Jeevan Vidya - A Study in Coexistence (जीवन विद्या - सह-अस्तित्व में अध्ययन)

This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)

Friday, October 30, 2009

विज्ञान और मानव-भाषा सूत्र

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विज्ञान का प्रयोजन मानव-चेतना विधि से मानव-लक्ष्य और जीवन-मूल्य प्रमाणित करने के लिए दिशा निर्धारित करना है। विज्ञान में "काल-वादी ज्ञा...
Thursday, October 29, 2009

प्रचार-माध्यमो की सार्थकता

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आज सभी प्रचार-माध्यम अपराध-गतिविधियों को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया करता है। प्रचार-माध्यम का मूल स्वरूप सही-गलती को चेताने से है, अथवा ...

विरोध पर विजय पाना सम्भव है.

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आदिकाल से आज तक युद्ध को सर्व-जन मानस में आवश्यकता के रूप में स्वीकारा नहीं गया, एक "मजबूरी" के रूप में ही स्वीकारा गया। ऐसी मजबूर...
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वर्तमान का विखंडन नहीं किया जा सकता.

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वर्तमान का तात्पर्य है - होना, रहना। होने-रहने में क्रियाशीलता सदा-सदा से स्थिति-गति रूप में, फल-परिणाम रूप में, वर्तता ही रहता है, अभी भी ...
Wednesday, October 28, 2009

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोजन

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मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता है - यह सबको पता है। उल्लेखनीय और विचारणीय बात यह है - २१वी सदी तक "कल्पनाशीलता और कर्म-स्वत...
Tuesday, October 27, 2009

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का स्त्रोत क्या है, क्यों है, और कैसा है?

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कल्पनाशीलता के साथ कर्म-स्वतंत्रता हर नर-नारी में, से, के लिए "स्वाभाविक रूप" में है। "स्वाभाविक" का मतलब - "नियत...
Monday, October 26, 2009

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का सार्थक स्वरूप

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मानव में स्मृति और कल्पनाशीलता का स्त्रोत और प्रक्रिया को समझने के लिए अपेक्षा बनी रहती है। इसका मूल कारण हर मानव में - चाहे बच्चे हों, बूढ...
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