This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
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Monday, October 26, 2015
Sunday, August 2, 2015
Saturday, July 18, 2015
स्वानुशासन
समाधान के इस प्रस्ताव में तर्क द्वारा छेद करने की कोई जगह नहीं है. समस्या की हर बात में छेद रहता ही है. तर्क का प्रतितर्क देने से समाधान नहीं होता। समाधान से तर्क संतुष्ट होता है. समाधान के आगे तर्क करने की ताकत ही समाप्त हो जाता है. प्रमाण सामने हो, अनुभव सामने हो तो फिर उससे क्या तर्क करेंगे? मैं स्वयं अनुभव संपन्न हो कर समाधान-समृद्धि का प्रमाण हूँ. समाधान के साथ तर्क होता ही नहीं है, कुतर्क भी नहीं होता.
अवधारणा होते तक तर्क है, अवधारणा के बाद कोई तर्क नहीं है. तर्क पुरुषार्थ के साथ है, वहाँ उसका प्रयोग होना भी चाहिए। किन्तु पुरुषार्थ के बाद परमार्थ में तर्क का प्रयोग नहीं है. परमार्थ में पुरुषार्थ विलय होता ही है. पुरुषार्थ परमार्थ में समावेश होता ही है. पुरुषार्थ परमार्थ का समर्थन देता ही है. यह नियम है, नियति-सम्मत है.
मानव जब से इस धरती पर प्रकट हुआ तभी से न्याय को स्वयंस्फूर्त चाहता है. न्याय की चाहत मानव में आदि काल से है, पर उसको न्याय मिला नहीं। मानव को न्याय मिला नहीं पर उसकी चाहना उसमें बरकरार रही. यह कैसे हो गया? आप भी न्याय चाहते हैं, मैं भी न्याय चाहता हूँ. चाहने में हम एक समान हैं. अब मैं जो पाया हूँ, उसको न्याय माना जाए तो उसको अनुकरण किया जा सकता है, फिर प्रमाणित करके देखा जा सकता है. अनुकरण करने पर प्रमाणित करने की इच्छा होता ही है. प्रमाणित करने पर परंपरा बनेगी। परंपरा की फिर पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता होती है. परंपरा के रूप में स्थापित हो जाना एक सौभाग्यशाली स्थिति होती है. न्याय के इस प्रस्ताव में कोई कमी हो तो बताओ? यदि कमी नहीं है तो प्रभावशील होने की बात है. उसके लिए एक व्यक्ति से शुरुआत हुई, उससे १००-२०० व्यक्ति प्रभावित हुए, आगे कैसे होगा इसको देखते हैं! प्रभावित होने का मतलब है, उसको समझने और प्रमाणित करने के लिए सही दिशा में प्रयत्नशील होना।
प्रश्न: न्याय के लिए हमारा प्रयत्नशील होना स्वयंस्फूर्त है या प्रभाववश है - इसको कैसे पहचानें?
उत्तर: न्याय की चाहत आपमें (हर मानव में) स्वयंस्फूर्त है. अध्ययन विधि से न्याय की प्रेरणा है. अध्ययन विधि से जागृति की ओर बढ़ते हुए पहला घाट है - साक्षात्कार। दूसरा घाट है - बोध. तीसरा घाट है -अनुभव। अनुभव फिर प्रमाण का स्त्रोत होता है. प्रमाण का फिर पुनः बोध, फिर चिंतन-चित्रण, फिर तुलन-विश्लेषण, फिर आस्वादन और चयन. अनुभवमूलक विधि से, इस प्रकार मानव के जीने में न्याय स्वयंस्फूर्त हो जाता है. इसको जितना भी चाहे मानव विश्लेषण कर सकता है, दूसरों को समझा सकता है. मानव समझदार होने के बाद उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता विधि से स्वानुशासित होता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)
अवधारणा होते तक तर्क है, अवधारणा के बाद कोई तर्क नहीं है. तर्क पुरुषार्थ के साथ है, वहाँ उसका प्रयोग होना भी चाहिए। किन्तु पुरुषार्थ के बाद परमार्थ में तर्क का प्रयोग नहीं है. परमार्थ में पुरुषार्थ विलय होता ही है. पुरुषार्थ परमार्थ में समावेश होता ही है. पुरुषार्थ परमार्थ का समर्थन देता ही है. यह नियम है, नियति-सम्मत है.
मानव जब से इस धरती पर प्रकट हुआ तभी से न्याय को स्वयंस्फूर्त चाहता है. न्याय की चाहत मानव में आदि काल से है, पर उसको न्याय मिला नहीं। मानव को न्याय मिला नहीं पर उसकी चाहना उसमें बरकरार रही. यह कैसे हो गया? आप भी न्याय चाहते हैं, मैं भी न्याय चाहता हूँ. चाहने में हम एक समान हैं. अब मैं जो पाया हूँ, उसको न्याय माना जाए तो उसको अनुकरण किया जा सकता है, फिर प्रमाणित करके देखा जा सकता है. अनुकरण करने पर प्रमाणित करने की इच्छा होता ही है. प्रमाणित करने पर परंपरा बनेगी। परंपरा की फिर पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता होती है. परंपरा के रूप में स्थापित हो जाना एक सौभाग्यशाली स्थिति होती है. न्याय के इस प्रस्ताव में कोई कमी हो तो बताओ? यदि कमी नहीं है तो प्रभावशील होने की बात है. उसके लिए एक व्यक्ति से शुरुआत हुई, उससे १००-२०० व्यक्ति प्रभावित हुए, आगे कैसे होगा इसको देखते हैं! प्रभावित होने का मतलब है, उसको समझने और प्रमाणित करने के लिए सही दिशा में प्रयत्नशील होना।
प्रश्न: न्याय के लिए हमारा प्रयत्नशील होना स्वयंस्फूर्त है या प्रभाववश है - इसको कैसे पहचानें?
उत्तर: न्याय की चाहत आपमें (हर मानव में) स्वयंस्फूर्त है. अध्ययन विधि से न्याय की प्रेरणा है. अध्ययन विधि से जागृति की ओर बढ़ते हुए पहला घाट है - साक्षात्कार। दूसरा घाट है - बोध. तीसरा घाट है -अनुभव। अनुभव फिर प्रमाण का स्त्रोत होता है. प्रमाण का फिर पुनः बोध, फिर चिंतन-चित्रण, फिर तुलन-विश्लेषण, फिर आस्वादन और चयन. अनुभवमूलक विधि से, इस प्रकार मानव के जीने में न्याय स्वयंस्फूर्त हो जाता है. इसको जितना भी चाहे मानव विश्लेषण कर सकता है, दूसरों को समझा सकता है. मानव समझदार होने के बाद उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता विधि से स्वानुशासित होता है.
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसंबर २००९, अमरकंटक)
Saturday, April 18, 2015
ऊर्जा और क्रिया
प्रश्न: ऊर्जा और क्रिया का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर: सत्ता साम्य ऊर्जा है, जिसमे सम्पृक्त होने से इकाइयां ऊर्जा-संपन्न हैं. ऊर्जा-संपन्न होने से क्रियाशीलता है. क्रियाशीलता का प्रभाव कार्य-ऊर्जा है. प्रभाव के आधार पर ही फल-परिणाम होता है. प्रभाव से ही सृजन, विसर्जन और विभव क्रियाएँ संपन्न होती हैं.
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)
उत्तर: सत्ता साम्य ऊर्जा है, जिसमे सम्पृक्त होने से इकाइयां ऊर्जा-संपन्न हैं. ऊर्जा-संपन्न होने से क्रियाशीलता है. क्रियाशीलता का प्रभाव कार्य-ऊर्जा है. प्रभाव के आधार पर ही फल-परिणाम होता है. प्रभाव से ही सृजन, विसर्जन और विभव क्रियाएँ संपन्न होती हैं.
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)
Friday, April 17, 2015
भाव, पूरकता और पहचान
प्रश्न: "अस्तित्व स्वयं सम्पूर्ण भाव होने के कारण प्रत्येक इकाई में भाव-सम्पन्नता देखने को मिलती है. मूलतः सहअस्तित्व ही परम भाव होने के कारण अस्तित्व ही परम धर्म हुआ." यहाँ भाव और सम्पूर्ण भाव से क्या आशय है?
उत्तर: सूत्र रूप में :- भाव = मौलिकता = स्वभाव
अस्तित्व में व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तु होने के कारण उसे "सम्पूर्ण भाव" कहा गया. व्यापक वस्तु नित्य पारगामी, पारदर्शी भाव संपन्न है. एक-एक वस्तु चार अवस्थाओं में अपनी अवस्थाओं के अनुसार भाव (स्वभाव) संपन्न है. पदार्थावस्था में संगठन-विघटन स्वभाव, प्राणावस्था में सारक-मारक स्वभाव, जीवावस्था में क्रूर-अक्रूर स्वभाव, ज्ञानावस्था में धीरता-वीरता-उदारता दया-कृपा-करुणा स्वभाव।
स्वभाव गति से पूरकता सिद्ध होती है.
प्रश्न: "स्वभाव हर इकाई में मूल्यों के रूप में वर्तता है"
"मूल्य प्रत्येक इकाई में स्थिर होता है" - यहाँ वर्तने और स्थिरता से क्या आशय है?
उत्तर: वर्तने का मतलब है - वर्तमान रहना।
स्थिरता का मतलब है - निरंतर रहना।
प्रश्न: "अस्तित्व सहअस्तित्व होने के कारण पूरकता और पहचान नित्य सिद्ध होती है." पूरकता और पहचान से क्या आशय है?
उत्तर: प्रत्येक एक (इकाई) प्रकाशमान है. प्रकाशित होने का अर्थ है - स्वयं का पहचान प्रस्तुत करना।
दो परमाणु-अंशों के बीच पहचान होता है तभी परमाणु निश्चित आचरण या व्यवस्था स्वरूप में कार्य करते हुए देखने को मिलता है. इस तरह परमाणु अंशों में परस्पर पहचान निश्चित आचरण या व्यवस्था के लिए पूरक हुआ.
इसके उपरान्त, व्यवस्थित परमाणुओं की परस्परता में विकास-क्रम और विकास के रूप में पहचान और पूरकता होना पाया गया. विकास (गठन-पूर्णता) पहचान और पूरकता के आधार पर ही घटित होना पाया जाता है.
इसी क्रम में मानव अपने मानवत्व के साथ पहचान होने के उपरान्त परस्परता में पूरकता प्रमाणित होना देखा जाता है.
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)
उत्तर: सूत्र रूप में :- भाव = मौलिकता = स्वभाव
अस्तित्व में व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तु होने के कारण उसे "सम्पूर्ण भाव" कहा गया. व्यापक वस्तु नित्य पारगामी, पारदर्शी भाव संपन्न है. एक-एक वस्तु चार अवस्थाओं में अपनी अवस्थाओं के अनुसार भाव (स्वभाव) संपन्न है. पदार्थावस्था में संगठन-विघटन स्वभाव, प्राणावस्था में सारक-मारक स्वभाव, जीवावस्था में क्रूर-अक्रूर स्वभाव, ज्ञानावस्था में धीरता-वीरता-उदारता दया-कृपा-करुणा स्वभाव।
स्वभाव गति से पूरकता सिद्ध होती है.
प्रश्न: "स्वभाव हर इकाई में मूल्यों के रूप में वर्तता है"
"मूल्य प्रत्येक इकाई में स्थिर होता है" - यहाँ वर्तने और स्थिरता से क्या आशय है?
उत्तर: वर्तने का मतलब है - वर्तमान रहना।
स्थिरता का मतलब है - निरंतर रहना।
प्रश्न: "अस्तित्व सहअस्तित्व होने के कारण पूरकता और पहचान नित्य सिद्ध होती है." पूरकता और पहचान से क्या आशय है?
उत्तर: प्रत्येक एक (इकाई) प्रकाशमान है. प्रकाशित होने का अर्थ है - स्वयं का पहचान प्रस्तुत करना।
दो परमाणु-अंशों के बीच पहचान होता है तभी परमाणु निश्चित आचरण या व्यवस्था स्वरूप में कार्य करते हुए देखने को मिलता है. इस तरह परमाणु अंशों में परस्पर पहचान निश्चित आचरण या व्यवस्था के लिए पूरक हुआ.
इसके उपरान्त, व्यवस्थित परमाणुओं की परस्परता में विकास-क्रम और विकास के रूप में पहचान और पूरकता होना पाया गया. विकास (गठन-पूर्णता) पहचान और पूरकता के आधार पर ही घटित होना पाया जाता है.
इसी क्रम में मानव अपने मानवत्व के साथ पहचान होने के उपरान्त परस्परता में पूरकता प्रमाणित होना देखा जाता है.
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र का उत्तर देने के क्रम में - १५-०५-२००७, अमरकंटक)
Wednesday, April 8, 2015
नौकरी की औचित्यता
प्रश्न: स्वावलंबन के लिए नौकरी करना क्या उचित है?
उत्तर: जागृत मानव परंपरा में नौकरी का स्थान शून्य है. भ्रमित मानव परंपरा में नौकरी के लिए स्वीकृति न्यूनतम श्रम, जिम्मेदारी से अधिकतम दूर रहने, और अधिकतम सुविधा-संग्रह के आधार पर होता आया है. अभी की स्थिति में जिम्मेदारी से मुक्त सुविधा संपन्न होने की अपेक्षा रखने वालों की संख्या में वृद्धि हो गयी है. इसी कारणवश सर्वाधिक समस्याएं देखने को मिल रहा है.
स्वावलम्बन परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिम्मेदारी का वहन है. परिवार की जिम्मेदारी वहन करने का प्रमाण सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के साथ समाधान-समृद्धि को प्रमाणित करना है. परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना ही समृद्धि का स्त्रोत है. इस पर गंभीरता से सोच-विचार करके आचरण करने की आवश्यकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में, १९ जुलाई २००१)
उत्तर: जागृत मानव परंपरा में नौकरी का स्थान शून्य है. भ्रमित मानव परंपरा में नौकरी के लिए स्वीकृति न्यूनतम श्रम, जिम्मेदारी से अधिकतम दूर रहने, और अधिकतम सुविधा-संग्रह के आधार पर होता आया है. अभी की स्थिति में जिम्मेदारी से मुक्त सुविधा संपन्न होने की अपेक्षा रखने वालों की संख्या में वृद्धि हो गयी है. इसी कारणवश सर्वाधिक समस्याएं देखने को मिल रहा है.
स्वावलम्बन परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिम्मेदारी का वहन है. परिवार की जिम्मेदारी वहन करने का प्रमाण सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के साथ समाधान-समृद्धि को प्रमाणित करना है. परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना ही समृद्धि का स्त्रोत है. इस पर गंभीरता से सोच-विचार करके आचरण करने की आवश्यकता है.
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से (एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में, १९ जुलाई २००१)
Monday, April 6, 2015
देश-काल की सीमा
प्रश्न: आप कहते हैं - "चैतन्य जड़ से बना नहीं है, विकसित हुआ है". आपने यह भी कहा है - "जड़ परमाणु चैतन्य पद में संक्रमित हो जाता है". लेकिन आप यह भी कहते हैं - "जड़ और चैतन्य दोनों हमेशा-हमेशा से थे, हमेशा रहेंगे". इसको समझाइये।
उत्तर: मानव व्यवहार दर्शन में जड़ और चैतन्य की चर्चा करते हुए परमाणु में विकास के नाम से अवधारणाओं को प्रस्तुत किया है. उसमें इस बात को स्पष्ट किया है कि विकास-क्रम और विकास मानव को समझ में आता है. विकसित परमाणु के अर्थ में जीवन क्रियाकलाप प्रमाणित है. विकासक्रम में भौतिक-रासायनिक क्रियाकलाप प्रमाणित है. जड़ कब और कैसे चैतन्य होता है? - इस प्रश्न का उत्तर देश और काल की सीमा में आता नहीं है. हम जो "है" उसका अध्ययन करते हैं. विकास-क्रम है. विकास है. विकास-क्रम और विकास को जोड़ कर देखने से पता लगता है, और हम कह सकते हैं कि जड़ ही चैतन्य हुआ है. गठन-पूर्णता की यह घटना विकास पूर्वक ही घटित रहना पाया जाता है.
यह सुनकर विकास को घटित कराने के लिए मानव में प्रवृत्ति होती ही है. इसके लिए पुनः प्रयोग विधि ही सामने आती है. प्रयोग विधि देश-काल की सीमा में होती है. प्रयोग के लिए आपके पास जो साधन हैं, वे यंत्र ही हैं. जो जिससे बना होता है, वह उससे अधिक होता नहीं है. मानव जितने भी यंत्र बना पाया है, वे भौतिक संसार से ही बने हैं. प्राण-संसार के साथ जो प्रयोग हुए हैं, उनका बीज रूप वनस्पति संसार से ही प्राप्त रहना देखा गया है. प्रयोग विधि से विकास (गठनपूर्णता) को सिद्ध नहीं किया जा सकता।
दूसरे, इस सच्चाई को भी देखा गया है कि अस्तित्व की व्याख्या देश-काल की सीमाओं में हो नहीं पाती। अस्तित्व की व्याख्या सर्व-देश और सर्व-काल के आधार पर ही है. देश और काल के आधार पर घटना को पहचानने के क्रम में किसी वस्तु का सच्चाई समझ नहीं आती. सर्व-देश सर्व-काल के आधार पर सम्पूर्ण वस्तुओं का सच्चाई समझ में आता है. इस विधि से हम इस निष्कर्ष में आते हैं कि विकास, विकास-क्रम से संक्रमण पूर्वक जुड़ा हुआ है. यह कब जुड़ा? यह प्रश्न देश-काल बाधित है. अतएव इस मुद्दे को अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान परक सत्य के रूप में स्वीकारना ठीक होगा।
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से, एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में (१५ मई २००१, अमरकंटक)
उत्तर: मानव व्यवहार दर्शन में जड़ और चैतन्य की चर्चा करते हुए परमाणु में विकास के नाम से अवधारणाओं को प्रस्तुत किया है. उसमें इस बात को स्पष्ट किया है कि विकास-क्रम और विकास मानव को समझ में आता है. विकसित परमाणु के अर्थ में जीवन क्रियाकलाप प्रमाणित है. विकासक्रम में भौतिक-रासायनिक क्रियाकलाप प्रमाणित है. जड़ कब और कैसे चैतन्य होता है? - इस प्रश्न का उत्तर देश और काल की सीमा में आता नहीं है. हम जो "है" उसका अध्ययन करते हैं. विकास-क्रम है. विकास है. विकास-क्रम और विकास को जोड़ कर देखने से पता लगता है, और हम कह सकते हैं कि जड़ ही चैतन्य हुआ है. गठन-पूर्णता की यह घटना विकास पूर्वक ही घटित रहना पाया जाता है.
यह सुनकर विकास को घटित कराने के लिए मानव में प्रवृत्ति होती ही है. इसके लिए पुनः प्रयोग विधि ही सामने आती है. प्रयोग विधि देश-काल की सीमा में होती है. प्रयोग के लिए आपके पास जो साधन हैं, वे यंत्र ही हैं. जो जिससे बना होता है, वह उससे अधिक होता नहीं है. मानव जितने भी यंत्र बना पाया है, वे भौतिक संसार से ही बने हैं. प्राण-संसार के साथ जो प्रयोग हुए हैं, उनका बीज रूप वनस्पति संसार से ही प्राप्त रहना देखा गया है. प्रयोग विधि से विकास (गठनपूर्णता) को सिद्ध नहीं किया जा सकता।
दूसरे, इस सच्चाई को भी देखा गया है कि अस्तित्व की व्याख्या देश-काल की सीमाओं में हो नहीं पाती। अस्तित्व की व्याख्या सर्व-देश और सर्व-काल के आधार पर ही है. देश और काल के आधार पर घटना को पहचानने के क्रम में किसी वस्तु का सच्चाई समझ नहीं आती. सर्व-देश सर्व-काल के आधार पर सम्पूर्ण वस्तुओं का सच्चाई समझ में आता है. इस विधि से हम इस निष्कर्ष में आते हैं कि विकास, विकास-क्रम से संक्रमण पूर्वक जुड़ा हुआ है. यह कब जुड़ा? यह प्रश्न देश-काल बाधित है. अतएव इस मुद्दे को अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान परक सत्य के रूप में स्वीकारना ठीक होगा।
- श्रद्धेय नागराज जी की डायरी से, एक पत्र के उत्तर देने के क्रम में (१५ मई २००१, अमरकंटक)
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