This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
जो कुछ भी प्रकृति में प्रकटन हुआ है वह नियम से हुआ है. नियम के मूल में आशय होता है. वह आशय क्या है? वह आशय साम्य ऊर्जा (सत्ता) है. साम्य ऊर्जा मनुष्य प्रकृति में ज्ञान स्वरूप में है. वह ज्ञान प्रमाणित हो जाए - इसलिए मानव तक प्रकृति में प्रकटन हुआ. एक तरफ़ परमाणु में गठनपूर्णता और दूसरी तरफ रचना में विकास होते हुए मानव शरीर रचना का प्रकटन हुआ. मानव शरीर रचना द्वारा ही जीवन सहज कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता प्रमाणित है. उसके आधार पर मानव में ज्ञान की आवश्यकता है. मानव की परिभाषा है - मनाकार को साकार करने वाला और मनः स्वस्थता का आशावादी व प्रमाणित करने वाला. मनाकार को साकार करने में मानव सफल हुआ है, मनः स्वस्थता का प्रमाणित होना अभी शेष है. उसकी आवश्यकता आपको भी लगती है, मुझे भी लगती है - इस आधार पर हम काम कर रहे हैं.
- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (मार्च २००८, अछोटी)
अनुभव पूरा होता है, उसका अभिव्यक्ति क्रम से होता है. जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तन के लिए अनुभव एक साथ ही होता है. वह क्रम से मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना के रूप में प्रमाणित होता है. अनुभव होने पर दृष्टा पद में हो गए. मैं समझ गया हूँ - इस जगह में रहते हैं. समझा हुए को वितरित करना मानव परंपरा में ही होगा. इसमें पहले मानव चेतना ही वितरित होगी, फिर देव चेतना, फिर दिव्य चेतना. ऐसा क्रम बना है.
अनुभव के बिना मानव चेतना आएगा नहीं. पूरे धरती पर मानव चेतना के प्रमाणित होने के स्वरूप में कम से कम ५% लोग अनुभव संपन्न रहेंगे ही, भले ही बाकी लोग उनका अनुकरण करते रहे. अनुभव सम्पन्नता के साथ देव चेतना और दिव्य चेतना में प्रमाणित होने का अधिकार बना ही रहता है. परिस्थितियाँ जैसे-जैसे बनती जाती हैं, वैसे-वैसे उसका प्रकटन होता जाता है.
दिव्यचेतना के धरती पर प्रमाणित होने का अर्थ है - सभी लोग मानव चेतना और देव चेतना में जी रहे हैं. तभी दिव्य चेतना का वैभव है. दिव्य चेतना के आने के बाद धरती पर कोई प्रश्न ही नहीं है! उसके बाद मानव इस धरती को अरबों-खरबों वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है. यह धरती अपने में शून्याकर्षण में है. यह ख़त्म होने वाला नहीं है. मानव यदि बर्बाद न करे तो यह धरती सदा के लिए है.
- श्रद्धेय श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
बोलना कोई जीना नहीं है. जीने में समाधान ही होगा, समृद्धि ही होगा - और इसके अलावा कुछ भी नहीं होगा. बोलना एक 'सूचना' है. 'जीना' प्रमाण है. जीने में समाधान-समृद्धि ही प्रमाण है - और कुछ प्रमाण होता नहीं है. आप कहीं से भी ले आओ - मानव लक्ष्य इन दोनों में ही ध्रुवीकृत होता है. परिवार का डिजाईन समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने से निकलता है.
"परिवार" शब्द मानव परंपरा में है किन्तु शास्त्रों में नहीं है. शास्त्रों में परिवार की बात करते तो उसका डिजाईन बताना पड़ता! मध्यस्थ दर्शन के पहले जो कुछ भी शास्त्रों में है - उसमें परिवार का कोई डिजाईन नहीं है. परिवार का डिजाईन बताने की अर्हता विगत के शास्त्रकारों के पास नहीं है. वहां "व्यक्ति" से सीधे "समाज" की बात की गयी है. यहाँ (मध्यस्थ दर्शन) के अलावा परिवार के बारे में कोई चूं नहीं किया है! परिवार का लिंक ही छूट गया - इसलिए दूरी बनी रही. सहअस्तित्व विधि को छोड़ करके इस लिंक को कोई नहीं जोड़ सकता. व्यक्ति और समाज के बीच परिवार एक सेतु है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
समझाने वाले का पलड़ा ज्यादा भारी लगता रहे तो समझने वाले को समझ दूर ही लगती रहती है. अध्यापक यदि दूरी बना के रखे तो उसका multiply होना मुश्किल है. हमारा उद्देश्य multiply होना है.
मेरी समीक्षा में यह आ गया था कि राम multiply नहीं हुआ - जिसको मैं बहुत पढ़ा था. कृष्ण multiply नहीं हुआ - जिसकी रंगरेली से लेकर कूटनीति तक मैंने सब पढ़ा है. गाँधी जी आये - multiply नहीं हुए. विनोबा आये - multiply नहीं हुए. बुद्ध आये - multiply नहीं हुए. महावीर आये - multiply नहीं हुए. ईसा मसीह आये, वो कीला ठुकवा लिए - multiply नहीं हुए. हर व्यक्ति कीला ठुकवाने को तैयार नहीं हुआ शायद!
अब इस अनुसन्धान के सफल होने से multiply होने का एक रास्ता बना है. समाधान-समृद्धि का मॉडल multiply हो सकता है. मेरे assessment में यह आ गया कि यह सबकी ज़रुरत है, सबको स्वीकृत है.
प्रश्न: इतना सब ज्ञान जो आप लेकर चल रहे हैं, आपको भारी नहीं लगता?
उत्तर: कहाँ कुछ भारी है? अनुभव में कुछ बोझ होता ही नहीं है. synthesis में बोझ नहीं है. सब कुछ मूल्यांकन और समीक्षा में आने पर बोझ नहीं है. समाधान के अर्थ में ही यथास्थिति का समीक्षा हुआ रहता है. समाधान नहीं हो तो समीक्षा भी नहीं हो सकता. बोझ तभी तक है जब तक समाधान नहीं है. इसी आधार पर कह रहे हैं - समाधान-समृद्धि सबको स्वीकार है. चैन से सोचना, चैन से करना, चैन से सोना, चैन से जीना!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
परंपरा में जो नहीं था उसका प्रस्ताव प्रस्तुत करना अनुसंधान है. प्रस्ताव को समझना शोध है. समझे बिना हम कुछ भी करते हैं तो वह अधूरा होता है. समझने के लिए पूरा प्रयत्न होना चाहिए. समझने में हम धीरे-धीरे भी समझ सकते हैं, जल्दी भी समझ सकते हैं.
प्रश्न: अभी जो दर्शन के लोकव्यापीकरण के प्रयास चल रहे हैं, आप उनको कैसे देखते हैं? क्या वे आपकी नज़र में जागृत परंपरा के भ्रूण स्वरूप हैं?
उत्तर: जागृत परंपरा के लिए जो ज्ञान चाहिए वह मेरे पास है. उसमें मैं पारंगत हूँ और स्वयं प्रमाण हूँ. यहाँ से शुरुआत है. यह इन कार्यक्रमों के जागृत परंपरा के "भ्रूण" होने की बात नहीं है. आपकी भाषा को ठीक होने की आवश्यकता है. मैं स्वयं प्रमाण हूँ, उस प्रमाण के multiply होने के लिए ये कार्यक्रम हैं. multiply होने के क्रम में बहुत सारे लोग शुभ का स्वागत करने के लिए बैठे हैं. शुभ के लिए शंका करने वाले भी बैठे हैं. इन दो चैनल में आदमी मिलता है, इसमें हमको कोई आश्चर्य नहीं है. जो जिस चैनल में जाना चाहता है, जाए! हम तो किसी को मजबूर करने वाले नहीं हैं कि आप ऐसा ही करो! आपको जैसा इच्छा हो आप वैसा करो!
प्रश्न: इस तरीके से आप सबके साथ कैसे जुडेंगे?
उत्तर: जिसको ज्यादा ज़रुरत है वो पहले आएगा, उसके बाद वाला उसके पीछे आएगा, उसके बाद वाला उसके पीछे आएगा! ऐसा मैं अपने में विन्यास लगा लेता हूँ. इसमें क्या कोई बचेगा?
दो तरीके हैं जुड़ने के - पहला, मॉडल को बनाने के basic/foundation work में शामिल होना है, दूसरा - मॉडल के प्रमाणित होने के बाद शामिल हो जाना है.
प्रश्न: लेकिन अभी स्वयं समझ में पक्के हुए बिना कैसे इसको लेकर कुछ करें?
उत्तर: प्रमाणों के आधार पर हम पक्के होंगे. (अनुकरण पूर्वक) प्रमाणित करते हुए समझना ज्यादा प्रभावशाली तरीका है. स्वयं पूरे शोध पूर्वक समझने की जिम्मेदारी लेने वाले तरीके में अपेक्षाकृत कम बल है.
"अच्छा काम करना है" - यह उद्देश्य आप में कहीं न कहीं बन चुका है. उसके लिए आवश्यक योग्यता अर्जित होने की घटना जब होना है तब घटित हो जाएगा. इसमें देरी-जल्दी की बात नहीं है. जितना देर में हम कर लेते हैं, वही हमारी अर्हता है. जैसे - मैंने भी इस समझ को किसी मुहूर्त में ही हासिल किया और अपने को परिपूर्ण होना स्वीकारा. अब इसमें मैं देरी क्या गिनूँ, जल्दी क्या गिनूँ? जब घटित होगा तब गणना हो जाएगा कि कितना समय लगा! इसमें भविष्यवाणी इतना ही किया जा सकता है - "समझदारी का यह प्रस्ताव है, आवश्यकता के अनुसार आदमी इसको ग्रहण करेगा."
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
मेरी साधना जब फलवती हुआ तो पता चला यह पूरी बात मेरे अकेले की नहीं है, यह मानव जाति की सम्पदा है. मानव जाति के पुण्य से यह मुझे हाथ लगा है - यह मैंने स्वीकार लिया. अब इसको मानव को समर्पित करने की जिम्मेदारी, यानी इसके लोकव्यापीकरण करने की जिम्मेदारी को मैंने स्वीकार लिया. लोकव्यापीकरण के लिए हर बात का उत्तर चाहिए. मानव कैसे रहेगा, शिक्षा कैसे रहेगा, संविधान कैसा रहेगा, आचरण कैसा रहेगा. यह न कम है, न ज्यादा है.
साधना से वस्तु (समझदारी) प्राप्त करना और उसका लोकव्यापीकरण करना दो अलग-अलग संसार ही है. लोकव्यापीकरण के लिए जीता जागता मॉडल चाहिए. साधना में मैं विरक्ति विधि से रहा. विरक्ति समझदारी का कोई मॉडल नहीं है. समझदारी का मॉडल है - समाधान समृद्धि. समझदारी से समाधान संपन्न मैं हो ही गया था, श्रम से समृद्धि का मैंने जुगाड़ कर लिया!
मानव जाति के पुण्य से मैं यह दर्शन को पाया हूँ, मानव जाति के पुण्य से यह सफल भी होगा. मानव जाति में शुभ स्वरूप में जीने की अपेक्षा रही है, पर शुभ का मॉडल नहीं रहा. अब मॉडल आ गया. minimum model को मैं जी कर प्रमाणित किया हूँ. अब अगला स्टेप है - कम से कम १०० परिवार इस समझ को एक गाँव में स्वराज्य व्यवस्था के स्वरूप को प्रमाणित करें और १२वीं तक एक शिक्षा संस्था को स्थापित करें. इसके बाद संसार में इसका ध्यानाकर्षण शुरू होगा. उसके बाद १०० परिवार से विश्व परिवार तक कैसे प्रमाणित होंगे, इसको सोचेंगे.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
दासत्व से मुक्ति स्वावलंबन से आता है. स्वावलंबन समाधान से आता है. स्वावलंबन की चर्चा कब से हो रही है - पर क्या स्वावलंबन हो पाया? अभी कुछ भी चोरी, सेंधमारी, लूटमारी, जानमारी करके पैसे कमा लेने को स्वावलंबन कहते हैं. इस ढंग से क्या कोई स्वावलंबन होता है?
प्रश्न: स्वावलंबन क्या है?
उत्तर: हमारे परिवार के शरीर पोषण, संरक्षण, और समाज गति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जितना चाहिए उतना सामान्याकांक्षा या महत्त्वाकांक्षा संबंधी कोई भी वस्तु का उत्पादन कर लेना. समाधान के बिना स्वावलंबन को इस प्रकार पहचानने का प्रवृत्ति ही नहीं बनता. समाधान के बिना सेंधमारी, लूटमारी, जानमारी का ही प्रवृत्ति रहता है.
- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)