रस्ताव को लेकर ज्ञानी कहलाने वालों के पास भी गया हूँ, विज्ञानी कहलाने वालों के पास भी गया हूँ, अज्ञानी कहलाने वालों के पास भी गया हूँ.  इनमें से मैंने पाया विज्ञान background वाले लोगों को यह प्रस्ताव तत्काल स्वीकार होता है.  इसका कारण है - ज्ञानियों ने तर्क को नकारा.  जबकि विज्ञान ने तर्क को खूब अपनाया और अपने अध्ययन को systematic माना.  विज्ञान ने यंत्र को प्रमाणीकरण का आधार मानते हुए जो यंत्र के पकड़ में आता है उसको object (अध्ययन की वस्तु) कहा, और जो यंत्र के पकड़ में नहीं आता है उसको object नहीं माना.  (इस तरह विज्ञान विधि से मानव का अध्ययन छूट गया)  अब इस प्रस्ताव में तर्क के साथ systematic अध्ययन भी है और स्वयं को एक object के रूप में पहचानने की बात भी है. (इसलिए यह विज्ञानियों को जल्दी रंगता है)

यहाँ मूल बात है - अपना भरोसा सुविधा-संग्रह से समाधान-समृद्धि में shift होना.  यह मुख्य बात है.  यह जिसका shift हो गया, वो पार पा गया.  जिसका shift नहीं हुआ, वह प्रयास कर रहा है!

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)

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