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Tuesday, December 15, 2015

नित्य-अनित्य ज्ञान

"नित्य-अनित्य ज्ञान के बिना मानव में स्व-धर्म  निष्ठा नहीं पायी जाती है." - श्रद्धेय नागराज जी 

Monday, November 9, 2015

ज्ञान, विवेक, विज्ञान


जागृत मानव ज्ञान, विवेक और विज्ञान को अपने जीने में प्रमाणित करता है.

ज्ञान मानव में वास्तविकता या अस्तित्व की स्वीकृति के स्वरूप में होता है.  दो तरह की वस्तुएँ हैं - सत्ता और प्रकृति।  सत्ता और प्रकृति के सह-अस्तित्व (सम्पृक्तता) के ज्ञान को 'सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान" कहा है.  यह ज्ञानगोचर ही है.  इसमें इन्द्रियों से कुछ दिखने, सूंघने, चखने, छूने, सुनने की कोई बात नहीं है.  यह केवल (भास, आभास, और प्रतीत होकर) अनुभव में आने वाली बात है.  दूसरे चैतन्य वस्तु के स्वरूप का ज्ञान - या "जीवन ज्ञान"।  जीवन को भी इन्द्रियों से देखा नहीं जा सकता, यह केवल ज्ञानगोचर वस्तु है, उसके ज्ञान की केवल स्वीकृति होती है.  तीसरे, मानव के निश्चित आचरण के स्वरूप का ज्ञान - या "मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान"।  मानवीयता पूर्ण आचरण इन्द्रियगोचर भी है और ज्ञानगोचर भी है.  व्यवहार, चरित्र, सदुपयोग-सुरक्षा सम्बन्धी कार्यकलाप और व्यवस्था में भागीदारी इन्द्रियगोचर भी है, जिसको हम संवेदनाओं से भी पहचान सकते हैं.  किन्तु "मानव का निश्चित आचरण" अस्तित्व में एक वास्तविकता है, इसकी केवल स्वीकृति या अनुभव ही होता है.

विवेक मानव में निश्चयन के स्वरूप में होता है.  ज्ञान के आधार पर विवेचना होती है - क्या वस्तु नश्वर है, क्या वस्तु अमर है, और किस प्रकार जीने से ताल-मेल (समाधान) रहता है और किस प्रकार जीने से समस्या आती है.  यह विवेचना ज्ञान को मानव द्वारा  अपने जीने के लिए स्वीकारने के अर्थ में होती है.  मेरे जीने में क्या "सही" है और क्या "गलत" है, यह निश्चयन हो जाना ही विवेक है.   ज्ञान में अनुभव के बिना विवेक नहीं होता।  विवेक का स्वरूप है - जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व, और व्यवहार के नियम।

विज्ञान मानव के कार्य और व्यवहार में आता है.  विवेक में जो सही के प्रति निश्चयन हुआ, उसको क्रियान्वित करने के लिए विज्ञान है.  विज्ञान इस तरह देश-काल, प्रक्रिया और निर्णय लेने से सम्बंधित है.  क्रियान्वित करने में समय का ज्ञान आवश्यक है - जिसको कहा "काल वादी ज्ञान".  कार्य और व्यवहार अन्य मानवों और मनुष्येत्तर संसार की परस्परता में ही होता है.  इसलिए भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया और जीवन क्रिया तथा इनके अंतरसंबंधों के प्रति स्पष्ट होना आवश्यक है - इसको "क्रिया वादी ज्ञान" कहा.  मानव के जीने का मतलब सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करना है, और उसमें हर क्षण निर्णय लेने की आवश्यकता है, क्योंकि जीने में हर क्षण अनेक विकल्प होते हैं, और उनमे से एक को करने का निर्णय लेना आवश्यक है - इसीको "निर्णय वादी ज्ञान" कहा.

काल वादी, क्रिया वादी और निर्णय वादी ज्ञान को जागृत मानव कारण-गुण-गणित विधि से अपने जीने में प्रमाणित करता है.  कारण क्रिया की पृष्ठ-भूमि होती है.  कोई भी क्रिया क्यों हो रही है या हुई, वह उसका कारण होता है.  क्रिया और कारण अविभाज्य होता है.  कारण क्रिया से अलग नहीं होता।  जैसे - बीज का अंकुरित होना क्रिया है, उसका कारण उस बीज के स्वरूप में ही समाहित है.  मानव का जागृत होना एक क्रिया है, यह मानव के स्वरूप में ही समाहित है.  कारण ही धर्म है.

हर क्रिया का कुछ प्रभाव होता है.  प्रभाव को ही गुण कहा है.  क्रियाओं के परस्पर प्रभाव से वातावरण बनता है.  वातावरण की अनुकूलता होने पर क्रिया में स्फुरण होता है.  जैसे - बीज में अंकुरण होने का कारण होते हुए भी, जब तक उसका वातावरण उगने के अनुकूल नहीं बनता, तब तक उसमें अंकुरण प्रक्रिया नहीं शुरू होती।  मानव में जागृति का कारण होते हुए भी, जब तक अध्ययन/शिक्षा या मानवीय परंपरा का वातावरण उसको उपलब्ध नहीं होता, उसमें साक्षात्कार पूर्वक बोध होने की शुरुआत नहीं होती।

हर क्रिया का फल-परिणाम होता है.  फल-परिणाम को गिना भी जा सकता है.  जैसे - एक वृक्ष में कितने फल लगे, उन फलों से कितने बीज मिले, उन बीजों से कितने नए पौधे बने - इसको गिना जा सकता है. गणित या गणना की कार्य और व्यवहार में आवश्यकता है.  समय, लम्बाई, ताप, भार आदि को नापना होता है.  इसको सूक्ष्म (micro) और स्थूल (macro) दोनों स्तरों पर किया जाता है.

इस तरह जागृत मानव में ज्ञान स्वीकृति के स्तर पर, विवेक निश्चयन के स्तर पर और विज्ञान कार्य-व्यवहार के स्तर पर प्रमाणित होता है.  ये तीनों एक साथ होते हैं.  "विवेक सम्मत विज्ञान" और "विज्ञान सम्मत विवेक"  होने के लिए ज्ञान होना आवश्यक है.  विवेक विज्ञान के साथ "व्यवहार के नियम" के साथ जुड़ता है.  विज्ञान विवेक के साथ "निर्णयवादी ज्ञान" के साथ जुड़ता है.  ज्ञान विवेक के साथ "मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान" के आधार पर जुड़ता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Saturday, July 18, 2015

स्वानुशासन

समाधान के इस प्रस्ताव में तर्क द्वारा छेद करने की कोई जगह नहीं है.  समस्या की हर बात में छेद रहता ही है.  तर्क का प्रतितर्क देने से समाधान नहीं होता।  समाधान से तर्क संतुष्ट होता है.  समाधान के आगे तर्क करने की ताकत ही समाप्त हो जाता है.  प्रमाण सामने हो, अनुभव सामने हो तो फिर उससे क्या तर्क करेंगे?  मैं स्वयं अनुभव संपन्न हो कर समाधान-समृद्धि का प्रमाण हूँ.  समाधान के साथ तर्क होता ही नहीं है, कुतर्क भी नहीं होता.

अवधारणा होते तक तर्क है, अवधारणा के बाद कोई तर्क नहीं है.  तर्क पुरुषार्थ के साथ है, वहाँ उसका प्रयोग होना भी चाहिए।  किन्तु पुरुषार्थ के बाद परमार्थ में तर्क का प्रयोग नहीं है.  परमार्थ में पुरुषार्थ विलय होता ही है. पुरुषार्थ परमार्थ में समावेश होता ही है.  पुरुषार्थ परमार्थ का समर्थन देता ही है.  यह नियम है, नियति-सम्मत है.

मानव जब से इस धरती पर प्रकट हुआ तभी से न्याय को स्वयंस्फूर्त चाहता है.  न्याय की चाहत मानव में आदि काल से है, पर उसको न्याय मिला नहीं।  मानव को न्याय मिला नहीं पर उसकी चाहना उसमें बरकरार रही.  यह कैसे हो गया?  आप भी न्याय चाहते हैं, मैं भी न्याय चाहता हूँ.  चाहने में हम एक समान हैं.  अब मैं जो पाया हूँ, उसको न्याय माना जाए तो उसको अनुकरण किया जा सकता है, फिर प्रमाणित करके देखा जा सकता है.  अनुकरण करने पर प्रमाणित करने की इच्छा होता ही है.  प्रमाणित करने पर परंपरा बनेगी।  परंपरा की फिर पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता होती है.  परंपरा के रूप में स्थापित हो जाना एक सौभाग्यशाली स्थिति होती है.  न्याय के इस प्रस्ताव में कोई कमी हो तो बताओ?  यदि कमी नहीं है तो प्रभावशील होने की बात है.  उसके लिए एक व्यक्ति से शुरुआत हुई, उससे १००-२०० व्यक्ति प्रभावित हुए, आगे कैसे होगा इसको देखते हैं!  प्रभावित होने का मतलब है, उसको समझने और प्रमाणित करने के लिए सही दिशा में प्रयत्नशील होना।

प्रश्न: न्याय के लिए हमारा प्रयत्नशील होना स्वयंस्फूर्त है या प्रभाववश है - इसको कैसे पहचानें?

उत्तर: न्याय की चाहत आपमें (हर मानव में) स्वयंस्फूर्त है.  अध्ययन विधि से न्याय की प्रेरणा है.  अध्ययन विधि से जागृति की ओर बढ़ते हुए पहला घाट है - साक्षात्कार।  दूसरा घाट है - बोध.  तीसरा घाट है -अनुभव।  अनुभव फिर प्रमाण का स्त्रोत होता है.  प्रमाण का फिर पुनः बोध, फिर चिंतन-चित्रण, फिर तुलन-विश्लेषण, फिर आस्वादन और चयन.  अनुभवमूलक विधि से, इस प्रकार मानव के जीने में न्याय स्वयंस्फूर्त हो जाता है.  इसको जितना भी चाहे मानव विश्लेषण कर सकता है, दूसरों को समझा सकता है.  मानव समझदार होने के बाद उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता विधि से स्वानुशासित होता है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)

Saturday, April 18, 2015

ऊर्जा और क्रिया

प्रश्न: ऊर्जा और क्रिया का क्या सम्बन्ध है?

उत्तर: सत्ता साम्य ऊर्जा है, जिसमे सम्पृक्त होने से इकाइयां ऊर्जा-संपन्न हैं. ऊर्जा-संपन्न होने से क्रियाशीलता है. क्रियाशीलता का प्रभाव कार्य-ऊर्जा है. प्रभाव के आधार पर ही फल-परिणाम होता है. प्रभाव से ही सृजन, विसर्जन और विभव क्रियाएँ संपन्न होती हैं.


- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)
 

Friday, April 17, 2015

भाव, पूरकता और पहचान

प्रश्न:  "अस्तित्व स्वयं सम्पूर्ण भाव होने के कारण प्रत्येक इकाई में भाव-सम्पन्नता देखने को मिलती है.  मूलतः सहअस्तित्व ही परम भाव होने के कारण अस्तित्व ही परम धर्म हुआ."  यहाँ भाव और सम्पूर्ण भाव से क्या आशय है?

उत्तर:  सूत्र रूप में :- भाव = मौलिकता = स्वभाव

अस्तित्व में व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तु होने के कारण उसे "सम्पूर्ण भाव" कहा गया.  व्यापक वस्तु नित्य पारगामी, पारदर्शी भाव संपन्न है.  एक-एक वस्तु चार अवस्थाओं में अपनी अवस्थाओं के अनुसार भाव (स्वभाव) संपन्न है.  पदार्थावस्था में संगठन-विघटन स्वभाव, प्राणावस्था में सारक-मारक स्वभाव, जीवावस्था में क्रूर-अक्रूर स्वभाव, ज्ञानावस्था में धीरता-वीरता-उदारता दया-कृपा-करुणा स्वभाव। 

स्वभाव गति से पूरकता सिद्ध होती है.

प्रश्न: "स्वभाव हर इकाई में मूल्यों के रूप में वर्तता है"
"मूल्य प्रत्येक इकाई में स्थिर होता है"  - यहाँ वर्तने और स्थिरता से क्या आशय है?

उत्तर: वर्तने का मतलब है - वर्तमान रहना।
स्थिरता का मतलब है - निरंतर रहना।

प्रश्न: "अस्तित्व सहअस्तित्व होने के कारण पूरकता और पहचान नित्य सिद्ध होती है."  पूरकता और पहचान से क्या आशय है?

उत्तर: प्रत्येक एक (इकाई) प्रकाशमान है.  प्रकाशित होने का अर्थ है - स्वयं का पहचान प्रस्तुत करना। 

दो परमाणु-अंशों के बीच पहचान होता है तभी परमाणु निश्चित आचरण या व्यवस्था स्वरूप में कार्य करते हुए देखने को मिलता है.  इस तरह परमाणु अंशों में परस्पर पहचान निश्चित आचरण या व्यवस्था के लिए पूरक हुआ. 

इसके उपरान्त, व्यवस्थित परमाणुओं की परस्परता में विकास-क्रम और विकास के रूप में पहचान और पूरकता होना पाया गया.  विकास (गठन-पूर्णता) पहचान और पूरकता के आधार पर ही घटित होना पाया जाता है.

इसी क्रम में मानव अपने मानवत्व के साथ पहचान होने के उपरान्त परस्परता में पूरकता प्रमाणित होना देखा जाता है. 

श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)