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Friday, September 11, 2020

ज्ञान विवेक विज्ञान

ज्ञान है - जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान.  इसका सूचना आपको हो गया है, इसके अध्ययन में हम चल ही रहे हैं.  

ज्ञान के सहमति में विवेक होता है, जो विवेचना है.  विचार स्वरूप में विवेचना है.  विश्लेषण के आधार पर विचार का निश्चयन होना विवेक है.  तीन निश्चयन होते हैं - (१) शरीर का नश्वरत्व, (२) जीवन का अमरत्व, (३) व्यवहार के नियम 

उसके बाद विज्ञान में कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी ज्ञान है.  काल नित्य वर्तमान ही है.  भूत और भविष्य वर्तमान का ही नाम है.  किसी क्रिया की अवधि के आधार पर हम भूत और भविष्य नाम देते हैं.  क्रिया निरंतर है - इसलिए वर्तमान निरंतर है.  जीवन मूल्य (सुख, शान्ति, संतोष, आनंद) और मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) के अर्थ में  निर्णय लेने की क्रिया निर्णयवादी ज्ञान है.  लक्ष्य के प्रति दिशा निर्धारण की क्रिया विज्ञान है.  

आज जो भौतिकवादी विचार प्रचलित है, उससे यह कितना दूर है - आप सोच लो!  विज्ञान को "सच्चाई" से कोई लेन-देन ही नहीं है, वह जो यंत्र बताता है उसको सच मानता है.  भौतिकवादी विधि से अपराध प्रवृत्ति में जाने से सच्चाइयाँ दूर हो गए.  आदर्शवादी विधि से वेद विचार में "सच्चाई" पास लगता था - हमको प्रयत्न करना है, साधना करना है, तो सच्चाई को पा लेंगे - यह सब बात थी.  अब भौतिकवादी विचार के चलते सच्चाई की कल्पना ही दूर हो गयी!  अब यही रास्ता बनता है कि सच्चाइयों को पूरा अध्ययनगम्य ही करा दिया जाए.  साधना पूर्वक जो सच्चाई को पाना था, अध्ययन पूर्वक उसको पाने की बात कर दी.  मानव लक्ष्य और जीवन मूल्य स्वाभाविक रूप से सर्वसम्मत हैं.  सर्वसम्मत उपलब्धियों की "अपेक्षा" होना जीवन सहज है.  यह अपेक्षा जीव-जानवरों में नहीं है, मानव में है - क्योंकि मानव ज्ञानावस्था में है.  मानव लक्ष्य और जीवन मूल्य का पूरा होना ज्ञान का प्रमाण है.

समाधान = सुख

समाधान, समृद्धि = सुख, शान्ति 

समाधान, समृद्धि, अभय = सुख, शान्ति, संतोष

समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व = सुख, शान्ति, संतोष, आनंद 

जीवन में सुख-शांति-संतोष-आनंद मानव परम्परा में समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व स्वरूप में प्रमाणित होता है.  इस तरह आदमी जो व्यक्तिवाद के लिए जो shell बना कर छुपने की जगह बनाता रहता था, वह छुपने की जगह ख़त्म हो गयी.  व्यक्ति का "वैभव" होता है. व्यक्ति के "वाद" की आवश्यकता नहीं है.  व्यक्ति का वैभव सुख-शांति-संतोष-आनंद है, जिसका क्रिया रूप है - समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ सम्वाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

Tuesday, September 1, 2020

क्रिया, काल, वर्तमान

प्रश्न: क्रिया के स्वरूप के बारे में समझाइये.

उत्तर: क्रिया नित्य वर्तमान है.  सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति ऊर्जा संपन्न, बल संपन्न और क्रियाशील है.  यह आधार है.  क्रिया समाप्त नहीं होता है, एक क्रिया से दूसरी क्रिया में बदल सकता है.

क्रिया की व्याख्या है - श्रम, गति, परिणाम.  श्रम और गति के संयुक्त स्वरूप में परिणाम है.  गति और परिणाम के संयुक्त रूप में श्रम है.  श्रम और परिणाम के संयुक्त रूप में गति है.

क्रिया का प्रयोजन है - गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरण पूर्णता. उसमे से गठनपूर्णता नियति विधि से हो चुकी.  क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता की अर्हता जीवन में है.  उसके प्रमाणित होने के लिए मानव परम्परा है.  यही तो मध्यस्थ दर्शन का आत्मा है!  कितना छोटा सा काम है, कितना बड़ा इससे उपकार है - आप सोच लो!  मानव परम्परा में मानव शरीर रचना का प्रकटन नियति विधि से हुआ है - जिसमे मानव का कोई योगदान नहीं है.  शरीर रचना की विधि प्राणकोशिकाओं में ही निहित है.  उस आधार पर मानव शरीर रचना का प्रकटन हुआ, जो जीवन द्वारा कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता व्यक्त होने योग्य हुआ.  इसके चलते मानव जीवों से अच्छा जीने की शुरुआत किया.  इस क्रम में मानव मनाकार को साकार करने में सफल हुआ, लेकिन मनः स्वस्थता को प्रमाणित करना शेष रहा.  मनः स्वस्थता की कमी से ही मानव द्वारा सभी अपराधों को वैध मानते हुए मानव के साथ और इस धरती के साथ अपराध करना हुआ.  इन सबके चलते धरती ही बीमार हो गयी. यदि मनाकार को साकार करने और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने की गति साथ साथ होती तो शायद यह हाल नहीं होता, मानव अपराध ग्रस्त नहीं होता - ऐसा हम अनुमान कर सकते हैं.  अब मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने के लिए मध्यस्थ दर्शन का प्रस्ताव पूरा है या नहीं - इसको जांचो!  

सहअस्तित्व में क्रिया निरंतर है.  हर क्रिया स्थिति-गति के रूप में होती है.  कितने भी सूक्ष्म में जाओ - वो है तो स्थिति-गति ही.  स्थिति के बिना गति होती नहीं.  क्रिया कभी रुकता नहीं है - तो क्रिया में बल और शक्ति दोनों है.  स्थिति में बल और गति में शक्ति की पहचान होती है.  इसके मूल में है साम्य ऊर्जा में सम्पृक्त्ता.  साम्य ऊर्जा में जड़ चैतन्य प्रकृति संपृक्त है इसी लिए स्थिति में बल रहता ही है, गति में शक्ति प्रकट होता ही है.  स्थिति में प्रगति हुए बिना गति के परिवर्तित होने का पता ही नहीं चलता.  स्थिति-गति अविभाज्य वर्तमान है.   

क्रिया को इकाई भी कहा है.  इकाई है - सभी ओर से सीमित होना.  एक पर्वत, एक मानव, एक वृक्ष, एक परमाणु - ये सब अपने में सीमित हैं, इसीलिये "एक" कहलाते हैं.  एक-एक के आधार पर क्रिया के होने का पता चलता है.

क्रिया की अवधि = काल.  किसी क्रिया की अवधि को हम reference मान लेते हैं, उसको हम काल मानते हैं.  उसका विखंडन करके हम काम करते हैं.

प्रश्न: क्रिया को जो हम अभी पहचान पाते हैं वह तो इन्द्रियों द्वारा स्थूल स्तर पर क्रिया की पहचान है.  सूक्ष्म स्तर पर क्रिया की पहचान कैसे होती है?

उत्तर:  जीवन शरीर को जीवंत बनाता है तो उससे संवेदनशील क्रिया होती है, जिससे स्थूल स्तर पर मानव देख पाता है, सुन पाता है, आदि.  संवेदनशीलता का प्रभाव इन्द्रियों के द्वारा ही होता है.  परमाणु सूक्ष्म है.  परमाणु इन्द्रियों से समझ नहीं आता.  मानव के साथ इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर दोनों होता है.  कुछ चीजें हैं जिनको मानव पांच ज्ञानेन्द्रियों से देखता है, फिर उनको समझता है या उसको वह ज्ञानगोचर होता है.  जैसे - पानी को मानव इन्द्रियों से पहचानता है (वो इन्द्रियगोचर है), उसके बाद पानी का स्वरूप एक जलने वाली वस्तु (hydrozen परमाणु) और एक जलाने वाली वस्तु (ऑक्सीजन परमाणु) के संयोग से है - यह जो उसको समझ में आता है, वो ज्ञानगोचर है.  कुछ चीजों को वह समझता है, फिर उनको पांच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा व्यक्त करता है.  

स्थूल स्वरूप में जो वस्तुएं हैं, वो इन्द्रियगोचर हैं.

सूक्ष्म स्वरूप में जो वस्तुएं हैं, वो ज्ञानगोचर हैं.

संवेदनशीलता की सीमा में इन्द्रियगोचर है.  

संवेदनशीलता से जो परे है - वो ज्ञानगोचर है.

कई चीजें स्थूल स्वरूप भी हैं, सूक्ष्म स्वरूप भी हैं और कारण स्वरूप में भी हैं.  (भौतिक रासायनिक संसार की वस्तुएं)

कई चीजें सूक्ष्म स्वरूप और कारण स्वरूप में है.  (जीवन परमाणु सूक्ष्म और कारण के अविभाज्य स्वरूप में है)

एक ऐसा वस्तु है - जो केवल कारण स्वरूप में है.  व्यापक वस्तु कारण स्वरूप में अपरिवर्तनीय यथास्थिति है, वही साम्य ऊर्जा है.  

साम्य ऊर्जा में सम्पूर्ण एक-एक क्रियाएं हैं.  साम्य ऊर्जा में भीगे होने से सभी एक-एक वस्तुओं को ऊर्जा प्राप्त है.  साम्य ऊर्जा प्राप्त होने के आधार पर ही एक-एक वस्तु में ऊर्जा सम्पन्नता, बल सम्पन्नता, क्रियाशीलता है.  जैसे - धरती क्रियाशील है, चंद्रमा क्रियाशील है, हर ग्रह-गोल नक्षत्र क्रियाशील है, फिर धरती पर हर खनिज, हर वनस्पति, हर जीव, हर मानव इसी प्रकार क्रियाशील है.

तो हर वस्तु ऊर्जा संपन्न है इसीलिये क्रियाशील है.  क्रिया से जो ऊर्जा तैयार होता है, वह कार्य ऊर्जा है.  बिजली आदि जो है वह क्रिया से पैदा होने वाली ऊर्जा है.  जैसे मैं अपने दोनों हाथों को रगड़ता हूँ तो उससे गर्मी पैदा होती है, यह क्रिया से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा है.  मेरे दोनों हाथ साम्य ऊर्जा संपन्न हैं ही.  क्रिया करने से साम्य ऊर्जा व्यय होता ही नहीं है, वह बना ही रहता है.  क्रिया तीन ही प्रकार की है - भौतिक क्रिया, रसायन क्रिया और जीवन क्रिया.  ये तीनों क्रियाएं अपार संख्या में हैं.  सर्वाधिक संख्या में भौतिक, उससे कम रासायनिक और उससे कम जीवन वस्तुएं हैं.  इनके permutation-combination में चार अवस्थाएं हैं.  चारों अवस्थाएं इन्द्रियगोचर हैं, उनके ज्ञानगोचर पक्ष की हम बात कर रहे हैं.  साम्य ऊर्जा में सभी वस्तुएं भीगा है, डूबा है, घिरा है - यह समझ में आना ज्ञानगोचर है.  ज्ञानगोचर जीवन में ही होता है, दृष्टिगोचर जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में होता है.  जीवन न रहे, हमको कोई चीज़ दृष्टिगोचर हो जाए - ऐसा होगा नहीं.

प्रश्न:  ज्ञानगोचर और दृष्टिगोचर को उदाहरण के साथ समझाइये.

उत्तर: अनुभव सूक्ष्म से सूक्ष्म तक है.  करना एक सीमा तक ही होता है.  ज्ञान (अनुभव) -> विचार -> करना.   करना मतलब (दूसरी इकाइयों के साथ) योग-संयोग करने वाली क्रिया, जैसे यंत्र बनाना, सड़क बनाना.  

यंत्र बनाने का पहले हममे ज्ञान होता है, कौनसा पुर्जा कहाँ फिट होता है, क्या करता है आदि - यह ज्ञानगोचर है.  फिर पुर्जा बनाने का काम इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर के संयुक्त रूप में होता है.  फिर पुर्जों को assemble करने से यंत्र बन जाता है.  इस विधि से मनाकार को साकार करना होता है.

कई वस्तुएं केवल ज्ञानगोचर हैं, जिनको मानव अपने आचरण में संवेदनशीलता द्वारा प्रमाणित करता है.  जैसे सत्य केवल ज्ञानगोचर है.  सत्य में अनुभव को मानव संवेदनशीलता द्वारा प्रमाणित करता है.  जिससे दूसरों को पता चलता है - यह सत्य है.  इसी तरह समाधान ज्ञानगोचर है, नियम ज्ञानगोचर है, न्याय ज्ञानगोचर है.

पेड़ पौधे पत्तों से सांस लेते हैं, यह बात इन्द्रियगोचर नहीं है, ज्ञानगोचर है.  भौतिक वस्तुएं साम्य ऊर्जा में संपृक्त होने से ऊर्जा संपन्न हैं - यह बात ज्ञानगोचर है.

हर परमाणु स्वयंस्फूर्त क्रियाशील है.  स्वयंस्फूर्त क्रियाशीलता होने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता है.  व्यापक स्वयं पारगामी होने के कारण हर वस्तु ऊर्जा संपन्न है.  ऊर्जा सम्पन्नता ही ज्ञान स्वरूप में मानव में व्यक्त है.  

हर मानव में कल्पनाशीलता प्रभावशील है.  कल्पनाशीलता इन्द्रियगोचर नहीं है.  इन्द्रियों के द्वारा इन्द्रियों की सीमा में ही संवेदनशीलता के रूप में कल्पनाएँ प्रभावित होते हैं.   कल्पनाशीलता जीवन से है.  जीवन समझ में नहीं आने से शरीर से ही कल्पना होता है यह भौतिकवाद में मान लेते हैं.  structure के अनुसार function होता है - ऐसा वो कहते हैं.  

आदर्शवादियों के अनुसार ज्ञानगोचर रहस्य हो गया.  भौतिकवादियों के अनुसार ज्ञानगोचर अनावश्यक हो गया.  

प्रश्न:  क्या ज्ञानगोचर का चित्रण होता है?

उत्तर:  ज्ञानगोचर और दृष्टिगोचर दोनों का चित्रण होता है.

प्रश्न:  स्थिति-क्रिया और गति-क्रिया में क्या भेद है?

उत्तर: स्थिति-गति की समझ ज्ञानगोचर है.  इन्द्रियों से स्थिति-गति का पता नहीं चलता.  स्थिति-क्रिया बल सम्पन्नता है.  गति-क्रिया शक्ति सम्पन्नता है.  होना स्थिति है, रहना गति है.  स्थिति और गति दोनों क्रिया है.  गति क्रिया स्थानांतरण और परिवर्तन का आधार है. स्थिति क्रिया इकाई के रूप में होने का आधार है. अपनी लम्बाई चौड़ाई ऊंचाई के अनुसार हर भौतिक रासायनिक वस्तु का स्थिति बना रहता है.  

प्रश्न:  आप जो कहते हैं कि "क्रियाशीलता के मूल में ऊर्जा सम्पन्नता आवश्यक है" - यह एक तर्क है न?

उत्तर: इस तर्क को मैं (अनुभव सम्पन्नता के साथ) प्रस्तुत करता हूँ, वह आपके लिए दृष्टिगोचर विधि से ज्ञानगोचर तक पहुँचने का रास्ता है.  आप इसको स्वीकार कर सारे बात को सोचते हो, अनुमान करते हो कि इस समझ के साथ मानव अपराध मुक्ति तक आता है या नहीं.  क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता होता है तो अपराध मुक्ति होता ही है.  

मानव परम्परा में कार्य करता हुआ हर जीवन ज्ञानी है या ज्ञानी होने योग्य है.  ज्ञान के परम्परा में होने पर उसको ग्रहण करने की जीवन पात्रता रखता है.  जीवन ज्ञान ग्रहण करता है, शरीर के साथ उसको प्रमाणित करता है.  शरीर क्रिया के लिए प्रेरणा जीवन से है.

ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर के अंतर को समझने की आवश्यकता है.  सारी समझ प्रमाणित होने के लिए है.  समझने के बाद प्रमाण होता ही है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

Thursday, August 27, 2020

अपव्यय और आसक्ति

शरीर जड़ प्रकृति है, जीवन चैतन्य प्रकृति है.  जीवन में अक्षय बल और अक्षय शक्ति है.  अतः इच्छा की अपेक्षा में संवेदनशीलता क्रिया अल्प है.  संवेदनशीलता अल्प है, इच्छा शक्ति विशाल है.  अतः संवेदनशीलता के लिए सम्पूर्ण इच्छा शक्ति का नियोजन "अपव्यय" है.  दूसरे विधि से देखें तो - इच्छाएं जितनी हैं संवेदनाएं उतना काम कर नहीं पाते हैं.  इच्छाओं की पूर्ती संवेदनाओं से नहीं हो सकती.  अतः संवेदनाओं द्वारा इच्छाओं की पूर्ती का प्रयास "आसक्ति" है.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

Wednesday, January 22, 2020

आत्मा और ब्रह्म



तुलन में न्याय-धर्म-सत्य आने पर साक्षात्कार होता ही है.  तुलन व साक्षात्कार होने पर बोध पूर्वक प्रमाणित करने का संकल्प होता है, फलस्वरूप अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित हो जाता है.  सहअस्तित्व स्वरूपी सत्य में न्याय और धर्म समाया ही है.  इसीलिये आत्मा जब सहअस्तित्व में अनुभूत होता है तो जीव-जगत सब समझ में आता है, फलस्वरूप हम प्रमाणित होने योग्य हो जाते हैं.  आत्मा मध्यस्थ क्रिया है, उसमें तो सत्य स्वीकृत होता ही है.  सत्य के अलावा आत्मा में और कुछ स्वीकृत ही नहीं होता.

प्रश्न:  आपने अनुभव दर्शन में लिखा है - "आत्मा प्रकृति का अंश होते हुए भी ब्रह्म से नेष्ठ नहीं है" इसका क्या आशय है?

उत्तर: ब्रह्म व्यापक वस्तु है.  आत्मा मध्यस्थ क्रिया होने से और ब्रह्म मध्यस्थ सत्ता होने से इन दोनों की साम्यता है.  इस साम्यता का बोध होने के फलस्वरूप अनुभव है.  आत्मा व्यापक वस्तु को ज्ञान स्वरूप में अनुभव कर लेता है.  अनुभव मूलक विधि से आत्मा ज्ञान को परस्परता में प्रमाणित करने योग्य हो जाता है.  परस्परता में सत्य संप्रेषित होता है तो वह आत्मा में अनुभव मूलक विधि से ही होता है.  आत्मा जीवन परमाणु का मध्यांश होते हुए, क्रिया होते हुए ब्रह्म से नेष्ठ इसीलिये नहीं है क्योंकि अनुभव मूलक विधि से ही परस्परता में सत्य प्रमाणित होता है, संप्रेषित होता है.

प्रश्न:  आपने लिखा है - "आत्मा सम और विषम से मुक्त है".  तो भ्रम में जीते हुए मानव, अध्ययनशील मानव और अनुभव संपन्न मानव तीनो में यह सम विषम से मुक्त होगी.  फिर अनुभव होने से आत्मा की क्रिया में अंतर क्या हुआ?

उत्तर: आत्मा का सम-विषम से मुक्त होना तो उसकी सदा-सदा की स्थिति है.  आत्मा में मध्यस्थ का प्रकाश होना या नहीं होना - इतना ही अंतर है.  बुद्धि में सत्य बोध न होने से मध्यस्थ का प्रकाश नहीं हुआ था.  इतना ही तो बात है.  हम अध्ययन जो करते हैं वह अनुभव होगा इसीलिये करते हैं, उसमे सिलसिले से समाधान निकलता जाता है.  इसीलिये अध्ययनशील विद्यार्थी में यह विश्वास बनता है कि अध्ययन से अनुभव होगा. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

धैर्य और स्नेह का रास्ता

मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन विधि का रास्ता धैर्य और स्नेह का है - यह हड़बड़ी वाला रास्ता नहीं है, नाराजगी वाला रास्ता नहीं है, आलोचना वाला रास्ता नहीं है, विरोध वाला रास्ता नहीं है.  (अब तक की सोच के अनुसार चलने से) घटनाक्रम में हम सर्वनाश की ओर जा रहे हैं - सर्वशुभ की ओर दिशा के परिवर्तन के लिए यह प्रस्ताव है.  इसकी ज़रूरत है या नहीं - सोच लो! 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

Friday, January 17, 2020

संवेदनाओं का नियंत्रण-बिंदु न मिलने से मानव जाति का इतना भटकाव हुआ



संवेदना = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों का क्रियाकलाप.  जीवन और शरीर का योग होने से संवेदना व्यक्त होता ही है.  आदिमानव में भी यह रहा, आज भी है.  अभी तक संवेदनाओं को पहचान सकने को जागृति माना गया, संवेदनाओं को नहीं पहचान सकने को मरा हुआ माना गया. 

अब यहाँ (मध्यस्थ दर्शन में) प्रस्तावित है - मानव चेतना पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहते हैं, जीव चेतना पूर्वक संवेदनाएं अनियंत्रित रहते हैं.  नियंत्रित संवेदनाओं के साथ मानव व्यवस्था में जीता है,  अनियंत्रित संवेदनाओं के साथ मानव अव्यवस्था में जीता है.

विज्ञान (भौतिकवाद) ने संवेदनाओं के अनियंत्रित होने को ही सच्चाई मान लिया.  आदर्शवाद ने संवेदनाओं के अनियंत्रण का विरोध तो किया, पर संवेदनाओं का नियंत्रण कैसे हो - इसकी पूर्ति नहीं कर पाया.

विज्ञान (भौतिकवाद) शरीर को ही चैतन्य मानता है. आदर्शवाद शरीर को चैतन्य मानने का विरोध तो किया है, लेकिन "आत्मा" नाम से जो कुछ उन्होंने चैतन्यता के बारे में बताया वो रहस्य में फंस गया.  उसके बारे में बात नहीं कर पाए, समझा नहीं पाए, प्रमाणित नहीं कर पाए - चुप हो कर चले गए.  चैतन्यता को बताने के लिए उत्तर भारत में दस अवतारों को माना, दक्षिण भारत में तीन आचार्यों को माना.   तीनो आचार्यों की परम्परा में आदर्शवाद ही रहा, किन्तु उनकी ध्यान और उपासना विधियों में भेद रहा.  इन सभी ने शुभ का आशय व्यक्त किया, पर शुभ के प्रमाणित होने से रह गए.  जहाँ तक अवतारों की बात है, सभी अवतार बल (वध-विध्वंस) के आधार पर प्रतिष्ठित हुए, और उसके साथ ज्ञान को भी जोड़े कि उनमे ऋषित्व होना चाहिए.  ऋषित्व के मूल में "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" ही बताया.  अब इस तरह अवतारों का जितना भी युद्ध हुआ मिथ्या के साथ ही हुआ!  फिर उसका क्या आशय हुआ?  अवतारों ने जो लड़ाइयाँ की और आज जो लड़ाइयाँ हो रही हैं - आदर्शवाद के अनुसार मिथ्या के साथ ही हैं! 

लड़ाइयों को लेकर यहाँ अवधारणा दिए हैं - पशुमानव और राक्षसमानव ही लड़ाई (युद्ध) करता है.  राक्षस मानव ज्यादा वध-विध्वंस करता है, पशु मानव वध-विध्वंस की आहुति होता है.

इस ढंग से आदर्शवादी विधि से मानव परम्परा में भय और प्रलोभन ही संप्रेषित हुआ.  स्वर्ग के प्रति प्रलोभन, नर्क के प्रति भय.  पुण्य के प्रति प्रलोभन, पाप के प्रति भय.  आदर्शवाद के सारे भाषण और उपदेश का अर्थ इतना ही है.  सारे अवतार राक्षसों को नष्ट करने के स्वरूप में रहे.  अलग अलग अवतार कई प्रकार के राक्षसों का संहार करने के लिए सम्मान पाए.  इसके साथ-साथ वे उपदेशात्मक ज्ञान भी दिए कि आदमी को राक्षस नहीं होना चाहिए, नैतिक होना चाहिए, ज्ञानी होना चाहिए, विवेकी होना चाहिए.  आदमी को ज्ञानी होना चाहिए - यह सभी अवतार कहे.  राम भी कहे, कृष्ण भी कहे.  ज्ञान के पास गए तो अव्यक्त-अनिर्वचनीय हो गए.  अब कौनसा ज्ञान है?  जो वचन में आना ही नहीं है, व्यक्त होना ही नहीं है - फिर प्रमाण क्या होगा?  इस प्रकार आदर्शवाद प्रमाणित होने से किनारा कर लिया.

उधर भौतिकवाद सुविधा-संग्रह के चक्कर में आदमी को फंसा दिया.  सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिंदु मिलना ही नहीं है.  सकल अपराध को वैध मानने के बाद भी सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिंदु नहीं मिला.  इस बीच धरती ही बीमार हो गयी.

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों का नियंत्रण-बिंदु न मिलने से इतना भटकाव हुआ.  मानव चेतना पूर्वक संवेदनाओं के नियंत्रण-बिंदु को पाते हैं.  इस नियंत्रण-बिंदु का स्वरूप है - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व.  मानव चेतना को संवेदनाओं द्वारा व्यक्त करने से "मानव संचेतना" कहलाया.  संचेतना का अर्थ है - पूर्णता के अर्थ में चेतना.  पूर्णता का अर्थ मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना ही होता है.  मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना सहज पूर्णता को पाने के लिए "समझदारी" चाहिए.  उसके लिए ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय को स्पष्ट किया.  पहले आदर्शवाद में ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय तीनो को ब्रह्म ही बताया था, अब यहाँ कह रहे हैं - जीवन ज्ञाता है, सहअस्तित्व ज्ञेय है, ज्ञान तीन भाग में है - सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान.  इस ज्ञान को विकल्प विधि से लाये. 

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

तीन भूत और तीन देवता

छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री के साथ वार्ता में मैंने प्रस्ताव रखा - आप अभी शिक्षा में तीन भूत (लाभोन्मादी अर्थशास्त्र, कामोन्मादी मनोविज्ञान, भोगोन्मादी समाजशास्त्र) सब विद्यार्थियों पर चढाते हो.  उन तीन भूतों के साथ तीन देवताओं (आवर्तनशील अर्थशास्त्र, मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान, व्यव्हारवादी समाजशास्त्र) को भी चढाओ!  फिर देख लो इन में से कौन विजय पाता है. 

इससे ज्यादा liberal और इससे ज्यादा generalized कार्यक्रम क्या होगा?

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)