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Friday, October 30, 2009

विज्ञान और मानव-भाषा सूत्र

विज्ञान का प्रयोजन मानव-चेतना विधि से मानव-लक्ष्य और जीवन-मूल्य प्रमाणित करने के लिए दिशा निर्धारित करना है।

विज्ञान में "काल-वादी ज्ञान", "क्रिया-वादी ज्ञान" और "निर्णय-वादी ज्ञान" के सार्वभौम सिद्धांत और नियमो का बोध-गम्य होना आवश्यक है।

निर्णय-कारी प्रवृत्ति में मानव-भाषा सूत्र जीवित रहने की आवश्यकता है। मानव-भाषा सूत्र को सार्वभौम रूप में, अर्थात धरती पर सभी मानव के स्वीकारने योग्य भाषा को, कारण-गुण-गणित रूप में पहचाना गया है।

कारणात्मक-भाषा में हर स्थिति, गति, घटना में निहित "मूल ज्ञान" स्पष्ट होता है। जैसे - अस्तित्व "होने" के रूप में है। मनुष्य-संसार, जीव-संसार, वनस्पति-संसार, और पदार्थ-संसार - ये चारों अवस्थाएं "होने" के आधार पर ही मानव में, से, के लिए समझ में आता है। "नहीं होना" मानव को समझ में आता नहीं है। "नहीं होना" होता ही नहीं है। "तिरोभाव" या "मिट जाने" का जो कल्पना दिया गया - वह मानव-परम्परा में प्रमाणित होना बना ही नहीं। इसका कारण यही है - "तिरोभाव" या "मिट जाना" होता ही नहीं है। "परिवर्तन" होना पाया जाता है। परिवर्तित रूप अस्तित्व में होता ही है। इसे संगठन-विघटन, रचना-विरचना, या परिणाम-परिवर्तन कहा जा सकता है। परिणाम-परिवर्तन की अपनी स्थिति निश्चित है। परिवर्तित सभी वस्तु अपनी स्थिति में होते ही हैं। परिवर्तित स्थिति पूर्व-स्थिति से भिन्न होते हुए भी "होना" समाप्त नहीं होता। किसी भी स्वरूप में होना, वह भी एक यथा-स्थिति होना - यह "सदा-सदा होने" की गवाही है।

गुणात्मक-भाषा से सम, विषम, और मध्यस्थ क्रियाकलाप स्पष्ट होता है। उद्भव क्रियाकलाप "सम"-क्रिया के रूप में, प्रलय क्रियाकलाप को "विषम"-क्रिया के रूप में पहचाना जाता है। साथ ही, जो कुछ भी उद्भवित रहता है उसको बनाए रखने में जो भी कार्यकलाप है - उसी का नाम "मध्यस्थ" है। अस्तित्व में चार अवस्थाओं का प्रगटन है। हर अवस्था का उसके वैभव को बनाए रखना मध्यस्थ-क्रियाकलाप है।

मध्यस्थ क्रियाकलाप को मनुष्य-परम्परा के सन्दर्भ में देखें तो - मानव परम्परा में शैशव, कौमार्य, यौवन, प्रौढ़, और वृद्ध अवस्थाओं के रूप में परिलक्षित है। मानव-परम्परा में "व्यवहार" इसी के साथ सुस्पष्ट होता है। हर मानव-संतान जन्म से ही न्याय का याचक होता है, सत्य वक्ता होता है, और सही कार्य-व्यवहार करने का इच्छुक होता है। मानव-संतान का अपने अभिभावकों के साथ "व्यवहार" होता ही है। मानव-संतान स्वाभाविक रूप में अपने अभिभावकों का अनुसरण-अनुकरण करता ही है। इस व्यवहार का "प्रयोजन" है - अभिभावकों द्वारा संतान में न्याय-प्रदायी क्षमता स्थापित हो, सत्य का बोध हो, और सही कार्य-व्यवहार करना सिखाया जाए। ऐसा करना अभिभावकों का "दायित्व" है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए अभिभावकों का पहले से उसके "योग्य" बने रहना आवश्यक है। इस प्रकार - हर मानव-सम्बन्ध में, दायित्वों को निर्वाह करने के लिए उसके लिए आवश्यक ज्ञान, विवेक, विज्ञान से संपन्न रहना आवश्यक है।

गणितात्मक भाषा समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने की आवश्यकता के आधार पर गणना-विधि पूर्वक "वस्तु-मूलक गणित" को समझने के लिए है। मनुष्य का अकेले में कोई कार्यक्रम नहीं है। अकेले मनुष्य में कोई "प्रमाण" नहीं है। अकेले में कोई "व्यवहार" होता नहीं है। दो व्यक्ति से अधिक होने पर ही "परिवार" कहलाता है। परिवार में होने के बाद समाधान-समृद्धि का वैभव प्रमाणित होना आवश्यक हो जाता है। परिवार की आवश्यकताओं में "समृद्धि" से सम्बंधित जितनी भी बात है, उसमें गणित के आधार पर भी बात करना बनता है। वस्तु-मूलक गणित मानव-उपकारी होना पाया जाता है। मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ मनुष्य जितना भी कार्य करता है - वह सर्वाधिक भाग गणित-ग्राही है।

नित्यम् यातु शुभोदयम

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित  (अप्रैल २००६, अमरकंटक)

Thursday, October 29, 2009

प्रचार-माध्यमो की सार्थकता

आज सभी प्रचार-माध्यम अपराध-गतिविधियों को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया करता है। प्रचार-माध्यम का मूल स्वरूप सही-गलती को चेताने से है, अथवा स्पष्ट करने से है। इसमें से "गलती" का प्रचार हुआ - लेकिन "क्या सही है" और "क्या होना चाहिए" इसका प्रचार नहीं हो पाया। इसी कारण-वश अपराध-प्रवृत्तियां बुलंद हुई। सही पक्ष का पता नहीं हो पाया।

किसी घटना को हम "ग़लत" मानते हैं तो उस मानने में "सही" की अपेक्षा समाहित ही रहती है। इस बात को हृदयंगम करने से पता लगता है कि प्रचार-माध्यम अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए हर "ग़लत" घटित-घटना को बढ़ा-चढा कर बताने के स्थान पर, "सही" घटनाएं कैसे होना चाहिए - इस तथ्य को उजागर करें। इस तरह मानव-परम्परा में सुधार होना स्वयं-स्फूर्त होगी। इस विधि से - शुभ को चाहने वाले सभी प्रचार-माध्यम अपनी सार्थकता, पूरकता, और उपयोगिता को प्रमाणित कर सकते हैं। अपराधों का प्रचार करने से अपराध बढे हैं। धरती का बीमार होना मनुष्य के अपराधों से हुआ है।

अपराध करने वाला व्यक्ति या समुदाय यह मान कर अपराध करता है - "सभी अपराधी हैं" अथवा "दूसरे लोग हमसे ज्यादा अपराधी हैं।" इसी मान्यता के साथ अपराध और मज़बूत होता जाता है। अपराध करने वाले को सही दिशा, सही कार्य, सही प्रयोजन बोध कराने की स्थिति में अपराध प्रवृत्ति सुधरने की ओर दिशा मिलना स्वाभाविक हो जाती है। इसलिए यह उचित है की पत्र-पत्रिका, रेडियो, टेलिविज़न, और आज की स्थिति में इन्टरनेट भी - सभी दिशाओं में "सही पक्ष क्या होना चाहिए?" - इसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। इसके लिए प्रचार-कार्यों में कार्यरत मेधावियों को "सही-पक्ष" में पारंगत होने की आवश्यकता है। उनको सभी स्थितियों में "सही" और "ग़लत" की विभाजन-रेखा को परखने की आवश्यकता है।

"सही" और "ग़लत" की विभाजन-रेखा जीव-चेतना और मानव-चेतना के मध्य में ही होता है। जीव-चेतना विधि से कामोन्मादी, भोगोन्मादी, और लाभोन्मादी प्रेरणाएं मिल रही हैं - जो "भ्रम" का द्योतक है। मानव-चेतना अपने स्वरूप में जीवन-जागृति का द्योतक है। जागृति और भ्रम उजाले और अंधेरे जैसा ही है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६)

विरोध पर विजय पाना सम्भव है.

आदिकाल से आज तक युद्ध को सर्व-जन मानस में आवश्यकता के रूप में स्वीकारा नहीं गया, एक "मजबूरी" के रूप में ही स्वीकारा गया। ऐसी मजबूरी के लिए तर्क यह दिया जाता है - पडौसी देश जब सामरिक तंत्र को तैयार करता है, तब हमको करना ही पड़ेगा। ऐसे उदगार जो पहले तैयार करता है, वह भी देता है। बाद में जो तैयार करता है, वह भी यही तर्क देता है। ऐसे में किसको सही माने? तब यही एक निष्कर्ष निकलता है - राज-गद्दी में जो बैठने को व्यक्ति तैयार होता है, उसके मन में सामरिक-तंत्र भय और प्रलोभन के आधार पर तैयार हुआ ही रहता है। राजगद्दी पर बैठे हुए आदमी को गद्दी खिसकने का भय बना ही रहता है। इसलिए राज-गद्दी में बैठ-कर पैसे को वितरित करने के "दाता" बने रहते हैं, और गद्दी बनाए रखने के लिए कितने भी भृष्टाचार, अनाचार, दुराचार समावेश करने के लिए प्रलोभित रहते हैं। एक निष्कर्ष निकलता है - "राज-गद्दी रहेगा तो युद्ध-कार्य रहेगा ही!"

इस प्रकार की स्थिति में इससे बचा कैसे जाए? इस पर सोचने के लिए विकल्पात्मक विधि की आवश्यकता हुई, जो अनुसंधान पूर्वक हमारे करतलगत हो गयी।

मानव-चेतना विधि से हम यह पाये हैं - विरोध का विरोध, और विरोध का दमन के स्थान पर "विरोध पर विजय" पाना सम्भव है। यह समझदारी सहज रूप में लोकव्यापीकरण होना ही है। इसे पाने के लिए सूत्र रूप में "चेतना-विकास मूल्य-शिक्षा" विधि से पूरे देश में "विरोध पर विजय" पाने की मानसिकता को तैयार किया जा सकता है। विरोध पर विजय पाने के लिए "सर्वतोमुखी समाधान" ही एक मात्र उपाय है। "सर्वतोमुखी समाधान" समझदारी से ही मानव-परम्परा में प्रमाणित होता है। इसके लिए सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान - इन तीनो में अध्ययन पूर्वक पारंगत होने के उपरांत ही अनुभव-मूलक विधि से सर्वतोमुखी समाधान प्रकट करने का अधिकार हर व्यक्ति में होना पाया जाता है।

इस ओर हर शुभ चाहने वाले व्यक्ति को ध्यान देने की आवश्यकता पैदा हो गयी है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६, अमरकंटक)

वर्तमान का विखंडन नहीं किया जा सकता.

वर्तमान का तात्पर्य है - होना, रहना। होने-रहने में क्रियाशीलता सदा-सदा से स्थिति-गति रूप में, फल-परिणाम रूप में, वर्तता ही रहता है, अभी भी वर्त रहा है, आगे भी वर्तता रहेगा। इस प्रकार वर्तमान कहीं भी खंडित होना, या खंडित रहना - किसी भी विधि से सम्भव नहीं है।

"ऋणात्मक विधि" से वस्तु के अभावित होने की बात किया जाता है। ऐसे प्रयोगों को सर्वाधिक रूप में गणितीय विधि से संपन्न करना देखने को मिल रहा है। ऋणात्मक विधि से वस्तु स्थानांतरित होती है। कोई एक देश-काल में वस्तु जो थी, वह दूसरे देश-काल में चली गयी। उदाहरण रूप में : "१० - १० = ० " - ऐसा गणित में लिखा करते हैं। इससे मानव को संदेश रूप में जो स्वीकारने को सूत्र मिलता है - "वस्तु नहीं रहा!" इस तरह गणितीय विधि जो सच्चाई को उद्घाटित करने गया था, झूठाई में उलझाते चले गए।

"विखंडन विधि" से भी वस्तु और क्रिया के समाप्त होने की कल्पना दी जाती है। विखंडन क्रम के लिए चक्कू, छुरी, तलवार, पिसाई, घुटाई का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद संख्यात्मक गणित का सहारा लिया जाता है। इस क्रम में - एक वस्तु को हज़ार टुकडा किया, पुनः उसमें से एक टुकड़े को हज़ार टुकडा किया, इस प्रकार करते-करते टुकडा विधि से एक टुकडा बचा ही रहता है। जिसको गणितीय विधि में "नगण्य" मान लेते हैं, अथवा और टुकडा करने में दिलचस्पी ख़त्म हो जाता है, अथवा और टुकडा करने का आवश्यकता नहीं रहता। ऐसी थकी हुई मानसिकता की स्थिति में "वस्तु समाप्त हो गयी" - ऐसा गणितीय विधि से स्वीकार लेते हैं। जबकि हर विखंडन के पहले "एक" होना स्वीकारे ही रहते हैं। उसको हज़ार भाग में विभाजित करने के बाद एक भाग को पुनः विभाजित करना स्वीकारते हैं। शेष ९९९ भाग यथावत रखा ही रहता है। इस क्रम को जोड़ने पर पता लगता है मानव भ्रमित करने को ही विखंडन-विधि गणित को अपनाए। विखंडन-विधि गणित मनुष्य को कुछ भी सकारात्मक वस्तु, उपलब्धि, घटना, अथवा ज्ञान देने में असमर्थ रहा। जबकि गणितीय भाषा को सर्वाधिक सत्य मान करके विज्ञान-संसार उदय हुआ था!

"दबाव विधि" से भी वस्तु और क्रिया के समाप्त होने की कल्पना दी जाती है। इसमें "यांत्रिक दबाव" और "ऊष्मा दबाव" के भेदों से प्रयोग संपन्न हुए। इन प्रयोगों में बहुत प्रकार के रसायन द्रव्यों के संयोग में ऊष्मा-दबाव पैदा करते हुए देखा गया। एक पटाखा से लेकर बन्दूक तक, बन्दूक से लेकर तोप तक, तोप से लेकर आण्विक-बम्ब तक विध्वंस क्रियाकलापों को करता हुआ देखा गया। इन सभी क्रम में ऊष्मा विधि से दबाव होना, उस दबाव से वातावरण में ध्वनि से लेकर कुछ न कुछ उपद्रव मचाने के रूप में निरीक्षण-परीक्षण करके निर्णय लेते चले गए।

इन सभी विधियों में सर्वाधिक हानि-प्रद ऊष्मा-तंत्र प्रदूषण विकीरणीय धातुओं के परिष्करण पूर्वक मध्यांश का विखंडन पूर्वक हुआ। यह सब जो मानव जाति के लिए नकारात्मक है - उसका गुण-गायन आए दिन प्रचार-माध्यमो द्वारा उछाला जाता है। इस प्रकार विज्ञानं विधा में जो सर्वाधिक सम्मान पाते हैं - वह सर्वाधिक विध्वंस-कारी, मानव-विरोधी, और नियति-विरोधी है। यह सब नाश और अड़चन का कारण बन चुकी है। सामरिक तंत्रों में, सामरिक विचारों में, सामरिक प्रयोगों में संलग्न विज्ञानियों को सर्वाधिक उपयोगी माना जाता है।

हर ईष्ट-अनिष्ट घटनाएं वर्तमान में ही घटित होती हैं। इसमें से ईष्ट घटनाएं मानव को स्वीकार होती हैं, अनिष्ट घटनाएं मानव को स्वीकार नहीं होती। हम अपराध के लिए भले ही भय-प्रलोभन वश सहमत हो गए हों, पर आज की स्थिति में मानव-कुल में जीवित सर्वाधिक लोगों में अपराध अस्वीकृत है। इसीलिए विकल्पात्मक विधि को सोचने की आवश्यकता है।

अपराध-मुक्ति विकल्पात्मक विधि से ही सम्भव है, परम्परा-गत विधि से नहीं। भटकाव से मुक्ति पाने के लिए सह-अस्तित्ववादी विकल्पात्मक विचार, शास्त्र, शिक्षा, व्यवस्था के प्रति पारंगत होना आवश्यक हो गया है। यह "सर्वतोमुखी समाधान" एक सहज-मार्ग होना स्पष्ट हो चुका है।

श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६)

Wednesday, October 28, 2009

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोजन

मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता है - यह सबको पता है। उल्लेखनीय और विचारणीय बात यह है - २१वी सदी तक "कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोजन क्या है?", इस बात पर कोई मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री, अर्थ-शास्त्री ध्यान क्यों नहीं दे पाये? यह धर्म-नीति और राज्य-नीति संसार के विद्वानों के लिए और भी गंभीर रूप में सोचने का मुद्दा है।

मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोजन क्या है? इस का सार-संक्षेप उत्तर यही है - (१) कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता मनुष्य में "नियति-प्रदत्त" है। सह-अस्तित्व में "प्रकटन विधि" से मनुष्य-परम्परा धरती पर है, जिसमें कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता है। (२) मनुष्य में प्रकट कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का "तृप्ति-बिन्दु" पाना ही इस कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोजन है। यही "मानव-लक्ष्य" भी है।

मानव की परिभाषा है - "मनाकार को साकार करने वाला, और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला"। मानव ने अभी तक अपनी परिभाषा का आधा भाग - "मनाकार को साकार करना" - पूरा कर लिया है। इसी क्रम में मनुष्य-परम्परा ने आहार, आवास, अलंकार, दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, और दूर-गमन संबन्धी वस्तुओं को प्राप्त कर लिया। यह मनुष्य की कर्म-स्वतंत्रता के फलस्वरूप ही हुआ। कल्पनाशीलता के साथ ही कर्म-स्वतंत्रता प्रकट हुई है। मनुष्य अपनी कल्पनाशीलता को कर्म-स्वतंत्रता में परिवर्तित करता रहा - जिससे उसने अपनी परिभाषा का आधा-भाग प्रमाणित कर लिया। लेकिन उक्त वस्तुएं प्राप्त होने के बावजूद मानव का सुखी होना - या मनः स्वस्थता प्रमाणित होना - नहीं बन पाया। मनुष्य कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित विधियों से जितने भी कर्म करता आया, और आगे करने वाला है - उन सबके फलन में मनुष्य "सुखी" होना चाहता है, या मनः स्वस्थता प्रमाणित करना चाहता है।

इस प्रकार हम इस निष्कर्ष में आते हैं - कल्पनाशीलता में ही सुखी होने की आशा, अथवा अपेक्षा, अथवा इच्छा समाई है।

आशा, अपेक्षा, और इच्छा जीवन-सहज प्रक्रिया है। इसी के साथ जीवन में स्मृतियाँ प्रभावित रहती ही हैं। हर मानव में विगत से स्मृतियाँ, वर्तमान में प्रमाण, और भविष्य के लिए अपेक्षा होना स्पष्ट होता है। "सुख" प्रमाण स्वरूप में वर्तमान में ही होता है। वर्तमान में आशा, अपेक्षा, और इच्छा के तृप्त न होने के फलस्वरूप ही मनुष्य भूत और भविष्य में अपने स्मरण को दौडाए रहता है। भूत और भविष्य "सुख" का आधार न होने के फलस्वरूप मनुष्य "मनमानी" करता है।

मनुष्य की "मनमानी" को रोकने के प्रयास करने के लिए दो ध्रुवों में "भय" और "प्रलोभन" का तंत्र प्रस्तुत हुआ। इसे कुछ इने-गिने लोग ही स्थापित किए। प्रलोभानात्मक-तंत्र विभिन्न देश-काल और समुदायों में विभिन्न प्रकार से "धर्म-गद्दी" द्वारा प्रस्तुत हुआ। इसमें रहस्यमयी ईश्वर, अनुकरण न हो सकने वाले महापुरुष, अवतारी पुरूष, ईश्वर के संदेश-वाहक, सिद्ध-पुरुषों को केन्द्र में रख कर तरने-तारने का प्रलोभानात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। साथ ही "पाप" के प्रति भय, और प्रायश्चित्त का कार्यक्रम दिया गया। इसी प्रकार राज्य-तंत्र द्वारा सामान्य व्यक्तियों को जान-माल की रक्षा करने का आश्वासन और उसके लिए सीमा-सुरक्षा करने का कार्यक्रम रहा। इसके साथ ही राज्य-तंत्र का स्पष्ट-कार्यक्रम रहा - गलती को गलती से रोकना, अपराध को अपराध से रोकना, और युद्ध को युद्ध से रोकना। धर्म-गद्दी और राज्य-गद्दी का तंत्र यह सोचकर आरम्भ हुआ - सामान्य व्यक्ति इन तंत्रों की मूल-प्रवृत्ति को समझ नहीं पायेगा। २१ वी शताब्दी तक सर्वाधिक मानव इन तंत्रों की कलई को खुलते हुए देख लिया अथवा इन तंत्रों का प्रयोजन क्या हुआ और क्या हो रहा है - यह समझने के योग्य हो गया।

मानव अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के चलते - जंगल युग से ग्राम-कबीला युग में, ग्राम-कबीला युग से राज्य-युग में, राज्य-युग से लोक-तंत्र युग में पहुँच गया। लोकतंत्र में हर मानव, अथवा सर्वाधिक मानव "नेतृत्व मानसिकता" के लिए तत्पर रहा। इने-गिने लोगों को ही नेतृत्व-पद मिल सकता है, इसलिए उसके लिए संघर्ष भावी हो गया। इसके साथ - लोकतंत्र युग में राज्य-युग में राजाओं के सुविधा-संग्रह की सूचना सर्व-मानव के लिए प्रस्तुत हो गयी। उस आधार पर राजाओं को जो सुविधा-संग्रह उपलब्ध था, उससे ज्यादा पाने के लिए नेतृत्व प्रवृत्तियां आंकलित होता हुआ देखा गया।

राज्य-युग में आचार्य एक "आदर्श" रूप में गण्य होता था। राज-गद्दी पर बैठा हुआ राजा अपने को "आदर्श" होना स्वीकार ही लेता था। राज्य-गद्दी के "आदर्श" पूर्णतया सुविधा-संग्रह और अय्याशी-बदमाशी से भरा रहा। राज्य-गद्दी के ढांचे-खांचे में ही जन-प्रतिनिधि सर्वाधिक संख्या में उलझा हुआ दिखाई पड़ता है। जन-प्रतिनिधि विधि से गण-तंत्र प्रणाली राज्य-युग के तुलना में "पवित्र" होना जनमानस में स्वीकृत रहा। लेकिन आज की स्थिति में जन-प्रतिनिधि सर्वाधिक भृष्टाचार, अप्रत्याशित धूर्तता पूर्वक सुविधा-संग्रह उपार्जित करता हुआ देखने को मिलता है। "अप्रत्याशित" से मतलब है - जिस समय जनमानस निर्वाचन क्रिया करता है उस समय स्वीकृति रहती है कि जन-प्रतिनिधि जन-हित में कार्य करेगा। निर्वाचित होने के बाद - "जन-हित" भाषा में ही रह गयी। जन-हित के लिए जो मुद्रा-तंत्र था, वह जन-प्रतिनिधि के द्वारा निक्षेपित होता गया।

इस तरह जिनको सामान्य लोग "आदर्श" या "श्रेष्ठ" स्वीकारते रहे - उनका लक्ष्य केवल "सुविधा-संग्रह" ही होता हुआ देखा गया। फलतः सभी ज्ञानी, अज्ञानी, और विज्ञानी सुविधा-संग्रह की ही कतार में हो गए। सर्वाधिक जनमानस जब भृष्टाचार के लिए तत्पर हो गया तो इसके प्रथम-चरण में ही लोगों को यह भी पता चला कि धरती बीमार हो गयी। मानव अनेक प्रकार के नए-नए रोगों में ग्रस्त होता गया। यह सब परिस्थितियां अत्याधुनिक वर्चस्व का फल-परिणाम है। मनुष्य परम्परा अपराध-ग्रस्त हो चुकी है। ये परिस्थितयां मनुष्य परम्परा के अपराधों के फल-परिणाम हैं। २१ वी सदी तक जीव-चेतना विधि से जीने के क्रम में मनुष्य-परम्परा में सुविधा-संग्रह की लिप्सा बढ़ी, जिसके लिए सम्पूर्ण अपराध किए गए।

अपराध-मुक्त मानव-परम्परा के लिए हर व्यक्ति समाधान-संपन्न होना, और हर परिवार समाधान-समृद्धि संपन्न होना और उपकार करना आवश्यक है। उसके लिए मनुष्य में "चेतना विकास" ही प्रधान मुद्दा है। मानव-चेतना में जीवन-सहज आशा, अपेक्षा, और इच्छा "वर्तमान" में ही तृप्त रहती हैं। "मनमानी" को रोकने के लिए फ़िर "भय", "प्रलोभन", और "आस्था" पर आधारित तंत्रों की आवश्यकता नहीं रहती।

"चेतना-विकास मूल्य-शिक्षा" का कार्यक्रम पैसे से नहीं है। उसके लिए समझदारी से संपन्न - अर्थात मानव-चेतना, देव-चेतना संपन्न अध्यापको, गुरुजनों, आचार्यों की आवश्यकता है। मानव-चेतना में पारंगत हर मानव संबंधों को "प्रयोजनों के आधार पर" पहचानता है, और उसके निर्वाह करने के क्रम में कृतज्ञता, गौरव, श्रृद्धा, प्रेम, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान, स्नेह जैसे मूल्यों को प्रमाणित करता है। यही "न्याय-परम्परा" का मतलब है। इन उपलब्धियों के आधार पर "अखंड-समाज" और "सार्वभौम व्यवस्था" के साथ सर्व-मानव का "निरंतर सुखी" होना बनता है। यही मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का "प्रयोजन" है।

जीवन में दृष्टा-पद प्रतिष्ठा, और जागृति-सहज प्रमाणों का मानव-परम्परा में होना आवश्यक हो गया है। क्योंकि मानव-परम्परा अपराधों से मुक्त होना चाहता है, और मानव-परम्परा के अपराधों से मुक्त होने की आवश्यकता है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित, अप्रैल २००६, अमरकंटक

Tuesday, October 27, 2009

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का स्त्रोत क्या है, क्यों है, और कैसा है?

कल्पनाशीलता के साथ कर्म-स्वतंत्रता हर नर-नारी में, से, के लिए "स्वाभाविक रूप" में है। "स्वाभाविक" का मतलब - "नियति-सहजता" से है। "नियति-सहजता" का मतलब - सह-अस्तित्व में प्रकटन क्रम में जो विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति है उससे मानव-परम्परा धरती पर प्रकट हुई। मानव-परम्परा में शरीर-रचना की मौलिकता में यह पाया गया कि जीवन-सहज कल्पनाशीलता - शरीर और जीवन के संयुक्त स्वरूप में प्रकट होता हुआ देखने को मिलता है। मानव-परम्परा शरीर और जीवन के संयुक्त साकार रूप में प्रकट होता हुआ देखने को मिलता है। हर नर-नारी में, से, के लिए जीवन का स्वरूप, जीवन का कार्य, जीवन का प्रयोजन समान होना अध्ययन-गम्य है। यह अध्ययन "अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन" क्रम में प्रकट और प्रमाणित है।

मानव आदिकाल से - मैं कौन हूँ? कैसा हूँ? और क्यों हूँ? इन प्रश्नों के उत्तर पाने का इच्छुक रहा है। इन प्रश्नों का उत्तर "अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन" के प्रकट और प्रमाणित होने से स्पष्ट रूप में सूचित करना सम्भव हो गया है। मैं कौन हूँ? मैं कैसा हूँ? और मैं क्यों हूँ? - इन प्रश्नों को लेकर मानव निरुत्तरित होता हुआ देखा जाता है। इनका उत्तर प्रस्तुत करना अब सुलभ हो गया है।

कल्पनाशीलता का स्त्रोत "जीवन" है। जीवन कहाँ से आया? इस प्रश्न का उत्तर सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में परमाणु में विकास-क्रम, और विकास होना स्पष्टतः समझ में आया है। हर परमाणु एक निश्चित गठन होता है। हर गठन में दो या दो से अधिक परमाणु-अंशों का होना समझ में आता है। इसी क्रम में परमाणुओं का "भूखे" और "अजीर्ण" होना भी समझ में आता है। "भूखा" और "अजीर्ण" भाषा मानव-संवेदना से जुडी अवश्य है। मानव ही समझने वाला इकाई है, इसलिए मानव-संवेदना से जुडी भाषा है। परमाणुओं के गठन-क्रम में परमाणु का "तृप्त" होना या "गठन-पूर्णता" होना भी समझ में आता है। ऐसे "गठन-पूर्ण" परमाणु का चैतन्य इकाई के रूप में जीवन-पद प्रतिष्ठा में वैभवित होना, अथवा प्रभावित होना पाया गया। जीवन के "प्रभावित" होने का माध्यम शरीर ही रहा। इसका सिद्धांत यही है - "अधिक शक्ति और बल, कम शक्ति और बल के माध्यम से प्रमाणित होना पाया जाता है।" जीवन गठन-पूर्णता के आधार पर अक्षय-बल और अक्षय-शक्ति संपन्न है, "परिमाम का अमरत्व" सहज वैभव है। शरीर एक भौतिक-रासायनिक रचना है - जो सह-अस्तित्व में प्रकटन विधि से धरती पर प्रकट है। शरीर जीवन की तुलना में कम बल और शक्ति संपन्न है। इसलिए जीवन शरीर के माध्यम से प्रमाणित होता है।

मानव अपने कल्पनाशीलता को कर्म-स्वतंत्रता में परिवर्तित करता रहता है। कर्म-स्वतंत्रता मानव-परम्परा में प्रमाणित होती है। मानव-चेतना पूर्वक जीवन-सहज कल्पनाशीलता और मानव-सहज कर्म-स्वतंत्रता का तृप्ति-बिन्दु स्पष्ट होता है। जीवन-सहज कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिन्दु जीवन-लक्ष्य - सुख, शान्ति, संतोष, आनंद - के स्वरूप में है। मानव-सहज कर्म-स्वतंत्रता का तृप्ति-बिन्दु मानव-लक्ष्य - समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व - के स्वरूप में है। मानव-लक्ष्य प्रमाणित होता है तो जीवन-लक्ष्य भी प्रमाणित होता है। जीवन-लक्ष्य प्रमाणित होता है तो मानव-लक्ष्य भी प्रमाणित होता है। जीवन-लक्ष्य मानव-परम्परा में प्रमाणित होना अवश्यम्भावी है, क्योंकि मानव-परम्परा जीव-चेतना वश अनेक प्रकार से अपराध करने में प्रवृत्त हो चुका है। इसकी गवाही धरती के बीमार होने के रूप में प्रस्तुत है। जीवन-सहज जागृति मानव-परम्परा में ही प्रमाणित होती है। जिसके फलन में मानव का चारों अवस्थाओं के साथ संतुलन पूर्वक जीना, न्याय-धर्म-सत्य का प्रमाणित हो पाना, मानव-परम्परा में, से, के लिए एक महिमा-संपन्न वैभव है। महिमा-सम्पन्नता का तात्पर्य "अपराध मुक्त परम्परा" से है। यह सब कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के तृप्ति-बिन्दु को पाने के क्रम में शोध और अनुसंधान पूर्वक अध्ययन के लिए प्रस्तुत हुआ।

अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व स्वरूप में होना, सह-अस्तित्व स्वयं व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तु के रूप में होना स्पष्ट हुआ है। यह समाधि-संयम विधि से अनुसंधानित एवं प्रकाशित तथ्य है। समाधि-संयम का एक झलक ऋषि-कुल परम्परा में "वेद" और "वेदान्त" नाम से श्रुति और स्मृति के रूप में वांग्मय प्रस्तुत है। जिसके कथन के अनुसार - "ज्ञान सर्वोपरि सम्पदा है।" साथ में यह भी प्रतिपादित है - "ज्ञान ही ज्ञाता भी है।" और "ज्ञान ही ज्ञेय भी है।" ऐसा इन ग्रंथों में कहा गया है। ऐसे गहन, गूढ़, और गंभीर रहस्यमय शब्दों के साथ उपदेश-परम्परा में यह इंगित किया गया है - धारणा, ध्यान, और समाधि पूर्वक ही अज्ञात ज्ञात होना बताया गया है। इस उपदेश को साधना-विधि से अन्तिम-निर्णय पाने के उद्देश्य से लेखक स्वयं उद्यत हुए, और उसमें सफल हो गए। इस क्रम में सत्यापन यही है - "समाधि में कोई ज्ञान नहीं हुआ।" संयम विधि से सम्पूर्ण अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूप में अनुभव हुआ, फल-स्वरूप उसका व्याख्या करना सुगम हो गया।

इस प्रकार कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का स्त्रोत समझने के साथ-साथ इनकी "सार्थकता" भी समझ में आया। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता की सार्थकता मानव-चेतना पूर्वक मनः-स्वस्थता को प्रमाणित करने में है। मनः स्वस्थता अभ्युदय या सर्वतोमुखी-समाधान के स्वरूप में है। इसके फलन में सम्पूर्ण मानव जाति को "अखंड-समाज" के रूप में पहचानना बनता है। इसी विधि से "सार्वभौम व्यवस्था" का स्वरूप स्पष्ट है। यह इस बात का उत्तर है - कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता "क्यों" है? "अखंड-समाज" और "सार्वभौम-व्यवस्था" को प्रमाणित करने के लिए कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता है।

परिवार में हर सदस्य का समझदार होना, फलस्वरूप समाधान-संपन्न होना, और श्रम-पूर्वक समृद्धि-संपन्न होना आवश्यक है। समाधान-समृद्धि पूर्वक ही हर परिवार "उपकार प्रवृत्ति" में होना पाया जाता है। इस प्रकार "सार्वभौम व्यवस्था" का १० सोपानीय स्वरूप निकलता है। इस तरह "कैसा" प्रश्न का उत्तर मिलता है। सार्वभौम व्यवस्था के १० सोपानीय स्वरूप को हम अगले प्रसंग में देखेंगे।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित, अप्रैल २००६, अमरकंटक

Monday, October 26, 2009

कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का सार्थक स्वरूप

मानव में स्मृति और कल्पनाशीलता का स्त्रोत और प्रक्रिया को समझने के लिए अपेक्षा बनी रहती है। इसका मूल कारण हर मानव में - चाहे बच्चे हों, बूढे हों, नर हों, नारी हों - कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता वर्तमान रहना पाया जाता है।

मानव अपने कल्पनाशीलता को कर्मस्वतंत्रता में परिवर्तित करता रहता है। मानव अपने शरीर के साथ ही कल्पनाशीलता और कर्मस्वतंत्रता को प्रयोग करता दिखाई पड़ता है।

मानव के अध्ययन से पता चलता है - मानव अपनी आंखों से जो देखता है उससे अधिक समझता हुआ स्पष्ट आंकलित होता है। हर "रूप" में आकार, आयतन, घन समाहित रहता है। आंखों पर सामने वस्तु के रूप का १८० अंश तक ही आकार-आयतन प्रतिबिंबित होता है। शेष १८० अंश ओझिल रहता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि आकार आयतन का पूरा स्वरूप आंखों में आता नहीं है। इसी के साथ "घन" का स्वरूप आंखों तक पहुँचता ही नहीं है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मानव का अध्ययन करते हैं तो हमको पता चलता है - समझने का पक्ष हर मानव में सक्रिय रहता ही है। इसी क्रम में मानव गणितीय विधि से आकार, आयतन, और घन को समझ पाता है। यह प्रक्रिया हर मनुष्य में कल्पनाशीलता और कर्मस्वतंत्रता की बदौलत है।

अब यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है कि - समझने वाली चीज क्या है? पाँचों ज्ञान-इन्द्रियों में - यथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों में - किसी एक वस्तु का "सम्पूर्णता" पहुँच नहीं पाता है। "सम्पूर्णता" को समझने की अपेक्षा मनुष्य में बना ही रहता है। सुदूर विगत से ही मानव घटनाओं को पहचानने का प्रयास करते ही आया है।

मनुष्य ने अपने इतिहास में - "कारण" के आधार पर, "गुण" के आधार पर, और "गणित" के आधार पर घटनाओं को पहचानने का प्रयास किया है। विगत में अध्यात्मवादियों ने ईश्वर को "मूल कारण" के रूप में भाषा में प्रस्तुत किया। उसके बाद अपनी कल्पनाशीलता का प्रयोग करते हुए ईश्वर का बहुत-कुछ गुणगान किया। अभी तक आदर्शवादी लोग शिक्षा-जगत में ईश्वरीयता को अथवा ईश्वर को "मूल कारण" के रूप में पहचानने की व्यवस्था दे नहीं पाये। इस गवाही से यह स्पष्ट होता है, इस सोच-विचार का गम्य-स्थली अधूरा रहा।

दूसरा प्रयास इस रूप में हुआ - जिसमें कहा गया ईश्वर देवी-देवताओं के रूप में महिमा, लीला, और मर्यादाओं को प्रकट करते हैं, दुष्टों का नाश करते हैं, भक्तों का संरक्षण करते हैं। इस प्रकार की महिमा-संपन्न देवी-देवताओं को अपने ईष्ट के रूप में स्वीकारने के लिए बहुत सारे तौर-तरीके प्रस्तुत करते हुए, लोगों में ईश्वर और देवी-देवताओं के प्रति "आस्था" स्थापित करने के लिए अनेकानेक विधियों को सत्कथा, परीकथाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया। साथ ही "उपदेश" के रूप में उपासना, आराधना, ध्यान, पूजा-पाठ, प्रार्थना पूर्वक "ईश्वर-कृपा" और "देव-कृपा" पूर्वक शरीर-यात्रा या जन्म सार्थक होना - यह सब की स्वीकृति "भक्ति" के नाम से प्रचलित हुआ। भक्ति के लिए "गुणात्मक भाषा" का प्रयोग ज्यादा हुआ।

ईश्वरवाद (अर्थात विरक्तिवाद) और भक्तिवाद दोनों प्रचलित हुआ। उसके बाद भौतिकवाद शुरू होने के साथ भक्ति-विरक्ति विचाराधीन होता गया। दूसरी भाषा में "अनास्था" की ओर मानव-मानसिकता परिवर्तित होता हुआ, और सुविधा-संग्रह प्रवृत्ति बढ़ता हुआ देखा गया। भौतिकवाद में "गणितात्मक भाषा" का प्रयोग हुआ। गणितीय भाषा विधि से भी मनुष्य का अध्ययन नहीं हुआ। भौतिकवादी महिमा प्रौद्योगिकी विधि से जो प्रकट हुआ - उससे जन-मानस "सुविधा-संग्रह" के वश में आ गया। इसके बावजूद भक्ति-विरक्ति सर्वथा लुप्त हो गयी - ऐसा नहीं हुआ।

ईश्वरवाद अथवा आदर्शवाद "कारणात्मक सोच-विचार" की सम्प्रेष्णा में पहुँचा, जबकि गुणात्मक और गनितात्मक भाषा गौण रहा। भक्तिवाद में गुणात्मक भाषा प्रधानतः मानसिकता में रहा तथा अन्य दोनों गौण रहा। भौतिकवाद में गणितात्मक भाषा प्रबल रहा, गुण और कारणात्मक भाषा गौण रहा। इस विधि से यह समझ में आता है - मानव-भाषा अभी तक पूर्णतया प्रयोग नहीं हो पाया। इसी के साथ यह भी समझ में आता है - सच्चाई को समझने के लिए मानव-भाषा के रूप में कारण, गुण, और गणित को संयुक्त रूप में स्वीकारना ही होगा।

"सुख-शान्ति पूर्वक जीना" - सामान्य व्यक्ति में यह सहज-अपेक्षा पायी जाती है। इस अपेक्षा के लिए स्मृति के साथ कल्पनाशीलता को जोड़ कर मानव-जाति सोचता आया, प्रयोग करता आया। इससे यह हमको पता चलता है - हर मानव सोचने वाला है, हर मानव में सोच-विचार की आवश्यकता बनी हुई है। साथ ही - सोच-विचार में "सुख-शान्ति पूर्वक जीना" की स्थिति-गति को पहचानने की आवश्यकता बनी हुई है। मानव कल्पनाशील है, विचारशील है, और इस कल्पना और विचार का मुद्दा है - सुख-शान्ति पूर्वक जीना।

मानव के अध्ययन से पता चलता है - हर मानव समझने-समझाने वाला भी है। और शरीर द्वारा सोच-विचार को प्रस्तुत करता है। इस तरह से विचार मानव-परम्परा में "अनुकरणीय विधि से" पीढी से पीढी पहुँचता हुआ देखने को मिलता है। जो विचार नहीं पहुँच पाता है, उसके स्थान पर परिवर्तित रूप में और कोई चीज स्थापित हो जाती है।

इसी के साथ मानव के अध्ययन में यह भी स्पष्ट होता है - समझ, सोच-विचार, और कल्पनाशीलता शरीर से भिन्न है। ऐसे शरीर से भिन्न वस्तु को पहचानने के क्रम में पता चला कि यह "जीवन" है। जीवन अपने में "अमर" और "नित्य" रहता है। शरीर गर्भाशय में तैयार होता है। ऐसे शरीर को जीवन पहचानता है और संचालित करता है। हर जीवन एक शरीर को संचालित करता है। जीवन का प्रकाशन समझ, सोच-विचार, और कल्पना के रूप में है। उसका प्रमाण मानव-परम्परा में है। शरीर के द्वारा जीवन व्यक्त होना पाया जाता है। इस प्रकार मानव को जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में पहचानना सुलभ हो गया है।

जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव को पहचानने के उपरांत ही कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोजन स्पष्ट होता है। सोच-विचार में "सुख-शान्ति पूर्वक जीने की इच्छा" भी जीवन के स्वत्व रूप में होना समझ में आता है। स्मृतियाँ जीवन में विद्यमान होना स्पष्ट होता है। स्मृतियाँ जीवन का स्वत्व होना समझ में आता है। जीवन ही कल्पनाशीलता और स्मृति का स्त्रोत है।

समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने की इच्छा भी जीवन में प्रकाशित होने वाली प्रक्रिया है। सुख-शान्ति पूर्वक जीने के लिए समाधान-समृद्धि आवश्यक है। समाधान हर नर-नारी में होता है। समृद्धि हर परिवार में होता है। समझदारी से समाधान, और श्रम से समृद्धि होना पाया जाता है।

समझदारी का स्त्रोत सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व है। सह-अस्तित्व अपने स्वरूप में व्यापक वस्तु में समाई हुई एक-एक वस्तुएं हैं, जो जड़-चैतन्य रूप में अध्ययन-गम्य हैं। भौतिक और रासायनिक संसार को "जड़ प्रकृति" नाम है। रसायन-संसार में सम्पूर्ण अन्न-वनस्पति, झाड़, जंगल प्रकट हो चुकी है। इसके मूल में रसायन द्रव्यों में उत्सव, प्राण-सूत्र, प्राण-सूत्रों में रचना-विधि, हर रचना "बीज-वृक्ष न्याय विधि" से आवर्तनशील व्यवस्था में होना - इसी क्रम में अनेकानेक रचनाएँ प्रकट हो चुकी हैं।

इसके बाद जीव-संसार अंडज और पिंडज विधि से जलचर, भूचर, और खेचर रूप में विद्यमान है। इसके पश्चात मानव का प्रकटन इस धरती पर होना, और परम्परा रूप में पीढी से पीढी के रूप में विद्यमान है।
ये पूरी बात समझ में आना "समझदारी" है। ऐसे समझदारी से हर वस्तु का त्व सहित व्यवस्था में होना, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना स्पष्ट स्वीकार होता है। फलस्वरूप मानव अपने मानवत्व सहित व्यवस्था होना, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने की प्रवृत्ति से संपन्न होना पाया जाता है। यही "समाधान" का स्त्रोत है।

समाधान-समृद्धि पूर्वक परिवार में जीना, और 'परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था' में भागीदारी करना समझदारी से परिपूर्ण परम्परा है। यही "अखंड समाज" और "सार्वभौम व्यवस्था" का स्वरूप है।

समझदार व्यक्तियों के परिवार में आवश्यकताएं "निश्चित" होती हैं - जो शरीर-पोषण, संरक्षण, और समाज-गति के अर्थ में स्पष्ट होती हैं। निश्चित आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन करना सहज है। फलन में समृद्धि सहज है। इस प्रकार हर परिवार-जन का समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना सहज है। पुनर्विचार करने का यही उद्देश्य है।
स्मृतियाँ घटना और भाषा के रूप में रहता है। कल्पनाएँ अपेक्षा के रूप में होती हैं। अपेक्षाएं निश्चित होने के क्रम में समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व पूर्वक जीना बनता है। यह कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का सार्थक स्वरूप और प्रयोजन है।

"सदा सर्व-शुभ हो!"

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित, अप्रैल २००६ - अमरकंटक