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Thursday, January 28, 2016

आशा, कामना, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति

"मानव शुभ आशा से संपन्न है ही, यही अभ्यास पूर्वक क्रम से कामना, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति सुलभ होता है.

शुभकामना का उदय मानवीयता में ही प्रत्यक्ष होता है, यही प्रेमानुभूति के लिए सर्वोत्तम साधना है.

शुभकामना क्रम से इच्छा में, इच्छा तीव्र-इच्छा में, एवं संकल्प में तथा भासाभास, प्रतीति एवं अवधारणा में स्थापित होता है.  फलतः प्रेममयता का अनुभव होता है.

प्रेममयता ही व्यवहार में मंगलमयता एवं अनन्यता को प्रकट करती है, जो अखंड समाज का आधार है. "

- श्रद्धेय नागराज जी 

Monday, January 4, 2016

मानवीय आहार (भाग-२)


आहार-पद्दति को लेकर मानव अभी तक अनेक प्रकार के अनाजों को पैदा करने की हैसियत पा चुका है.  विज्ञान आने के बाद उस हैसियत में कमी हुई है.  हमारे देश में विज्ञान के प्रचलन से पहले लगभग ७००० प्रकार के धान थे.  अब ७०० से कम ही होंगे।  थोड़े दिन बाद बीज केवल विज्ञानियों की प्रयोगशालाओं में ही रह जाएगा, किसानों के पास एक भी बीज नहीं रहेगा।  उसकी तैयारी कर ही लिए हैं.  इस तरह विज्ञान क्या मानव के लिए उपकारी हुआ या बर्बादी किया - यह सोचना पड़ेगा।  विज्ञान से मानव जाति को कोई मदद नहीं हुआ, ऐसा मेरा कहना नहीं है.  दूरगमन, दूरश्रवण, दूरदर्शन सम्बन्धी यंत्र-उपकरणों के साकार होने से मानव जाति को गति के सम्बन्ध में बहुत उपकार हुआ है.  तर्क संगत विधि से वार्तालाप करने की जो बहुत सारी खिड़कियाँ विज्ञान ने खोली, यह भी उपकार हुआ.  इन दो के अलावा यदि और कोई उपकार हुआ होगा तो विज्ञानियों से चर्चा करके हम पहचानेंगे।  लेकिन बाकी दिशाओं में जो क्षति हुई है, उसको अनदेखा नहीं किया जा सकता।  उपकार जो हुआ उसका मूल्यांकन होना चाहिए, क्षति जो हुई उसकी समीक्षा भी होनी चाहिए।  विज्ञान से बर्बादी भी हुआ ही है.  प्रयोगशाला में जो उन्नत बीज बनाने का प्रयास किया, उन बीजों की परंपरा नहीं बन पायी, उल्टे प्राकृतिक रूप में बनी बीज परम्पराएं ध्वस्त हो गयी, जिससे किसान खाली बैठने की जगह में आ गया.

इसका उपाय है कि किसान जागरूक हों और अपने खेती के बीजों को संरक्षित करें।  इस उपाय को नहीं अपनाते हैं तो किसान विज्ञानियों पर आश्रित हो जाएगा।   बीज उनसे नहीं मिला तो दाना नहीं बो पायेगा।

विज्ञान विधि से मानव अपने आहार का निर्णय नहीं कर पाया कि उसे शाकाहारी होना है या माँसाहारी।  विज्ञान ने मानव के आहार को लेकर निर्णय पर पहुँचने में अड़चन पैदा किया।  विज्ञान ने शाकाहार और माँसाहार की समानता को प्रतिपादित किया, क्योंकि विज्ञान विधि से माँस का परीक्षण करने पर उसमे भी पुष्टि-तत्वों का पहचान होता है - इसमें दो राय नहीं है.  शरीर में पुष्टि तत्व का उपयोग होता है जो मांस में परिणित होता है.  वही पुष्टि तत्व वनस्पतियों में भी मिलता है.  जो लोग वनस्पतियों का सेवन करते हैं उनके शरीर में भी पुष्टि तत्व बनता है और जो लोग माँस का सेवन करते हैं उनमे भी पुष्टि तत्व बनता है.

शाकाहार और माँसाहार को लेकर मेरा मंतव्य "मानसिकता" से सम्बद्ध है.  शाकाहार या माँसाहार के सम्बन्ध में निर्णय इस आधार पर है कि मानव को कैसी मानसिकता का होना है.  सम्पूर्ण माँसाहार हिंसा और शोषण की मानसिकता की ओर प्रवृत्त करता है.  हिंसा और शोषण मानव परंपरा के लिए अत्यंत हानिप्रद है.  यह हानिप्रद है - चाहे परिवार के स्तर पर हो, या समाज के स्तर पर हो, या व्यवस्था के स्तर पर हो, या राष्ट्र के स्तर पर हो, या अंतरराष्ट्र के स्तर पर हो.  माँसाहार और शाकाहार में पुष्टि-तत्व की समानता को बता कर विज्ञान ने सिर का दर्द पैदा किया।  विज्ञान का ऐसा करने का कारण उसका "मानसिकता" के स्वरूप को न पहचान पाना ही है.  विज्ञान चैतन्यता को शरीर से भिन्न वस्तु के रूप में नहीं पहचान पाया, इसलिए ऐसी महानतम गलती कर बैठा।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आंवरी १९९७)

Friday, January 1, 2016

मानवीय आहार (भाग-१)


मानव का व्यक्तित्व उसके आहार, विहार और व्यवहार का संयुक्त स्वरूप है.  इसमें से आहार और विहार स्वास्थ्य से सम्बंधित है.  स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए मानव को अपने आहार को पहचानने की आवश्यकता है.  मानव अपने आहार को अभी तक पहचाना या नहीं पहचाना - पहले इसी को सोच लो!  इस बारे में हमारा उद्घोष यही है - "मानव अभी तक मानवीय आहार को पहचाना नहीं है."  यह कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं है.  यह किसी का पक्ष-विपक्ष नहीं है.  मानव को मानवीय आहार को पहचानने की आवश्यकता है या नहीं? - इस बारे में आगे विचार करेंगे.

कुत्ते और मानव के आहार को देखें तो पता लगता है, कुत्ता माँसाहार भी करता है और शाकाहार भी करता है, अभी मानव के आहार के साथ भी वैसा ही है.  कुत्ते और मानव के विहार को देखें तो पता चलता है, कुत्ता भी संवेदनशीलता की सीमा में विहार करता है और अभी मानव का विहार भी संवेदनशीलता की सीमा में ही है. अब मानव के आहार-विहार और कुत्ते के आहार-विहार में फर्क क्या हुआ?  यह तुलनात्मक विश्लेषण मैंने आपके सोचने के लिए प्रस्तुत किया।  मानव ने अपनी आहार-विधि को पहचान लिया है माना जाए या नहीं पहचाना है, माना जाए?  इसी आहार विधि को मानव व्यापार में लगाता है, जबकि कुत्ता नहीं लगाता। मानव आहार को पैकेट बना कर, डब्बे में बंद करके व्यापार में लगाता है.  कुत्ता यह धंधा नहीं करता।   यहाँ से कुत्ते और मानव में अंतर शुरू हुआ.  उससे पहले अनिश्चित आहार और संवेदनशीलता सीमा में विहार कुत्ते और मानव में एक जैसा है.

अभी तक मानव न मानवीय आहार को पहचान पाया है, न निष्ठा पूर्वक उसको लेकर चलने में समर्थ हो पाया है.  अब कितने युगों तक और इंतज़ार करना है, कि शायद आगे भविष्य में पहचान ले?  अब धरती बीमार हो गयी है, और इंतज़ार का आपके पास कितना समय है?  यह बात जो मैं कह रहा हूँ यदि झूठ है तो इसको न माना जाए.  यदि यह सच है तो इस पर सोचा जाए.

मानवीय आहार और मानवीय विहार के स्वरूप को पहचाने बिना मानव का व्यवस्था में जीना बन नहीं पायेगा।  आहार-विहार में ही विचलित हो गया तो इसके बाद कौनसा व्यवस्था में जियेगा?

मानव को जीवों से भिन्न मानवीय स्वरूप में जीने का निर्णय लेना है और उसके अनुसार पालन करना है.  पालन करना ही निर्णय हुआ का प्रमाण है.

मेरा जो अनुभव और अभ्यास है, उसके अनुसार मैं कह रहा हूँ - मानव की शरीर-रचना शाकाहारी शरीर के रूप में बनी हुई है.  मानव की आँतें, दाँत और नाखून शाकाहारी जीव शरीरों के समान हैं.  शाकाहारी जीव होठ से पानी पीते हैं, जबकि मांसाहारी जीव जीभ से पानी पीते हैं.  इस प्रकार यदि हम निर्णय कर पाते हैं कि मानव शरीर शाकाहारी जीवों के सदृश है तो हम मानवीय आहार पद्दति को पहचान पाते हैं.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (१९९७, आँवरी)

Tuesday, December 15, 2015

नित्य-अनित्य ज्ञान

"नित्य-अनित्य ज्ञान के बिना मानव में स्व-धर्म  निष्ठा नहीं पायी जाती है." - श्रद्धेय नागराज जी 

Monday, November 9, 2015

ज्ञान, विवेक, विज्ञान


जागृत मानव ज्ञान, विवेक और विज्ञान को अपने जीने में प्रमाणित करता है.

ज्ञान मानव में वास्तविकता या अस्तित्व की स्वीकृति के स्वरूप में होता है.  दो तरह की वस्तुएँ हैं - सत्ता और प्रकृति।  सत्ता और प्रकृति के सह-अस्तित्व (सम्पृक्तता) के ज्ञान को 'सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान" कहा है.  यह ज्ञानगोचर ही है.  इसमें इन्द्रियों से कुछ दिखने, सूंघने, चखने, छूने, सुनने की कोई बात नहीं है.  यह केवल (भास, आभास, और प्रतीत होकर) अनुभव में आने वाली बात है.  दूसरे चैतन्य वस्तु के स्वरूप का ज्ञान - या "जीवन ज्ञान"।  जीवन को भी इन्द्रियों से देखा नहीं जा सकता, यह केवल ज्ञानगोचर वस्तु है, उसके ज्ञान की केवल स्वीकृति होती है.  तीसरे, मानव के निश्चित आचरण के स्वरूप का ज्ञान - या "मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान"।  मानवीयता पूर्ण आचरण इन्द्रियगोचर भी है और ज्ञानगोचर भी है.  व्यवहार, चरित्र, सदुपयोग-सुरक्षा सम्बन्धी कार्यकलाप और व्यवस्था में भागीदारी इन्द्रियगोचर भी है, जिसको हम संवेदनाओं से भी पहचान सकते हैं.  किन्तु "मानव का निश्चित आचरण" अस्तित्व में एक वास्तविकता है, इसकी केवल स्वीकृति या अनुभव ही होता है.

विवेक मानव में निश्चयन के स्वरूप में होता है.  ज्ञान के आधार पर विवेचना होती है - क्या वस्तु नश्वर है, क्या वस्तु अमर है, और किस प्रकार जीने से ताल-मेल (समाधान) रहता है और किस प्रकार जीने से समस्या आती है.  यह विवेचना ज्ञान को मानव द्वारा  अपने जीने के लिए स्वीकारने के अर्थ में होती है.  मेरे जीने में क्या "सही" है और क्या "गलत" है, यह निश्चयन हो जाना ही विवेक है.   ज्ञान में अनुभव के बिना विवेक नहीं होता।  विवेक का स्वरूप है - जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व, और व्यवहार के नियम।

विज्ञान मानव के कार्य और व्यवहार में आता है.  विवेक में जो सही के प्रति निश्चयन हुआ, उसको क्रियान्वित करने के लिए विज्ञान है.  विज्ञान इस तरह देश-काल, प्रक्रिया और निर्णय लेने से सम्बंधित है.  क्रियान्वित करने में समय का ज्ञान आवश्यक है - जिसको कहा "काल वादी ज्ञान".  कार्य और व्यवहार अन्य मानवों और मनुष्येत्तर संसार की परस्परता में ही होता है.  इसलिए भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया और जीवन क्रिया तथा इनके अंतरसंबंधों के प्रति स्पष्ट होना आवश्यक है - इसको "क्रिया वादी ज्ञान" कहा.  मानव के जीने का मतलब सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करना है, और उसमें हर क्षण निर्णय लेने की आवश्यकता है, क्योंकि जीने में हर क्षण अनेक विकल्प होते हैं, और उनमे से एक को करने का निर्णय लेना आवश्यक है - इसीको "निर्णय वादी ज्ञान" कहा.

काल वादी, क्रिया वादी और निर्णय वादी ज्ञान को जागृत मानव कारण-गुण-गणित विधि से अपने जीने में प्रमाणित करता है.  कारण क्रिया की पृष्ठ-भूमि होती है.  कोई भी क्रिया क्यों हो रही है या हुई, वह उसका कारण होता है.  क्रिया और कारण अविभाज्य होता है.  कारण क्रिया से अलग नहीं होता।  जैसे - बीज का अंकुरित होना क्रिया है, उसका कारण उस बीज के स्वरूप में ही समाहित है.  मानव का जागृत होना एक क्रिया है, यह मानव के स्वरूप में ही समाहित है.  कारण ही धर्म है.

हर क्रिया का कुछ प्रभाव होता है.  प्रभाव को ही गुण कहा है.  क्रियाओं के परस्पर प्रभाव से वातावरण बनता है.  वातावरण की अनुकूलता होने पर क्रिया में स्फुरण होता है.  जैसे - बीज में अंकुरण होने का कारण होते हुए भी, जब तक उसका वातावरण उगने के अनुकूल नहीं बनता, तब तक उसमें अंकुरण प्रक्रिया नहीं शुरू होती।  मानव में जागृति का कारण होते हुए भी, जब तक अध्ययन/शिक्षा या मानवीय परंपरा का वातावरण उसको उपलब्ध नहीं होता, उसमें साक्षात्कार पूर्वक बोध होने की शुरुआत नहीं होती।

हर क्रिया का फल-परिणाम होता है.  फल-परिणाम को गिना भी जा सकता है.  जैसे - एक वृक्ष में कितने फल लगे, उन फलों से कितने बीज मिले, उन बीजों से कितने नए पौधे बने - इसको गिना जा सकता है. गणित या गणना की कार्य और व्यवहार में आवश्यकता है.  समय, लम्बाई, ताप, भार आदि को नापना होता है.  इसको सूक्ष्म (micro) और स्थूल (macro) दोनों स्तरों पर किया जाता है.

इस तरह जागृत मानव में ज्ञान स्वीकृति के स्तर पर, विवेक निश्चयन के स्तर पर और विज्ञान कार्य-व्यवहार के स्तर पर प्रमाणित होता है.  ये तीनों एक साथ होते हैं.  "विवेक सम्मत विज्ञान" और "विज्ञान सम्मत विवेक"  होने के लिए ज्ञान होना आवश्यक है.  विवेक विज्ञान के साथ "व्यवहार के नियम" के साथ जुड़ता है.  विज्ञान विवेक के साथ "निर्णयवादी ज्ञान" के साथ जुड़ता है.  ज्ञान विवेक के साथ "मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान" के आधार पर जुड़ता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)