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Saturday, February 27, 2010

जीवन के शक्ति और बल - भाग ५




सत्ता में मैं अनुभूत हूँ.  सत्ता में मैं समग्रता का अनुभव करता हूँ.  सत्ता में समग्रता के साथ मैं व्यवस्था का अनुभव करता हूँ.  सत्ता (व्यापक वस्तु) को हरेक परस्परता के बीच प्रमाणित होने की विधि को मैं प्रस्तुत किया हूँ.  सत्ता (व्यापक वस्तु) को बोध करने के बाद एक-एक वस्तु को बोध करना बन जाता है.  एक-एक वस्तु का बोध करने के लिए उसके रूप, गुण, स्वभाव और धर्म का बोध करना होता है.  सत्ता का बोध करने के लिए उसकी सर्वत्र विद्यमानता, पारर्शीयता और पारगामीयता का बोध करने की आवश्यकता है.  इसको मैंने अध्ययन कराके देखा है - लोगों को यह बोध होता है.  इस आधार पर मैं यह कहता हूँ - सबको यह बोध होगा.  

अनुभव दर्शन परम-सत्य के स्वरूप को बताता है.  व्यवहार दर्शन न्याय के स्वरूप को बताता है.  कर्म दर्शन और अभ्यास दर्शन धर्म-सहज विधि से जीने के स्वरूप को बताता है.  ये चारों अध्याय एक दूसरे से अंतर्सम्बंधित हैं.  

सत्ता को "अध्यात्म" भी नाम दिया है.  सत्ता मध्यस्थ है.  अध्यात्म का परिभाषा दिया - सभी आत्माओं का आधार.  परमाणु के मध्यांश को आत्मा बताया.  आत्मा मध्यस्थ क्रिया करता है.  सम-विषम का बाधा आत्मा पर नहीं होता.  (जीवन परमाणु में) मध्यस्थ क्रिया के अनुसार बुद्धि, चित्त, वृत्ति और मन काम करने लग जाते हैं, उसको हम जागृति कहते हैं.  मैं स्वयं उसका प्रमाण हूँ.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

जीवन के शक्ति और बल - भाग ४




अभी तक हम टुकड़े-टुकड़े करके अध्ययन किये हैं.  समग्रता में अध्ययन किये नहीं हैं.  समग्रता में अध्ययन करना कितना सुगम है, यह मैं आपको बताना चाहता हूँ.

व्यापक वस्तु में एक-एक होने की अवधारणा जब आप में आ जाता है तो उसमे यह भी आता है - मानव भी एक वस्तु है.  मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है.  

जीवन एक ऐसी अमूल्य वस्तु है जो नियति सहज उपलब्धि है - जिसमे किसी का हस्तक्षेप नहीं है.  न तो व्यापक वस्तु इसको बनाने-बिगाड़ने में लगा है.  और एक-एक वस्तु जीवन स्वरूप में होने और उसके प्रमाणित होने के लिए निरंतर सहायक है.

जीवन ही अनुभव करने वाली वस्तु है.  

जीवन को ही अनुभव करना है - अस्तित्व को सहअस्तित्व स्वरूप में और जीवन को जागृति स्वरूप में.  

अनुभव किसी किताब या मशीन या कोई माध्यम में होने वाला नहीं है, अनुभव के लिए हर व्यक्ति ही जिम्मेदार है.  मनुष्य अपने को समग्र व्यवस्था में जीने की जिम्मेदारी की कसौटी में अपने अनुभव को जांचेगा.  

समग्र व्यवस्था ही नियति है.  समग्र व्यवस्था में भागीदार होने के लिए हम समझदार होते हैं.  समझदारी पूर्वक व्यवस्था में जीना ही बन पाता है, दूसरा कुछ बनता नहीं है.  सहअस्तित्व में अनुभव किये रहना इसके लिए एक आवश्यक मुद्दा है.  अनुभव का दृष्ट फल व्यवस्था में भागीदारी ही है.  व्यवस्था में भागीदारी करते हुए हम प्रमाणित हो जाते हैं.  

जब कभी भी अनुभव होगा सहअस्तित्व में ही होगा.  आदर्शवादी विधि में विगत में यह सूचना दिया था - एकांत में, समाधि स्थली में अनुभव होगा.  समाधि को भले प्रकार से देखा गया है.  उसमे यह निकलता नहीं है.  समाधि होने पर यह घोषणा नहीं कर पाते हैं कि मैं अनुभव किया हूँ.  हम चुप हो जाते हैं.  हम न अपने समझदार होने की घोषणा कर पाते हैं, न अपने नासमझ होने की घोषणा कर पाते हैं. 

सहअस्तित्व में अनुभव होने की स्थिति में यह घोषणा करना बनता है कि मैं सहअस्तित्व को समझा हूँ.  जीवन का अनुभव होने के बाद जीवन को हम समझे हैं, ऐसा घोषणा हम कर सकते हैं.  जीवन का अनुभव होने के आधार पर हमारा न्याय-धर्म-सत्य को प्रमाणित करना बन जाता है.  अस्तित्व में अनुभव होने के आधार पर समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना बन जाता है.  

सहअस्तित्व में अनुभव पूर्वक मानव के जागृति के अर्थ में सभी प्रयत्न का अभीप्सा, आवश्यकता पूरा हो जाता है.  इससे ज्यादा कुछ होता नहीं, इससे कम में आदमी प्रमाणित नहीं हो पाता.  यही ज्ञानावस्था की सर्वोच्च उपलब्धि है जो परम्परा स्वरूप में प्रमाणित होती है.

जागृत होने के मूल में मानव द्वारा साक्षात्कार में जागृति और भ्रम की लक्ष्मण रेखा को देख लेना है.  सही और गलती की लक्ष्मण रेखा को देख लेना है.  इस पार भ्रम है, उस पार जागृति है - यह स्पष्ट हो जाता है.  इस पार अन्याय है, उस पार न्याय है - यह स्पष्ट हो जाता है.  इस पार समस्या है, उस पार समाधान है - यह स्पष्ट हो जाता है.  इस पार असत्य है, उस पार सत्य है - यह स्पष्ट हो जाता है.  यही साक्षात्कार की महिमा है.  साक्षात्कार होने पर उसकी इस महिमा के आधार पर हम कुछ भी योजना बनाएं फिर वह प्रमाणित होने के अर्थ में ही बना पाते हैं.  इस साक्षात्कार को प्रमाणित करने के लिए ही योजना होती है.  चाहे कुछ भी कर लो!  अंततोगत्वा मनुष्य के लिए प्रमाणित करने के लिए अपरिहार्यता हो जाती है, फिर प्रमाणित होना बन जाता है.  

मनुष्य के लिए अनुभव मूलक विधि से जीना आवश्यक है और अनुभवगामी पद्दति से अध्ययन कराना भी आवश्यक है.  जो हम अनुभव किये रहते हैं, उसको प्रमाणित करने के लिए अनुभवगामी पद्दति की योजना बनाते ही हैं.  


- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

जीवन के शक्ति और बल - भाग ३





जीवन का वैभव समझ आने पर यह स्पष्ट होता है - मानव कितना बड़ा है!  अभी तक मानव को जो किताबों द्वारा और मशीन द्वारा देखने का प्रयास करते रहे, वह क्या बचपना था ऐसा मूल्यांकन करना बन जाता है.  जीवन को समझने के घाट को मनुष्य ही पार करता है.  कोई गधा, घोडा, कुत्ता, बिल्ली इसको नहीं समझ सकता.  जबकि अभी आप मनुष्य को गधे, घोड़े, कुत्ते, बिल्ली के समकक्ष मानके शिक्षा में भाषा सिखाते हो, कार्य प्रणाली सिखाते हो, नीति शतक सुनाते हो!  हम ऐसा करते हुए कितने बुद्धिमान हैं, आप ही मूल्याङ्कन करो!  

समझदारी के बाद हमारी पहले की सारी बैसाखियाँ छूट जाती हैं, सारे भ्रम टूट जाते हैं, सारे अतिवाद ध्वस्त हो जाते हैं.  हम स्वच्छंद हो जाते हैं.  ऐसे स्वच्छंद मानव मैं भी हूँ, आप भी हो सकते हैं, समग्र मानव ऐसे ही प्रमाणित हो सकते हैं.  सर्वशुभ की संभावना को जो मैंने परिकल्पना में देखा, योजना में देखा, कार्ययोजना में देखा - वह यही है.

दर्शन का मतलब है - समझना.  समझने का पहला सीढ़ी है - साक्षात्कार या सच्चाई पहचान में आ जाना.  दूसरा सीढ़ी है - वह स्वीकार हो जाना, बोध हो जाना.  तीसरा सीढ़ी है - अनुभव हो जाना या तृप्ति मिल जाना.  साक्षात्कार और बोध का तृप्ति बिंदु है अनुभव.  वही कल्पनाशीलता और कर्मस्वतंत्रता का तृप्ति बिंदु भी है.  यहीं "कर्म करते समय स्वतन्त्र और फल भोगते समय परतंत्र" वाली बात का निराकरण हो जाता है.  हम कर्म करते समय भी स्वतन्त्र हो जाते हैं, फल भोगते समय भी स्वतन्त्र हो जाते हैं.  वो कैसे हो जाता है, इसको ऐसे समझ सकते हैं.  भ्रम का कर्म-फल समस्या ही होता है, उसको कोई बांटने जाए तो कोई लेता नहीं है.  (कोई हमारा दिया हुआ लेगा नहीं तो उसको भोगने के लिए हम परतंत्र हो गये.)  जबकि जागृति का कर्म-फल समाधान ही होता है, उसको हर कोई हर जगह अपनाने के लिए तैयार रहता है.  इस ढंग से हम जागृति के कर्म को जितना चाहे बाँट सकते हैं.  (इस तरह जागृत व्यक्ति अपने कर्म के फल के प्रति आश्वस्त है, और उसको भोगने के प्रति स्वतन्त्र है)  इसी आधार पर जागृत मानव के पास अपनी आवश्यकता से अधिक फल पैदा करने की कर्म-प्रणाली आती है.  आवश्यकताये कम हो जाती हैं, संभावनाएं अधिक हो जाती हैं.  जागृति के इस आधार को छोड़ कर आप कुछ भी करो वह शरीर से, शरीर संवेदनाओं से ही जुड़ा रहेगा.  शरीर संवेदनाओं से जुड़ी कार्य प्रणाली कहीं न कहीं कुंठित होता है.  कहीं न कहीं वह काला दीवाल तक पहुँच जाता है.

अनुभव पूर्वक ही हम अपनी बात को ठोस ढंग से प्रस्तुत कर पाते हैं.  अनुभव से पहले हम प्रस्तुत तो होते हैं, पर वह ठोसपन हमारी प्रस्तुति में नहीं आता है.  हमें ऐसा कुछ कहना पड़ता है - किताब में ऐसा लिखा है, यंत्र ऐसा बताता है, आदि.  सन्दर्भ (reference) को बता कर हमे अपना सारा भाषा प्रयोग करना पड़ता है.  

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

जीवन के शक्ति और बल - भाग २



इसके बाद 'साक्षात्कार' और 'चित्रण' की बात है.  चित्रण में स्मृतियाँ होती हैं.  शब्दों की, रूप की स्मृतियाँ होती हैं - किन्तु स्वभाव और धर्म की स्मृतियाँ नहीं होती।  स्वभाव और धर्म का साक्षात्कार ही होता है.  स्मृति से स्वभाव/धर्म को पहचाना नहीं जा सकता।  शब्दों की सीमा में इनको पहचाना नहीं जा सकता।  स्वभाव-धर्म अर्थ है - जिसका साक्षात्कार होता है.  जैसे - मानव का धर्म सुख है.  सुख शब्द की सीमा में नहीं आता.  सुख साक्षात्कार में आता है, बोध में आता है, अनुभव में आता है.  सुख अनुभव में आने पर संकल्प द्वारा प्रवर्तित होकर हम उसको प्रमाणित करते हैं.

मानव संबंधों में निर्वाह होने के लिए मानव का स्वभाव/धर्म साक्षात्कार होना अनिवार्य है.

साक्षात्कार होता है तो बोध (अवधारणा) होता ही है.  (अवधारणा) बोध को प्रमाणित करने के लिए हम तत्पर होते हैं तो अनुभव होता ही है.  फिर अनुभव के तारतम्यता में सही जीवन क्रियाएं होने लगती हैं.  अनुभव आत्मा में होता है. 

अनुभव मूलक विधि से जब हम कार्यक्रम को बनाते हैं, चित्रण करते हैं तो वह न्याय-धर्म-सत्य के अर्थ में ही होता है.  इससे संवेदनाएं जो होते हैं, वे इसमें नियंत्रित हो जाते हैं.  चिंतन पूर्वक हम जी रहे हैं या नहीं इसकी जांच यही है - संवेदनाएं नियंत्रित हुआ या नहीं।  इसको हर व्यक्ति स्वयं में जांच सकता है.  इसको जांचने का अधिकार जितना मुझे है उतना ही आपको भी है.  संवेदनाएं न्याय-धर्म-सत्य की चौखट से बाहर भागते हैं तो वे नियंत्रित नहीं हैं. यही वह जगह है जहां दोहरे व्यक्तित्व का सम्भावना मर जाता है.  मनुष्य में दोहरे व्यक्तित्व का मृत्यु स्थली यही है.  जिस क्षण में हम संज्ञानशीलता में अपनी संवेदनाओं को नियंत्रित पाते हैं, उसी क्षण में दोहरे व्यक्तित्व की मृत्यु होती है.  दोहरा व्यक्तित्व भ्रम का सबसे बड़ा कवच है.  यहीं "भ्रम" और "जागृति" का नीर-क्षीर न्याय हो पाता है.  "सही" और "गलत" का लक्ष्मण रेखा भी यहीं बनता है.  इस बात को हम अच्छी तरह से पहचान सकते हैं.  "सही" और "गलत" का भेद जब प्रस्तुत करते हैं तो सही तो सभी को स्वीकार हो जाता है.  भ्रमित आदमी को भी सही स्वीकार होता है.  भ्रमित आदमी को सही स्वीकृत होने पर सही में उसकी निष्ठा होने के लिए साक्षात्कार होना आवश्यक है.

संवेदनाएं नियंत्रित होने की इस कसौटी से यदि हम उभर पाते हैं तो न्याय-धर्म-सत्य का बोध होता ही है.  यह अध्ययन-क्रम में होने वाली प्रक्रिया ही है.  इस कसौटी से पार निकलने के बाद हम अपने संबंधों में स्थिर हो जाते हैं, स्थित हो जाते हैं, निश्चल हो जाते हैं.  न्याय-धर्म-सत्य का जैसे ही बोध होता है तो अपने संबंधों का निर्वाह करने में हम सक्षम हो जाते हैं.  संबंधों के संबोधन तो हम अभी भी करते हैं - जैसे माँ, पिता, भाई आदि - किन्तु भ्रमित रहने तक उनमे हमारे विश्वास के निर्वाह की निरंतरता नहीं बन पाती।  संबंधों में विश्वास का निर्वाह होने के लिए न्याय-धर्म-सत्य का साक्षात्कार होना आवश्यक है.

इस प्रकार जीवन के वैभव को आप बोध कर सकते हैं.  इस बोध को प्रमाणित करने के लिए हम स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त होते हैं तो अनुभव होता ही है.  फिर अनुभव से सम्पूर्ण जीवन अभिभूत हो जाता है.  अर्थात अनुभव के स्वरूप में जीवन की सभी क्रियाएं होने लगती हैं.  

चिंतन में यदि हम स्वयं को नियंत्रित होना पा लिए तो व्यवहार में हम नियंत्रित होना पा ही जाते हैं.  चिन्तन में हम यदि समाधानित होते हैं तो व्यवहार में समाधानित होना पाते ही हैं.  चिन्तन में हम यदि न्यायिक होते हैं तो व्यवहार में न्यायिक होना पाते ही हैं.  इसको मैंने शतशः देखा है.

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)


जीवन के शक्ति और बल - भाग १



मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है.  यद्यपि अनेक जीव भी जीवन और शरीर के संयुक्त स्वरूप हैं, किन्तु मानव ही समझने योग्य और प्रमाणित करने योग्य है.  मनुष्य की शरीर रचना में सप्त धातुओं का संतुलन है और समृद्धि पूर्ण मेधस है जिससे जीवन अपनी जागृति को व्यक्त कर सकता है.  इससे कम समृद्ध मेधस और सप्त धातुओं का संतुलन जीव संसार में है.  उससे पहले भौतिक-रासायनिक संसार में मेधस-तंत्र का कोई लक्षण, प्रकाशन व प्रमाण नहीं है.  यह चिंतन मानव से ज्यादा सम्बंधित है.  मानव ही जागृति को प्रमाणित करने योग्य है.  बाकी रासायनिक-भौतिक संसार यांत्रिक रूप में कार्य कर रहा है.  इसके बावजूद ये त्व सहित व्यवस्था को प्रमाणित करते हैं, यह आपको यकीन दिलाया है.  मनुष्य ही एक मात्र ऐसी इकाई है जो अपनी त्व सहित व्यवस्था को अभी तक आये दो चिन्तनो - आदर्शवाद और भौतिकवाद द्वारा - पहचान नहीं पाया है.  अब इस नए चिंतन द्वारा हम मानव के त्व सहित व्यवस्था स्वरूप को पहचान सकते हैं.

मानव के अस्तित्व में होने का प्रयोजन है - सहअस्तित्व सहज प्रमाणों को प्रस्तुत करना.  प्रमाणों को प्रस्तुत करना ही मानव का व्यवस्था में जीने का स्वरूप है.  व्यवस्था में भागीदारी स्वरूपी प्रमाण की ही निरंतरता होती है.

शरीर की रचना गर्भाशय में होती है, जबकि जीवन अपने स्वरूप में एक गठनपूर्ण परमाणु है जो गठनपूर्णता संक्रमण को प्राप्त है.  भौतिक परमाणु और जीवन परमाणु में अंतर है - जीवन परमाणु भार बंधन और अणु बंधन से मुक्त है.  जीवन परमाणु में गठनपूर्णता के साथ ही सम्पूर्ण समझदारी को व्यक्त करने की संभावना भ्रूण अवस्था में होता है.  उसके बाद जीव संसार में जीवन कुछ व्यक्त होता है, फिर मानव संसार में जीवन कुछ और व्यक्त होता है.  आज की स्थिति में मानव जागृति को पूर्णतया व्यक्त करने योग्य हो गए हैं.  यह कहने का आधार है - जैसे मैं समझ गया, प्रमाणित हुआ, वैसे आप भी समझ सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं.  उसी प्रकार सम्पूर्ण मानव जाति समझ कर प्रमाणित कर सकती है, इस बात का आश्वासन इसमें मिलता है.

गठनपूर्ण परमाणु की विशेषता उसमे परिणाम का अमरत्व है.  गठनपूर्ण परमाणु की दूसरी महिमा अक्षय बल और शक्ति सम्पन्नता है.  अक्षयता को हम इस प्रकार अपने में जांच सकते हैं - जीवन में कल्पनाशीलता है, हम कितना भी कल्पना करें - और कल्पना करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी आशा करें - और आशा करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी विचार करें - और विचार करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी संकल्प  करें - और करने की पूंजी बना ही रहता है.  हम कितना भी निष्ठा करें - और निष्ठान्वित होने की पूंजी बना ही रहता है.  जितना हम इन शक्तियों को प्रमाणित करते हैं ये उतने ही ज्यादा और प्रखर और सटीक होते जाते हैं.

हर मनुष्य जीवन रूप में समान है.  हर जीवन की गठनपूर्णता समान है.  हर जीवन की अक्षय बल और शक्ति सम्पन्नता समान है.  हर जीवन का लक्ष्य समान है.

जीवन लक्ष्य सुख-शान्ति-संतोष-आनंद है.  मानव लक्ष्य समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व है.  मानव जीवन का अध्ययन शरीर के साथ रह कर ही करेगा और जीवन जागृति को प्रमाणित करेगा.  जागृति मानव परंपरा में ही प्रमाणित हो सकती है.  यह मानव कुल का मौलिक वरदान है.  मानव कुल अपने इस मौलिक वरदान तक पहुँच नहीं पाए थे, उस तक पहुँचने का रास्ता इस दर्शन से मिल गया.

बल को हम स्थिति में देखते हैं, और शक्ति को गति में देखते हैं.  जैसे - 'आस्वादन' स्थिति है.  'चयन' गति है.  आस्वादन हमारी/आपकी स्थिति में ही हो पाता है.  आस्वादन के लिए चयन कहीं न कहीं बाहर से ही होता है, इसलिए यह गति में होता है.

संवेदनाओं के आस्वादन के आधार पर चयन होना एक विधि है - जिसको 'भ्रम' कहा.
मूल्यों के आस्वादन के आधार पर चयन होना दूसरी विधि है - जिसको 'जागृति' कहा.

उसके बाद विचारों में विश्लेषण हमारे नज़रिए (दृष्टि) पर आधारित रहती है.  मानव के पास दो नज़रिए (दृष्टियाँ) हैं तुलन करने के लिए (१) प्रिय-हित-लाभ, (२) न्याय-धर्म-सत्य.  तुलन का नजरिया हमारी/आपकी स्थिति है.  विश्लेषण बाहर की ओर या गति है.  

प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से तुलन करके विश्लेषण करना इन्द्रिय-सापेक्ष है - जिसको 'भ्रम' कहा.
न्याय-धर्म-सत्य दृष्टियों से तुलन करके विश्लेषण करना अनुभव के आधार पर है - जिसको 'जागृति' कहा

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (आन्वरी आश्रम, १९९९)

Wednesday, February 24, 2010

स्थिति गति

स्थिति = होना
गति = रहना

मिट्टी से लेकर मनुष्य तक किसी भी वस्तु को आप देख लीजिये - उसका "होना" देखा जाता है, उसका "रहना" पाया जाता है। सभी जड़-चैतन्य प्रकृति का होना-रहना पाया जाता है। मनुष्य का नियति-विधि से प्रगटन-क्रम में धरती पर "होना" देखा जाता है। मनुष्य के अभी तक के इतिहास में उसका जीव-चेतना विधि से "रहना" पाया जाता है।

मिट्टी का होना-रहना देख कर मनुष्य का मानवीयता स्वरूप में रहना बनेगा नहीं। मिट्टी का होना-रहना मानव के लिए अनुकरणीय नहीं है। जानवर का होना-रहना मनुष्य के लिए अनुकरणीय नहीं है। मनुष्य-प्रकृति जीव-संसार के बाद धरती पर प्रगट हुआ। मनुष्य-प्रकृति ने अपनी मौलिकता को अभी तक पहचाना नहीं है। मनुष्य-प्रकृति जब अपनी मौलिकता को पहचानेगा तभी मानव-चेतना विधि से जियेगा। मनुष्य की मौलिकता "मानवीयता" ही है। मनुष्य-प्रकृति द्वारा अपनी मौलिकता को पहचान कराने के लिए ही मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००९, अमरकंटक)

Sunday, February 21, 2010

जीवन और शरीर का सम्बन्ध - भाग ४




प्रश्न: आपके अनुसार प्रचलित-विज्ञान का शोध-अनुसंधान कहाँ पर फेल हो रहा है?

उत्तर:  यह बहुत ही विशाल और जटिल प्रश्न है, फिर भी इसको लेकर मैं अपने निष्कर्ष को बताऊंगा.  विज्ञान विधा से आप जो सोचते हो उसमे मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं है - किन्तु वैसा अस्तित्व में है नहीं, वह प्रमाणित नहीं होता है.  इतना ही इसका सम्मानजनक उत्तर है.

यह कहाँ से ऐसा हो गया?  इसके बारे में मेरा सोचना ऐसा है - विज्ञान विधि से अभी तक जितना भी उपलब्धि हुआ है उससे "जीवन" की पहचान नहीं हुई.  जिस विधि से विज्ञान चल रहा है, उससे वे जीवन को पहचान ही नहीं सकते.  विज्ञान विधि controlled conditions में काम करती है.  उनके controlled conditions में जीवन पहचान में आएगा नहीं.  वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में controlled conditions जो है - वह जीवन ने ही तैयार किया है!  जीवन अपने से छोटी चीज़ ही बनाता है.  छोटी चीज़ में बड़ी चीज़ समाता नहीं है.  तर्कसंगत विधि से यदि आप संतुष्ट होना चाहें तो इसका यही उत्तर है.  तर्कसंगत विधि से संतुष्ट नहीं होना चाहते हैं तो आपकी आरती उतारने के अलावा हम और क्या कर सकते हैं!

विज्ञान संसार जीवन को पहचान नहीं पाया.  प्राणकोशिकाओं की क्रिया को वो जीवन समझता है - इसीलिये उसी सीमा में मानव के सभी गुणों की व्याख्या करना चाहता है.  ऐसा करते हुए उनको दो सौ वर्ष बीत चुके हैं, पर वे सफल नहीं हो पाए हैं.  करोडो वर्ष भी प्रयत्न करें तो भी प्राणकोशाओं की सीमा में मानव के गुणों की व्याख्या होने वाला नहीं है.  जीवन को समझने के बाद ही मानव के गुणों को पहचाना जा सकता है - इसके पहले नहीं.  चैतन्यता DNA-RNA सीमा में नहीं है.  चैतन्यता जीवन का वैभव है.

मैंने जीवन को देखा है, प्राणकोशाओं को भी देखा है, अणुओं को भी देखा है, परमाणु को भी देखा है, परमाणु में निहित अंशों को भी देखा है.  उसके बाद क्या बचता है?  इस सत्यता को आप स्वीकारें तो आगे कुछ अनुसंधान करने का कार्यक्रम बनता है.  जीवन परमाणु को पहचानना बहुत ज़रूरी है.  जीवन का जो स्वरूप है, कार्य प्रणाली है, लक्ष्य है - इन सब चीज़ों को पहचानने की ज़रुरत है.  उसके बिना विज्ञान की पूर्णता नहीं हो सकती.

जीवन को पहचाने बिना ज्ञान की पूर्णता भी नहीं हो सकती.  आदर्शवाद ने जीवन के स्थान पर आत्मा-परमात्मा का परिकल्पना दिया जो प्रमाणित नहीं हुआ.  वैसे ही विज्ञान भी जीवन के स्थान पर DNA-RNA की परिकल्पना देते हैं, पर उससे होता नहीं है.  अब इनको ले कर क्या किया जाए?

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (सितम्बर १९९९, आन्वरी)