Jeevan Vidya - A Study in Coexistence (जीवन विद्या - सह-अस्तित्व में अध्ययन)

This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)

Monday, February 18, 2008

सम्प्रेष्णा का गुरु मंत्र

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मानव का मन तीन दिशाओं में एक साथ काम करता है। मन जो तीन दिशाओं में दौड़ता है - उसको कल्पना भी कह सकते हैं, मन की गति भी कह सकते हैं। चयन ...
Thursday, February 14, 2008

प्रमाण के साथ ही समझ पूरा होता है।

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भ्रमित स्थिति में भी आप सत्य की अपेक्षा करते रहे। सत्य की अपेक्षा आप में समाई रही। उसके बाद आपको सूचना मिली की यह अपेक्षा जीवन में है। ...

मनुष्य की कल्पनाशीलता का तृप्ति बिन्दु सह-अस्तित्व में ही है।

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* सत्ता में संपृक्त प्रकृति का बोध बुद्धि में ही होता है। यह मन में नहीं होता। चित्त में चित्रित नहीं होता। बुद्धि में इसका बोध होने पर मन...
Wednesday, February 13, 2008

बोध तक अध्ययन है - उसके बाद अनुभव स्वयंस्फूर्त है।

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प्रिय, हित, लाभ के साथ तुलन रहते प्रिय, हित, लाभ का ही चित्रण रहता है। इस आधार पर वह चिंतन-क्षेत्र में जाता ही नहीं है। शरीर मूलक बात को चि...
Monday, February 11, 2008

अटकाव का कारण है - आप अभी तक जैसे जिए हैं, उसके कुछ बिन्दुओं को अच्छा माने रहना।

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भ्रम-मुक्ति का प्रमाण अपराध-मुक्ति है। अपना-पराया से मुक्ति है। इस जगह पर आने के लिए यह प्रस्ताव रखे हैं। वह प्रस्ताव आपको ठीक लग रहा है। य...
Friday, February 8, 2008

अध्ययन मनुष्य का मनुष्य के साथ ही होता है।

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किताब से सूचना है। अध्ययन मनुष्य का मनुष्य के साथ ही होता है। दो व्यक्ति के बिना प्रमाण का प्रश्न ही नहीं है।  संज्ञानशीलता और संवेदनशीलता...
Thursday, February 7, 2008

अध्ययन करने के लिए कोई अतिवाद करने की आवश्यकता नहीं है।

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जीव चेतना में हम जितना भी करते हैं, उसका गम्य-स्थली सुविधा-संग्रह ही है। सुविधा-संग्रह में पहुँचना अच्छा तो लगता है, किन्तु इसका कोई तृप्ति...
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