Jeevan Vidya - A Study in Coexistence (जीवन विद्या - सह-अस्तित्व में अध्ययन)

This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)

Tuesday, August 25, 2009

मानव का होना और रहना

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अनंत प्रकृति और असीम व्यापक के साथ मानव सोचने, समझने, और जीने योग्य इकाई है। ईश्वर-वाद ने बताया था - "ईश्वर ही दृष्टा है।" यहाँ क...

मानव जाति में मनः स्वस्थता की रिक्तता को भरने के लिए यह विकल्प प्रस्तुत हुआ है.

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समझने के बारे में मुख्य मुद्दा यह है - "पढ़ना समझना नहीं है।" पढने पर "सूचना" होता है। अर्थ की सूचना जब आता है तो उस अ...

स्वीकारना, समझना, और जीना अलग-अलग नहीं हैं.

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आपकी पूरी बात एक बार मेरे view में तो आ गयी है - लेकिन "आत्म-सात" नहीं हुई है। आपका कहना है - "समझ के करो!" मैं कहता हूँ...
3 comments:
Wednesday, August 19, 2009

समझने के पहले स्वावलंबन का डिजाईन होता नहीं है.

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समझने के पहले स्वावलंबन का डिजाईन होता नहीं है। "मैं समझ गया हूँ, प्रमाणित होना है" - इस जगह में स्वावलंबन का डिजाईन जीवन से स्वयं...

अनुभव-मूलक विधि से मनुष्य जीने में प्रमाणित होता है.

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सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व में हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूप में है। सह-अस्तित्व ही चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट है। सह-अस्तित्व म...

जीवन और सह-अस्तित्व के जुड़ने की विधि अनुभव ही है.

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   सुनना भाषा है। समझना अर्थ है। अर्थ अस्तित्व में वस्तु है। वस्तु समझ में आता है, तो हम अर्थ समझे। अर्थ जो समझे - वही अनुभव है। अर्थ ही अनु...

अनुभव-प्रमाण ही परम है.

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अनुभव के बिना प्रमाण नहीं है। अनुभव की अपेक्षा (रोशनी) जीवन में सदा रहता ही है। जीव-चेतना में शरीर-मूलक क्रिया-कलाप होता है। उसमें अनुभव तक ...
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