प्रश्न: “चेतना विकास – मूल्य शिक्षा” से क्या आशय है?
उत्तर: “चेतना विकास” को छोड़ करके “मूल्य शिक्षा” होता नहीं है। इसीलिये “चेतना विकास – मूल्य शिक्षा” एक साथ कहा। आज की स्थिति में लोग मूल्य-शिक्षा का स्वागत करते हैं। “ चेतना-विकास” के नाम से ठिठरते हैं। मानवजाति काफी कृपण हो चुका है - अपने सुविधा-संग्रह के विरोध में कुछ सुनना ही नहीं चाहता, चाहे धरती रहे या न रहे! लाभोन्माद, कामोन्माद, और भोगोन्माद के चलते आदमी के पास कुछ और सोचने की जगह ही नहीं रह गया। इसमें से कुछ बंटे-छंटे लोग इस प्रस्ताव को समझने में लग रहे हैं – जो इन उन्मादों से बचना चाह रहे हैं, या बचे हुए हैं।
प्रश्न: प्रकृति में “सामरस्यता” का क्या स्वरूप है?
उत्तर: प्रकृति की चार अवस्थाएं प्रगट हैं। हर अवस्था की हर इकाई में रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म अविभाज्य हैं। सामरस्यता = एक जाति के होना। हर अवस्था में सामरस्यता का अपना स्वरूप है। पदार्थ-अवस्था रूप-प्रधान अभिव्यक्ति है। अर्थात पदार्थ-अवस्था में रूप के आधार पर सामरस्यता (एक जाति का होना) है। प्राण-अवस्था गुण-प्रधान अभिव्यक्ति है। प्राण-अवस्था में गुण के आधार पर सामरस्यता है। जीव-अवस्था स्वभाव-प्रधान अभिव्यक्ति है। जीव-अवस्था में स्वभाव के आधार पर सामरस्यता है। ज्ञान-अवस्था धर्म-प्रधान अभिव्यक्ति है। ज्ञान-अवस्था में धर्म के आधार पर सामरस्यता है। मानव में जाति (सामरस्यता) की पहचान उसके सुख-धर्म के आधार पर ही है। मानव में धर्म-सामरस्यता को पा लेना ही उसका परम उद्देश्य है।
सहअस्तित्व यदि अनुभव में आता है तो आशा, विचार, इच्छा, संकल्प में सामरस्यता हो जाती है। स्वयम में जब यह एक-सूत्रता होती है, तो सर्वस्व में एकसूत्रता को स्वीकार सकते हैं। स्वयं में एकसूत्रता नहीं होगा तो सर्वस्व में एकसूत्रता को कैसे स्वीकारेगा?
प्रश्न: “हृदयंगम होना” से क्या आशय है?
उत्तर: क्रियान्वयन करने के योग्य हो जाना। मन में आ गया, शरीर तैयार हो गया – इसका मतलब है, हृदयंगम होना।
प्रश्न: आपकी प्रस्तुति में विगत के प्रति “कृतज्ञता” किस रूप में है?
उत्तर: आदर्शवाद ने भाषा दिया – उसके लिए उनके प्रति कृतज्ञता है। भौतिकवाद ने दूरसंचार दिया – उसके लिए उनके प्रति कृतज्ञता है। विगत की सार बात को लेना है, और उसकी कमियों को पूरा करना है। आदर्शवाद में रहस्य और भौतिकवाद में संघर्ष से हमारी सहमति नहीं है। आदर्शवाद में “रहस्य” से मुक्ति के लिए समाधान प्रस्तुत है। भौतिकवाद में “सुविधा-संग्रह” (जिसके लिए संघर्ष होता है) से मुक्ति के लिए समृद्धि प्रस्तावित है।
मध्यस्थ दर्शन की प्रस्तुति मानव की “कल्पना” से नहीं है। सारी मानव-जाति की आज तक की सोच का सार निकाल लो – फिर भी यह उससे निकलेगा नहीं।
प्रश्न: सहअस्तित्व विधि से केन्द्रीयकरण होता है या विकेन्द्रीयकरण होता है?
सहअस्तित्व स्वयं में विकेन्द्रीयकृत है। सत्ता कोई अधिकार अपने पास में नहीं रखा है – अधिकार चारों अवस्थाओं में विकेन्द्रीयकृत है। मध्यस्थ दर्शन में कहा है – “हर जीवन ज्ञाता है। सहअस्तित्व ज्ञेय है। सहअस्तिव दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही ज्ञान है।” हर जीवन ज्ञाता और दृष्टा है। हर मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में कर्ता और भोक्ता है। यह विकेन्द्रीकरण हुआ या नहीं?
मध्यस्थ दर्शन के प्रतिपादन को पहले पाँच सूत्रों (सहअस्तित्व, विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, और जागृति) में लिखा, फिर उसको दर्शन, वाद, शास्त्र के रूप व्याख्या करने गए तो ३५०० पृष्ठ हो गए। इसको और हज़ारों लाखों पृष्ठों तक व्याख्या किया जा सकता है। लेकिन उसको रोक दिया। इस आशय से कि - इसको समझा हुआ व्यक्ति इसको आगे समझायेगा। किताब या लिखा हुआ केवल सूचना है। यह भी विकेन्द्रीयकरण की एक मिसाल है।
आदर्शवाद में ईश्वर के एकाधिकार की बात की गयी है। आदर्शवाद में कहा – “ब्रह्म ही ज्ञाता, ज्ञान, और ज्ञेय है”। यह केंद्रीयकृत हुआ कि नहीं? भौतिकवादी विधि से व्यापार में सुविधा-संग्रह का केंद्रीयकरण है या नहीं? भौतिकवादी विधि और आदर्शवादी विधि से केन्द्रीयकरण ही होता है। भौतिकवादी विधि से और आदर्शवादी विधि से मानव का सार्वभौम लक्ष्य नहीं निकलता है। मध्यस्थ दर्शन से मानव का “सार्वभौम लक्ष्य” निकलता है – समाधान, समृद्धि, अभय, और सह-अस्तित्व। इन लक्ष्यों को प्रमाणित करने से केन्द्रीयकरण होगा या विकेन्द्रीयकरण होगा – सोचिये!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, अमरकंटक)
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