Jeevan Vidya - A Study in Coexistence (जीवन विद्या - सह-अस्तित्व में अध्ययन)

This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)

Sunday, November 29, 2009

कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिन्दु

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(जीव चेतना में) जब ४.५ क्रिया की सीमा में मनुष्य जीता है, तो उसे लगता रहता है - "यह पूरा नहीं है।" "यह पूरा नहीं है।" - ...
2 comments:
Saturday, November 28, 2009

मानव में कल्पनाशीलता उसके समझने के लिए स्त्रोत है.

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कल्पनाशीलता के आधार पर ही हम समझते हैं। अभी तक मानव के इतिहास में, या उपलब्ध वांग्मय में कल्पनाशीलता को समझने के स्त्रोत के रूप में नहीं पहच...
Friday, November 27, 2009

समझना और कार्य-करना

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शब्द के अर्थ को मानव ही समझता है। मानव ही अपनी समझ के अनुसार कार्य करता है। समझना" और "कार्य करना" ये दो भाग हैं। "कार्य...
Tuesday, November 24, 2009

संवाद का उद्देश्य और मर्यादा

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प्रश्न: आपके साथ संवाद का उद्देश्य क्या होगा, और इस संवाद की मर्यादा क्या होगी? उत्तर: संवाद का उद्देश्य तय पहले होना आवश्यक है। किस प्रयोज...
Monday, November 23, 2009

साम्य-ऊर्जा और कार्य-ऊर्जा

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साम्य-ऊर्जा और कार्य-ऊर्जा का अध्ययन जड़-प्रकृति के सन्दर्भ में है। साम्य-ऊर्जा सम्पन्नता वश (जड़) इकाइयों में चुम्बकीय-बल सम्पन्नता है। चु...
Saturday, November 21, 2009

अनुभवमूलक विधि से प्रमाण, अनुभवगामी विधि से अध्ययन

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मानव परम्परा में सुदूर विगत से समझदारी संपन्न होने का प्यास बना ही रहा है। हर पीढी में, किसी आयु तक मनुष्य समझने के पक्ष में ज्यादा से ज्य...

सत्य - ज्ञान - प्रमाण

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आदिकाल से, जबसे ईश्वर और ईश्वरीयता की चर्चा वांग्मय में (अर्थात लेख रूप में) अथवा मुखस्थ विधि से परम्परा के रूप में आरम्भ हुआ - तब से ...
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