मानव का पुण्य रहा तभी यह अनुसंधान सफल हो पाया। इस बात को लेकर मैं बहुत भरोसा करता हूँ, कि आदमी इस प्रस्ताव को स्वीकारेगा। मुझे इस प्रस्ताव में सर्व-शुभ का रास्ता साफ़-साफ़ दिखाई पड़ा। तभी मैं इस प्रस्ताव के लोकव्यापीकरण में लग गया। कब तक? - आखिरी साँस तक! जब तक मेरी साँस चलेगा, मैं इस पर ही काम करूंगा।
इस प्रस्ताव में इतनी बड़ी सम्भावना दिखाई पड़ती है - आदमी-जात अपराध-मुक्त हो सकता है, अपना-पराया दीवार से मुक्त हो सकता है। यह दोनों हो गया तो धरती के साथ होने वाला अत्याचार समाप्त होगा। अत्याचार यदि रुका - तो धरती अपनी बची ताकत से कितना सुधार सकता है, वह सुधार लेगा।
लोकव्यापीकरण के क्रम में अनेक लोगों से मिलना हुआ। अनेक लोगों ने अपने-अपने तर्क को प्रस्तुत किया।
"तुम बहुत आशा-वादी हो!" - यह बताया गया।
निराशावादिता से आपने क्या सिद्ध कर लिया, यह बताइये। मैंने उनसे पूछा।
"तर्क समाप्त हो गया तो हम monotonous हो जायेंगे।"
तर्क के लिए तर्क करने से monotony होती है, या तर्क को प्रयोजन से जोड़ने से monotony होती है? यह प्रस्ताव तर्क को प्रयोजन से जोड़ने के लिए है। प्रयोजन सम्मत तर्क समाधान को प्रमाणित करता है। समाधान आने से monotony दूर होगा, या व्यर्थ के तर्क को बनाए रखने से monotony दूर होगा? केवल चर्चा करते रहने से monotony दूर होगा, या उपलब्धियों से monotony दूर होगा?
"एक व्यक्ति की बात को कैसे माना जाए?"
व्यक्ति के अलावा आपको पढने/सुनने को क्या मिलेगा? जो कुछ भी आज तक कहा गया है, लिखा गया है, आगे भी जो कहा जायेगा, लिखा जायेगा - वह किसी न किसी व्यक्ति द्वारा ही होगा।
"बहुत सारे लोग तो इससे भिन्न बात को मानते हैं?"
बहुत सारे लोग मिल कर ही तो इस धरती को बरबाद किया। यदि कुछ लोग उस "भिन्न बात" को मना भी करते - तो इतना बरबाद नहीं होता। सब लोग उस "भिन्न बात" को मान लिए - तभी तो धरती बरबाद हुई। सब लोग बर्बादी के रास्ते पर हो गए - वह रास्ता ज्यादा ठीक है? या एक व्यक्ति सही की ओर रास्ता दिखा रहा है - वह ज्यादा ठीक है?
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
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Monday, April 27, 2009
मानव भाषा का स्वरूप
भाषा का प्रयोजन है - एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अपनी बात पहुंचाना। भाषा के तीन स्वरूप हम देखते हैं - (१) शरीर-विन्यास से भाषा, (२) लिपि से भाषा, (३) बोलने वाली भाषा। शरीर के विन्यास वाली भाषा (gesture language) को आदमी बहुत समय तक ले कर चला है। मूक-बधिरों के साथ आज भी इस भाषा का प्रयोग होता है। उसके बाद शब्द को भाषा स्वरूप दिया तो लिखने का एक आकार बनी। अक्षरों के संयोजन से शब्द बना। शब्दों के संयोजन से वाक्य बना। वाक्यों के संयोजन से ग्रन्थ बने। परम्परा में हर प्रकार की भाषाओँ के लिखने के अपने-अपने आकार हैं। उच्चारण करने का एक तरीका है। हर भाषा को समझने की अपनी विधि है - व्याकरण के रूप में। इन तीनो को मिला कर अनेक भाषाओँ का प्रयोग संसार में चल रहा है। उसमें से बहुत सारे भाषाएँ लिखित हैं, कुछ अलिखित भाषाएँ भी हैं। मैंने जहाँ शरीर-यात्रा शुरू किया - वहाँ "संकेत-भाषा" अलिखित रूप में है। जैसे आम लोग लिखित-भाषा से काम करते हैं, वैसे वे अलिखित भाषा से काम कर लेते हैं।
प्रश्न: मानव-भाषा का मूल आशय क्या है? क्या समझने के लिए भाषा है?
इसका उत्तर है - कारण, गुण, गणित को समझना। हर क्रिया के साथ कारण है, हर क्रिया के साथ गुण है, हर क्रिया का गणित के साथ कुछ दूर तक सम्बन्ध है। गणित से ज्यादा गहराई में गुण काम करता है। फ़िर सम्पूर्ण क्रिया के साथ कारण सम्बद्ध रहता है। इस आधार पर कारण, गुण, गणित के संयुक्त रूप में मानव-भाषा है। इसे हर भाषा में समानान्तर रूप में पहचाना जा सकता है।
जब आप कोई भाषा को प्रस्तुत करते हैं - तो किस आशय से किया, उसका अनुमान मुझ में होता है। वह अनुमान उस भाषा के अर्थ को छुआ रहता है। वह अर्थ - अस्तित्व में किसी स्थिति, गति, फल, परिणाम को इंगित करता है। यह हमारी कल्पना में आता है। कल्पना के अनुसार जब आगे चलते हैं तो उस वस्तु या घटना तक पहुँचते हैं। घटना घटित जो हुआ - वह वस्तु ही है। घटना जो होने वाला है - वह अनुमान है। घटना जो आचरण में रहता है, या वर्तमान रहता है - उसको हम समझ पाते हैं। इस तरह हम कारण-गुण-गणित विधि से हर वर्तमान-भूत-भविष्य की घटनाओं को स्वीकार कर पाते हैं। उसके अनुसार श्रेष्ठता के लिए प्रयत्न करते हैं।
प्रश्न: मैं जब कुछ भाषा बोलता हूँ, तो उस प्रक्रिया में क्या-क्या होता है?
उत्तर: कुछ आप बोलते हैं, उसके मूल में आप के जीवन में इच्छा है - अपनी स्मृति को प्रकट करने के लिए। आप कुछ भी बोलते हैं, उसका स्मृति आप के पास रहता ही है। तीन तरह की स्मृतियाँ रहती हैं - घटी हुई घटना के रूप में, प्राप्ति के रूप में, और अपेक्षा के रूप में। जैसे - आपने "मामा" बोला। तो उसके मूल में मामा का स्मृति आपके जीवन में रहता ही है। यह चित्त से वृत्ति, वृत्ति से मन, मन से मेधस, मेधस से स्नायु-तंत्र, स्नायु-तंत्र से गल-तंत्र तक आ गया। गल-तंत्र में स्वर-ग्रंथि में उससे हलचल हुई। आपके उच्चारण का स्पष्टीकरण स्वर-ग्रंथि में हुआ। स्वर-ग्रंथि से गल-ग्रंथि तक, उससे जीभ, होठ, गाल, और तालू के योगफल में शब्द बनकर दूसरों तक पहुँचा। यह हर भाषा के साथ है। फ़िर सामने वाला इस बात को स्वीकारता है कि आप किस बात के लिए शब्द का प्रयोग किए।
शब्द दो प्रकार से समझ में आते हैं - भाषा के रूप में, और ध्वनी के रूप में। ध्वनी के एक तरीके को ही हम भाषा कहते हैं। भाषा में अर्थ होता है। ध्वनी में शब्द भर होता है। सुनने में अच्छा लगे ऐसी ध्वनी को संगीत से जोड़ा गया। भाषा में शब्द दो प्रकार के हैं - अर्थात्मक, और निरर्थक। अर्थ-संगत शब्द दर्शन, विचार, और शास्त्र के लिए उपयोगी हुए। एक-दूसरे के साथ भाषा इस तरह ज्ञान को स्पष्ट करने के अर्थ में प्रयुक्त हुई।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
प्रश्न: मानव-भाषा का मूल आशय क्या है? क्या समझने के लिए भाषा है?
इसका उत्तर है - कारण, गुण, गणित को समझना। हर क्रिया के साथ कारण है, हर क्रिया के साथ गुण है, हर क्रिया का गणित के साथ कुछ दूर तक सम्बन्ध है। गणित से ज्यादा गहराई में गुण काम करता है। फ़िर सम्पूर्ण क्रिया के साथ कारण सम्बद्ध रहता है। इस आधार पर कारण, गुण, गणित के संयुक्त रूप में मानव-भाषा है। इसे हर भाषा में समानान्तर रूप में पहचाना जा सकता है।
जब आप कोई भाषा को प्रस्तुत करते हैं - तो किस आशय से किया, उसका अनुमान मुझ में होता है। वह अनुमान उस भाषा के अर्थ को छुआ रहता है। वह अर्थ - अस्तित्व में किसी स्थिति, गति, फल, परिणाम को इंगित करता है। यह हमारी कल्पना में आता है। कल्पना के अनुसार जब आगे चलते हैं तो उस वस्तु या घटना तक पहुँचते हैं। घटना घटित जो हुआ - वह वस्तु ही है। घटना जो होने वाला है - वह अनुमान है। घटना जो आचरण में रहता है, या वर्तमान रहता है - उसको हम समझ पाते हैं। इस तरह हम कारण-गुण-गणित विधि से हर वर्तमान-भूत-भविष्य की घटनाओं को स्वीकार कर पाते हैं। उसके अनुसार श्रेष्ठता के लिए प्रयत्न करते हैं।
प्रश्न: मैं जब कुछ भाषा बोलता हूँ, तो उस प्रक्रिया में क्या-क्या होता है?
उत्तर: कुछ आप बोलते हैं, उसके मूल में आप के जीवन में इच्छा है - अपनी स्मृति को प्रकट करने के लिए। आप कुछ भी बोलते हैं, उसका स्मृति आप के पास रहता ही है। तीन तरह की स्मृतियाँ रहती हैं - घटी हुई घटना के रूप में, प्राप्ति के रूप में, और अपेक्षा के रूप में। जैसे - आपने "मामा" बोला। तो उसके मूल में मामा का स्मृति आपके जीवन में रहता ही है। यह चित्त से वृत्ति, वृत्ति से मन, मन से मेधस, मेधस से स्नायु-तंत्र, स्नायु-तंत्र से गल-तंत्र तक आ गया। गल-तंत्र में स्वर-ग्रंथि में उससे हलचल हुई। आपके उच्चारण का स्पष्टीकरण स्वर-ग्रंथि में हुआ। स्वर-ग्रंथि से गल-ग्रंथि तक, उससे जीभ, होठ, गाल, और तालू के योगफल में शब्द बनकर दूसरों तक पहुँचा। यह हर भाषा के साथ है। फ़िर सामने वाला इस बात को स्वीकारता है कि आप किस बात के लिए शब्द का प्रयोग किए।
शब्द दो प्रकार से समझ में आते हैं - भाषा के रूप में, और ध्वनी के रूप में। ध्वनी के एक तरीके को ही हम भाषा कहते हैं। भाषा में अर्थ होता है। ध्वनी में शब्द भर होता है। सुनने में अच्छा लगे ऐसी ध्वनी को संगीत से जोड़ा गया। भाषा में शब्द दो प्रकार के हैं - अर्थात्मक, और निरर्थक। अर्थ-संगत शब्द दर्शन, विचार, और शास्त्र के लिए उपयोगी हुए। एक-दूसरे के साथ भाषा इस तरह ज्ञान को स्पष्ट करने के अर्थ में प्रयुक्त हुई।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
जीवन, मेधस, और स्मृति
जीवन एक परमाणु है। उसमें ६१ क्रियाकलाप हैं - जो परावर्तन और प्रत्यावर्तन विधि से १२२ क्रियाएं हैं। जीवन का गति मनोवेग के बराबर है। मनोगति अक्षय गति है - जो गणित से परे है। मनोगति से चलता जीवन प्राण-कोशिकाओं के मध्य से चलता रहता है। उसकी गति से बनने वाला जो वातावरण है, वह एक तरंग को पैदा करता है। मन मेधस पर कैसा संकेत देना है, वैसा तरंग पैदा होता है। मेधस में स्नायु-तंत्र का गुच्छा रसायन-जल में तैरता रहता है। रसायन-जल में जीवन तरंग प्रसारित करता है। उन तरंगो को स्नायुएं पढ़ लेते हैं। मेधस तंत्र में जो सूक्ष्म तंतुएं या स्नायुएं बनी हैं, उनमें यह अभ्यास है। स्नायुएं पुनः जो रसायन-जल में तरंग पैदा करते हैं, उनको जीवन पढ़ लेता है। स्नायु-तंत्र के आधार पर मांस-पेशियाँ काम करते हैं। मांस-पेशियों और स्नायु-तंत्र के अनुसार हड्डियाँ काम करती हैं।
हर कार्य को समझने/सीखने का तंत्र जीवन ही है, तथा उस सीख/समझ को शरीर द्वारा गतिशील बनाने का स्त्रोत भी जीवन ही है।
स्मरण-शक्ति जीवन में होता है, मेधस में नहीं होता। अभी के प्रचलित-विज्ञान की जबरदस्ती है कि स्मरण मेधस में रखा है। मेधस में जीवन के संकेतो को ग्रहण करना, और जीवन के लिए संकेतों को प्रसारित करना - यही काम चलता रहता है। स्मरण जीवन का काम है। जीवन में ही कल्पनाशीलता है। कल्पनाशीलता से जीवन बहुत सारी चीजों को कल्पित करता है, बहुत सारी चीजों को शरीर द्वारा क्रियान्वयन करता है। जो क्रियान्वयन करता है, उसका आंकलन करता है - वही स्मरण है। कई बातों को सकारा रहता है, कई बातों को नकारा रहता है - यही स्मरण है। चित्त में चित्रण के रूप में सारी स्मृतियाँ बनी हैं। विचार याद आना - यह भी स्मृति का काम है। विश्लेषण वृत्ति की क्रिया है - उसका स्मृति चित्त में है। चयन मन की क्रिया है - उसकी स्मृति चित्त ही बनाए रखता है। मन जो आस्वादन करता है, उसका स्मृति चित्त में ही बना रहता है। तुलन जो वृत्ति करता है, उसकी स्मृति चित्त ही बना कर रखता है। उसके बाद आत्मा जब अनुभव करता है - उसकी स्मृति भी चित्त में बनी रहती है। अनुभव का भी स्मरण चित्त में रहता है। आत्मा और बुद्धि क्रिया के रूप में कार्यरत रहते हैं। स्मरण भी एक क्रिया ही है।
स्मृतियाँ मानव-परम्परा में अति-आवश्यकीय भाग है। समझदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए। ईमानदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए। जिम्मेदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए। भागीदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए।
प्रश्न: इससे पहले कौनसी शरीर-यात्राएं रही, इसकी कोई स्मृति क्यों नहीं रहती?
उत्तर: इस शरीर-यात्रा से पहले कौनसी शरीर-यात्राएं की थी - इसका कोई मतलब भी नहीं है। उससे कोई प्रयोजन भी नहीं है। शरीर-यात्रा करना जीवन क्रिया है। हर जीव-शरीर और मनुष्य-शरीर में जो जीवन अब काम कर रहा है, वह पहले बहुत सारे शरीर-यात्रा कर चुका है। किस शरीर को चलाया? - इसका कोई मतलब नहीं है। शरीर को चलाने वाले जीवन का ज्ञान हो गया। जीवन शरीर को चलाता है, यह पता चल गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
हर कार्य को समझने/सीखने का तंत्र जीवन ही है, तथा उस सीख/समझ को शरीर द्वारा गतिशील बनाने का स्त्रोत भी जीवन ही है।
स्मरण-शक्ति जीवन में होता है, मेधस में नहीं होता। अभी के प्रचलित-विज्ञान की जबरदस्ती है कि स्मरण मेधस में रखा है। मेधस में जीवन के संकेतो को ग्रहण करना, और जीवन के लिए संकेतों को प्रसारित करना - यही काम चलता रहता है। स्मरण जीवन का काम है। जीवन में ही कल्पनाशीलता है। कल्पनाशीलता से जीवन बहुत सारी चीजों को कल्पित करता है, बहुत सारी चीजों को शरीर द्वारा क्रियान्वयन करता है। जो क्रियान्वयन करता है, उसका आंकलन करता है - वही स्मरण है। कई बातों को सकारा रहता है, कई बातों को नकारा रहता है - यही स्मरण है। चित्त में चित्रण के रूप में सारी स्मृतियाँ बनी हैं। विचार याद आना - यह भी स्मृति का काम है। विश्लेषण वृत्ति की क्रिया है - उसका स्मृति चित्त में है। चयन मन की क्रिया है - उसकी स्मृति चित्त ही बनाए रखता है। मन जो आस्वादन करता है, उसका स्मृति चित्त में ही बना रहता है। तुलन जो वृत्ति करता है, उसकी स्मृति चित्त ही बना कर रखता है। उसके बाद आत्मा जब अनुभव करता है - उसकी स्मृति भी चित्त में बनी रहती है। अनुभव का भी स्मरण चित्त में रहता है। आत्मा और बुद्धि क्रिया के रूप में कार्यरत रहते हैं। स्मरण भी एक क्रिया ही है।
स्मृतियाँ मानव-परम्परा में अति-आवश्यकीय भाग है। समझदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए। ईमानदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए। जिम्मेदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए। भागीदारी को व्यक्त करने के लिए स्मृति चाहिए।
प्रश्न: इससे पहले कौनसी शरीर-यात्राएं रही, इसकी कोई स्मृति क्यों नहीं रहती?
उत्तर: इस शरीर-यात्रा से पहले कौनसी शरीर-यात्राएं की थी - इसका कोई मतलब भी नहीं है। उससे कोई प्रयोजन भी नहीं है। शरीर-यात्रा करना जीवन क्रिया है। हर जीव-शरीर और मनुष्य-शरीर में जो जीवन अब काम कर रहा है, वह पहले बहुत सारे शरीर-यात्रा कर चुका है। किस शरीर को चलाया? - इसका कोई मतलब नहीं है। शरीर को चलाने वाले जीवन का ज्ञान हो गया। जीवन शरीर को चलाता है, यह पता चल गया।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
अनुभव
अनुभव व्यापक में सम्पृक्तता का होता है। अकेले व्यापक नहीं है। अनुभव करने वाला नहीं हो तो व्यापक कहाँ/किसको समझ में आता है? अनुभव करने वाले के साथ में ही अनुभव होता है। अनुभव करने वाला व्यापक में ही है। अनुभव करने वाला अपने से अधिक का अनुभव करता है, समानता और कम को पहचानता है। समान और समान से कम के साथ व्यवहार और कार्य होता है। समान से अधिक के साथ अनुभव ही होता है।
अनुभव स्थिति में होता है। अनुभव का प्रमाण व्यवहार में संबंधों में प्रमाणित होता है।
हम अनुभव को प्रस्तुत नहीं करते हैं। अनुभव हुआ, इसका प्रमाण जीने में प्रस्तुत करते हैं।
अनुभव शाश्वतीयता के अर्थ में है। अनुक्रम से होने के अर्थ में है। एक से एक जुड़ कर होने के रूप में है। इसका नाम है - सह-अस्तित्व। सह-अस्तित्व में जड़-प्रकृति होना अनुक्रम है। अनुक्रम होने से अनुप्राणित रहना हुआ। सम्पृक्तता वश अनुप्राणित रहना होता है। अनुप्राणित रहने से चार स्वरूप में व्यक्त हो गया - विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक )
अनुभव स्थिति में होता है। अनुभव का प्रमाण व्यवहार में संबंधों में प्रमाणित होता है।
हम अनुभव को प्रस्तुत नहीं करते हैं। अनुभव हुआ, इसका प्रमाण जीने में प्रस्तुत करते हैं।
अनुभव शाश्वतीयता के अर्थ में है। अनुक्रम से होने के अर्थ में है। एक से एक जुड़ कर होने के रूप में है। इसका नाम है - सह-अस्तित्व। सह-अस्तित्व में जड़-प्रकृति होना अनुक्रम है। अनुक्रम होने से अनुप्राणित रहना हुआ। सम्पृक्तता वश अनुप्राणित रहना होता है। अनुप्राणित रहने से चार स्वरूप में व्यक्त हो गया - विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक )
Saturday, April 25, 2009
अध्ययन में एकाग्रता
अध्ययन में एकाग्रता की आवश्यकता है। एकाग्रता के लिए अध्ययन का लक्ष्य निश्चित करना आवश्यक है। बिना अध्ययन का लक्ष्य निश्चित हुए, एकाग्रता नहीं आ सकती, अध्ययन में मन नहीं लग सकता।
मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का लक्ष्य है - स्वयं में विश्वास संपन्न होना, और सर्व-शुभ सूत्र-व्याख्या स्वरूप में जीना। इस लक्ष्य के साथ अध्ययन करते हैं, तो मन लगता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००९)
मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का लक्ष्य है - स्वयं में विश्वास संपन्न होना, और सर्व-शुभ सूत्र-व्याख्या स्वरूप में जीना। इस लक्ष्य के साथ अध्ययन करते हैं, तो मन लगता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००९)
संबंधों की पहचान
संबंधों की पहचान होने पर ही संबंधों में न्याय पूर्वक जीने की स्थिति बनती है। संबंधों में ही जीना होता है। संबंधों को छोड़ कर जीने की कोई स्थली ही नहीं है।
न्याय के लिए "संबंधों की पहचान" आवश्यक है। संबंधों की "पहचान" कहा है, संबंधों का "निर्माण" नहीं कहा है। हम संबंधों में हैं ही - हमें उन संबंधों को पहचानने की आवश्यकता है।
संबंधों की पहचान होने पर मूल्यों का निर्वाह होता ही है। संबंधों के संबोधन या नाम तो हम पा गए हैं - लेकिन उनके प्रयोजनों को नहीं पहचाने हैं। प्रयोजनों की पहचान के लिए ही अध्ययन है।
हम जहाँ हैं - अपनी उपयोगिता, सदुपयोगिता, और प्रयोजनशीलता को पहचान ही सकते हैं। कम से कम अपने परिवार में अपनी उपयोगिता को पहचानने का अधिकार हरेक के पास रखा है। समाज और व्यवस्था परिवार के ही आगे की कडियाँ हैं।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)
न्याय के लिए "संबंधों की पहचान" आवश्यक है। संबंधों की "पहचान" कहा है, संबंधों का "निर्माण" नहीं कहा है। हम संबंधों में हैं ही - हमें उन संबंधों को पहचानने की आवश्यकता है।
संबंधों की पहचान होने पर मूल्यों का निर्वाह होता ही है। संबंधों के संबोधन या नाम तो हम पा गए हैं - लेकिन उनके प्रयोजनों को नहीं पहचाने हैं। प्रयोजनों की पहचान के लिए ही अध्ययन है।
हम जहाँ हैं - अपनी उपयोगिता, सदुपयोगिता, और प्रयोजनशीलता को पहचान ही सकते हैं। कम से कम अपने परिवार में अपनी उपयोगिता को पहचानने का अधिकार हरेक के पास रखा है। समाज और व्यवस्था परिवार के ही आगे की कडियाँ हैं।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८, अमरकंटक)
Thursday, April 23, 2009
सहअस्तित्व में अनुभव ही परम-प्रमाण है.
आदर्शवाद ने शब्द को प्रमाण माना। उसके बाद आप्त-वाक्य को प्रमाण माना। उसी के अन्तरंग प्रत्यक्ष, अनुमान, और आगम को प्रमाण माना। अंततोगत्वा शास्त्र को प्रमाण माना। इस तरह आदर्शवाद बनाम ईश्वरवाद ने जीवित-मनुष्य को प्रमाण नहीं माना।
भौतिकवाद या प्रचलित-विज्ञान ने यंत्र को प्रमाण माना। जीवित-मनुष्य को प्रमाण नहीं माना।
मनुष्य कोई सच्चाई का प्रमाण हो सकता है, यह आदर्शवाद और भौतिकवाद दोनों ने नहीं पहचाना। दोनों व्यक्तिवादिता की ओर ही ले जाते हैं। व्यक्तिवादिता के रहते दूसरे मनुष्य को प्रमाण मानना बनता ही नहीं है।
सहअस्तित्व ही परम-सत्य है। सहअस्तित्व में अनुभव ही सत्य का परम-प्रमाण है। परम का मतलब - जिससे ज्यादा नहीं हो सकता, न उससे कम में काम चलेगा। सह-अस्तित्व में अनुभव मनुष्य ही कर सकता है। अनंत मनुष्यों के अनुभव करने का स्त्रोत सह-अस्तित्व ही है। सह-अस्तित्व के अलावा अनुभव करने की कोई वस्तु नहीं है। जागृत मनुष्य ही सत्य का प्रमाण अपने जीने में प्रस्तुत करता है। यह दूसरे व्यक्तियों के अध्ययन के लिए प्रेरणा-स्त्रोत बनता है।
मनुष्य को प्रमाण मानने के फलस्वरूप ही अध्ययन सम्भव है। अध्ययन कराने वाला प्रमाणित है, और मैं अध्ययन पूर्वक प्रमाणित हो सकता हूँ - जब तक यह स्वयं में स्थिर नहीं होता, तब तक यह अनुसंधान ही है - जो अंधेरे में हाथ मारने वाली बात है। मनुष्य को प्रमाण का आधार मानने पर अंधेरे में हाथ मारने वाली बात नहीं रहती।
अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व स्वरूपी है। यह स्थिति-सत्य, वस्तुस्थिति सत्य, और वस्तुगत सत्य के संयुक्त स्वरूप में है। ये तीनो मिल कर सहअस्तित्व है। स्थिति-सत्य से व्यापक वस्तु इंगित है। वस्तुस्थिति सत्य से दिशा, देश, और काल इंगित है। दो ध्रुवों के साथ दिशा की पहचान होती है। तीन ध्रुवों से देश की पहचान होती है। क्रिया की अवधि ही काल है। वस्तुगत सत्य से रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म इंगित है।
विज्ञान का आधार सहअस्तित्व स्वरूपी सत्य होना चाहिए, या अभी जो सोचा जा रहा है - वह होना चाहिए? आप ही सोच लो!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८)
भौतिकवाद या प्रचलित-विज्ञान ने यंत्र को प्रमाण माना। जीवित-मनुष्य को प्रमाण नहीं माना।
मनुष्य कोई सच्चाई का प्रमाण हो सकता है, यह आदर्शवाद और भौतिकवाद दोनों ने नहीं पहचाना। दोनों व्यक्तिवादिता की ओर ही ले जाते हैं। व्यक्तिवादिता के रहते दूसरे मनुष्य को प्रमाण मानना बनता ही नहीं है।
सहअस्तित्व ही परम-सत्य है। सहअस्तित्व में अनुभव ही सत्य का परम-प्रमाण है। परम का मतलब - जिससे ज्यादा नहीं हो सकता, न उससे कम में काम चलेगा। सह-अस्तित्व में अनुभव मनुष्य ही कर सकता है। अनंत मनुष्यों के अनुभव करने का स्त्रोत सह-अस्तित्व ही है। सह-अस्तित्व के अलावा अनुभव करने की कोई वस्तु नहीं है। जागृत मनुष्य ही सत्य का प्रमाण अपने जीने में प्रस्तुत करता है। यह दूसरे व्यक्तियों के अध्ययन के लिए प्रेरणा-स्त्रोत बनता है।
मनुष्य को प्रमाण मानने के फलस्वरूप ही अध्ययन सम्भव है। अध्ययन कराने वाला प्रमाणित है, और मैं अध्ययन पूर्वक प्रमाणित हो सकता हूँ - जब तक यह स्वयं में स्थिर नहीं होता, तब तक यह अनुसंधान ही है - जो अंधेरे में हाथ मारने वाली बात है। मनुष्य को प्रमाण का आधार मानने पर अंधेरे में हाथ मारने वाली बात नहीं रहती।
अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व स्वरूपी है। यह स्थिति-सत्य, वस्तुस्थिति सत्य, और वस्तुगत सत्य के संयुक्त स्वरूप में है। ये तीनो मिल कर सहअस्तित्व है। स्थिति-सत्य से व्यापक वस्तु इंगित है। वस्तुस्थिति सत्य से दिशा, देश, और काल इंगित है। दो ध्रुवों के साथ दिशा की पहचान होती है। तीन ध्रुवों से देश की पहचान होती है। क्रिया की अवधि ही काल है। वस्तुगत सत्य से रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म इंगित है।
विज्ञान का आधार सहअस्तित्व स्वरूपी सत्य होना चाहिए, या अभी जो सोचा जा रहा है - वह होना चाहिए? आप ही सोच लो!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००८)
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