व्यापक में प्रकृति प्रेरणा पाने योग्य स्थिति में है। प्रकृति व्यापक में स्वयं स्फूर्त विधि से प्रेरणा पाता ही रहता है। व्यापक ऊर्जा स्वरूप में है। प्रकृति व्यापक में संपृक्त होने के कारण ऊर्जा-संपन्न रहती ही है। इस सम्पृक्त्ता के कारण ही प्रकृति में क्रियाशीलता है। यह क्रियाशीलता पूर्वक ही सह-अस्तित्व सहज नियति-क्रम का प्रकटन है। नियति-क्रम है - विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, जागृति।
सह-अस्तित्व को न पहचानने से, जीवन को न पहचानने से, मानवीयता पूर्ण आचरण को न पहचानने से - इसके विपरीत कुछ मान्यताएं रहती हैं। इन मान्यताओं में परस्पर कोई तालमेल न बैठने से मनुष्य-जाति को कोई निश्चित समझदारी हाथ लगा नहीं - जिससे न्याय प्रदायी क्षमता स्थापित की जा सके, सही कार्य-व्यवहार किया जा सके, सत्य-बोध कराया जा सके। विगत की मान्यताओं से इनको लेकर मानव जाति - ज्ञानी, अज्ञानी, और विज्ञानी - सर्वथा असफल रहे। यह फ़ैसला हम अपने में नहीं कर पाते हैं, तो इस प्रस्ताव के अध्ययन में हम आगे बढ़ नहीं सकते। विगत की किसी मान्यता के साथ इस प्रस्ताव का गुड-गोबर ही करेंगे। गुड-गोबर करेंगे तो न गुड हाथ लगना है, न गोबर!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
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Sunday, November 30, 2008
Saturday, November 29, 2008
चेतना विकास
चेतना-परिवर्तन की परिकल्पना ईश्वर-वादियों ने दिया। भौतिक-वादी ऐसी परिकल्पना भी दे नहीं पाये। भौतिक-वादियों के पास चेतना-परिवर्तन की प्रेरणा देने के लिए कोई अर्हता नहीं है। भौतिक वाद के पास ऐसा कोई माद्दा ही नहीं है, वह बीज ही नहीं है।
चेतना-विकास से मध्यस्थ-दर्शन का क्या आशय है?
चेतना विकास से आशय है - जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होना। जीव-चेतना का अर्थ है :- प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से विचार करते हुए चार विषयों (आहार, निद्रा, भय, और मैथुन) और पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के लिए जीना। मानव-चेतना का अर्थ है - ज्ञान (सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान) और उससे अनुबंधित विवेक और विज्ञान के अनुसार जीना। ज्ञान-विवेक-विज्ञान कुल मिला कर मानव-चेतना का विस्तार है। मध्यस्थ-दर्शन मानव-चेतना में संक्रमित होने के लिए अध्ययन विधि (शिक्षा) को प्रस्तावित करता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
चेतना-विकास से मध्यस्थ-दर्शन का क्या आशय है?
चेतना विकास से आशय है - जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होना। जीव-चेतना का अर्थ है :- प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों से विचार करते हुए चार विषयों (आहार, निद्रा, भय, और मैथुन) और पाँच संवेदनाओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के लिए जीना। मानव-चेतना का अर्थ है - ज्ञान (सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान) और उससे अनुबंधित विवेक और विज्ञान के अनुसार जीना। ज्ञान-विवेक-विज्ञान कुल मिला कर मानव-चेतना का विस्तार है। मध्यस्थ-दर्शन मानव-चेतना में संक्रमित होने के लिए अध्ययन विधि (शिक्षा) को प्रस्तावित करता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
सह-अस्तित्व में प्रकटनशीलता स्वाभाविक है.

सह-अस्तित्व चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट होने के लिए तीन प्रकार की क्रियायें हैं - भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, और जीवन क्रिया। प्राकृतिक रूप में प्रकटन के बाद परम्परा है। मतलब - कोई अवस्था जब प्रकट होती है, तब उसके बने रहने का स्वरूप परम्परा के रूप में स्थापित प्राकृतिक रूप में हो जाता है। इनमें "घटना-बढ़ना" भ्रमित मनुष्य की प्रवृत्ति और कार्य-व्यवहार से होता है।
पदार्थ-अवस्था ही प्राण-अवस्था को यौगिक विधि से प्रकट करता है। यह स्वयं-स्फूर्त विधि से होता है। इसको कोई बाहरी ताकत नहीं करता। विगत (आदर्श-वाद) में बताया था - "यह परमात्मा की करनी है।" मध्यस्थ-दर्शन ने परमात्मा को व्यापक स्वरूप में पहचाना। परमात्मा (व्यापक) का प्रकटन में "करने वाले" के रूप में कोई रोल नहीं है। परमात्मा (व्यापक) जड़-चैतन्य प्रकृति में प्रेरणा के स्वरूप में है ही! जड़ प्रकृति परमात्मा (व्यापक) में भीगे होने से प्रेरित है, जिससे क्रियाशील है। यह प्रेरणा नित्य है। यह प्रेरणा घटता बढ़ता नहीं है। वस्तु की क्रिया से व्यापक में कोई क्षति होता ही नहीं है। व्यापक में प्रेरणा अभी मिला, बाद में नहीं मिला, अभी ज्यादा मिला, बाद में कम मिला - ऐसा कुछ नहीं होता।
परमाणु अंश भी इस तरह ऊर्जा-संपन्न है, और घूर्णन गति के रूप में क्रियाशील है। सभी परमाणु-अंश एक जैसे हैं। परमाणु की प्रजातियों में भेद उनके गठन में समाहित होने वाले परमाणु-अंशों के अनुसार है। सभी तरह के परमाणु-प्रजातियों के प्रकट होने के बाद भौतिक-संसार तृप्त हो जाता है। उसके बाद ही वह यौगिक-क्रिया में प्रवृत्त होता है। भौतिक-क्रिया में तृप्ति के बाद ही यौगिक क्रिया में प्रवृत्ति बन जाती है। फ़िर स्वयं स्फूर्त विधि से यौगिक प्रकटन होता है। यौगिक प्रकटन के लिए समस्त प्रकार के भौतिक-परमाणु सहायक (पूरक) हो जाते हैं। यौगिक प्रकटन के लिए "भूखे" परमाणु भी सहायक हैं, "अजीर्ण" परमाणु भी सहायक हैं। यौगिक विधि से सर्वप्रथम जल ही प्रकट हुआ।
सह-अस्तित्व में प्रकटनशीलता स्वाभाविक है। इसी प्रकटनशीलता के आधार पर प्राण-अवस्था स्थापित हो गयी। प्राण-कोष में निहित प्राण-सूत्रों में उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास से नयी रचना विधि का प्रकटन होता है। इसी क्रम में प्राण-अवस्था के सभी झाड़, वनस्पति, औषधि प्रकट होने के बाद प्राणावस्था तृप्त हो गयी। प्राण-अवस्था तृप्त होने के बाद जीव-अवस्था की रचनाएँ शुरू हुई। जीव-अवस्था भुनगी-कीडे (स्वेदज संसार) से शुरू हो कर अंडज और पिंडज दो प्रकार की प्रजातियाँ स्थापित हुई। उनमें से जलचर, भूचर, और नभ-चर तीनो प्रकार के जीव हुए। शाकाहारी जीवों में प्रजनन क्रिया द्वारा multiplication ज्यादा होता है। मांसाहारी जीवों में अपेक्षाकृत कम multiplication होता है। शाकाहारी संसार की संख्या में संतुलन करने के लिए मांसाहारी संसार का प्रकटन हुआ - यह मुझको समझ में आया। जीवावस्था के सभी वंश-परम्पराएं स्थापित होने के बाद मानव-शरीर रचना का प्रकटन हुआ।
मानव-शरीर रचना सर्व-प्रथम किसी जीव से ही प्रारंभ हुआ, उसके बाद मानव-परम्परा शुरू हुई। जल, सघन-वन, सभी प्रकार के जीव-जानवर प्रक ट होने के बाद ही मनुष्य का प्रकटन हुआ। इन्ही के बीच मनुष्य पला। मनुष्य-शरीर के प्रकटन के साथ ही जीवन अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकट करने की जगह में आ गया। सह-अस्तित्व सहज प्रकटन विधि से इतने सब श्रम के बाद मनुष्य का प्रकटन इस धरती पर हुआ।
मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के चलते पहले वनों का संहार करना शुरू किया। विज्ञान युग आने के बाद खनिज-संसार का संहार करना शुरू कर दिया। जबकि - वन और खनिज के संतुलन से ही ऋतु-संतुलन होता है। बिना ऋतु-संतुलन के मनुष्य-जाती का धरती पर बने रहना सम्भव नहीं है। इस बात को आज के संसार के सामने highlite करने की ज़रूरत है। यह जो मैं समझा रहा हूँ - यह waste नहीं जाना चाहिए।
मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग से अपनी परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने का काम बहुत अच्छे से कर लिया। मनः-स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा रहा। मनुष्य के प्रकट होने से पहले जीव-चेतना जीव-अवस्था द्वारा प्रकट हो चुकी थी। मनुष्य ने पहले जीवों जैसे ही जीने का प्रयत्न किया, फ़िर जीवों से अच्छा जीने का प्रयत्न किया। जीवों से अच्छा जीने के लिए मनुष्य ने जीव-चेतना का ही प्रयोग किया। इससे "अच्छा लगने" तक हम पहुँच गए। "अच्छा होना" इससे बना नहीं। "अच्छा लगने" की दौड़ में सुविधा-संग्रह लक्ष्य बना कर धरती का शोषण किया, और मनुष्य-परस्परता में अपराध किया। इसके चलते चलते धरती ही बीमार हो गयी। अब विकल्प की आवश्यकता आ गयी। उसी अर्थ में मध्यस्थ-दर्शन अध्ययन के लिए प्रस्तुत है। मध्यस्थ-दर्शन (जीवन विद्या) मनुष्य-जाति के लिए जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होने लिए प्रस्ताव है। मानव चेतना पूर्वक ही मानव-परम्परा धरती पर बनी रह सकती है। और किसी विधि से नहीं।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
पदार्थ-अवस्था ही प्राण-अवस्था को यौगिक विधि से प्रकट करता है। यह स्वयं-स्फूर्त विधि से होता है। इसको कोई बाहरी ताकत नहीं करता। विगत (आदर्श-वाद) में बताया था - "यह परमात्मा की करनी है।" मध्यस्थ-दर्शन ने परमात्मा को व्यापक स्वरूप में पहचाना। परमात्मा (व्यापक) का प्रकटन में "करने वाले" के रूप में कोई रोल नहीं है। परमात्मा (व्यापक) जड़-चैतन्य प्रकृति में प्रेरणा के स्वरूप में है ही! जड़ प्रकृति परमात्मा (व्यापक) में भीगे होने से प्रेरित है, जिससे क्रियाशील है। यह प्रेरणा नित्य है। यह प्रेरणा घटता बढ़ता नहीं है। वस्तु की क्रिया से व्यापक में कोई क्षति होता ही नहीं है। व्यापक में प्रेरणा अभी मिला, बाद में नहीं मिला, अभी ज्यादा मिला, बाद में कम मिला - ऐसा कुछ नहीं होता।
परमाणु अंश भी इस तरह ऊर्जा-संपन्न है, और घूर्णन गति के रूप में क्रियाशील है। सभी परमाणु-अंश एक जैसे हैं। परमाणु की प्रजातियों में भेद उनके गठन में समाहित होने वाले परमाणु-अंशों के अनुसार है। सभी तरह के परमाणु-प्रजातियों के प्रकट होने के बाद भौतिक-संसार तृप्त हो जाता है। उसके बाद ही वह यौगिक-क्रिया में प्रवृत्त होता है। भौतिक-क्रिया में तृप्ति के बाद ही यौगिक क्रिया में प्रवृत्ति बन जाती है। फ़िर स्वयं स्फूर्त विधि से यौगिक प्रकटन होता है। यौगिक प्रकटन के लिए समस्त प्रकार के भौतिक-परमाणु सहायक (पूरक) हो जाते हैं। यौगिक प्रकटन के लिए "भूखे" परमाणु भी सहायक हैं, "अजीर्ण" परमाणु भी सहायक हैं। यौगिक विधि से सर्वप्रथम जल ही प्रकट हुआ।
सह-अस्तित्व में प्रकटनशीलता स्वाभाविक है। इसी प्रकटनशीलता के आधार पर प्राण-अवस्था स्थापित हो गयी। प्राण-कोष में निहित प्राण-सूत्रों में उत्तरोत्तर गुणात्मक विकास से नयी रचना विधि का प्रकटन होता है। इसी क्रम में प्राण-अवस्था के सभी झाड़, वनस्पति, औषधि प्रकट होने के बाद प्राणावस्था तृप्त हो गयी। प्राण-अवस्था तृप्त होने के बाद जीव-अवस्था की रचनाएँ शुरू हुई। जीव-अवस्था भुनगी-कीडे (स्वेदज संसार) से शुरू हो कर अंडज और पिंडज दो प्रकार की प्रजातियाँ स्थापित हुई। उनमें से जलचर, भूचर, और नभ-चर तीनो प्रकार के जीव हुए। शाकाहारी जीवों में प्रजनन क्रिया द्वारा multiplication ज्यादा होता है। मांसाहारी जीवों में अपेक्षाकृत कम multiplication होता है। शाकाहारी संसार की संख्या में संतुलन करने के लिए मांसाहारी संसार का प्रकटन हुआ - यह मुझको समझ में आया। जीवावस्था के सभी वंश-परम्पराएं स्थापित होने के बाद मानव-शरीर रचना का प्रकटन हुआ।
मानव-शरीर रचना सर्व-प्रथम किसी जीव से ही प्रारंभ हुआ, उसके बाद मानव-परम्परा शुरू हुई। जल, सघन-वन, सभी प्रकार के जीव-जानवर प्रक ट होने के बाद ही मनुष्य का प्रकटन हुआ। इन्ही के बीच मनुष्य पला। मनुष्य-शरीर के प्रकटन के साथ ही जीवन अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता प्रकट करने की जगह में आ गया। सह-अस्तित्व सहज प्रकटन विधि से इतने सब श्रम के बाद मनुष्य का प्रकटन इस धरती पर हुआ।
मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के चलते पहले वनों का संहार करना शुरू किया। विज्ञान युग आने के बाद खनिज-संसार का संहार करना शुरू कर दिया। जबकि - वन और खनिज के संतुलन से ही ऋतु-संतुलन होता है। बिना ऋतु-संतुलन के मनुष्य-जाती का धरती पर बने रहना सम्भव नहीं है। इस बात को आज के संसार के सामने highlite करने की ज़रूरत है। यह जो मैं समझा रहा हूँ - यह waste नहीं जाना चाहिए।
मनुष्य ने अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग से अपनी परिभाषा के अनुरूप मनाकार को साकार करने का काम बहुत अच्छे से कर लिया। मनः-स्वस्थता का खाका वीरान पड़ा रहा। मनुष्य के प्रकट होने से पहले जीव-चेतना जीव-अवस्था द्वारा प्रकट हो चुकी थी। मनुष्य ने पहले जीवों जैसे ही जीने का प्रयत्न किया, फ़िर जीवों से अच्छा जीने का प्रयत्न किया। जीवों से अच्छा जीने के लिए मनुष्य ने जीव-चेतना का ही प्रयोग किया। इससे "अच्छा लगने" तक हम पहुँच गए। "अच्छा होना" इससे बना नहीं। "अच्छा लगने" की दौड़ में सुविधा-संग्रह लक्ष्य बना कर धरती का शोषण किया, और मनुष्य-परस्परता में अपराध किया। इसके चलते चलते धरती ही बीमार हो गयी। अब विकल्प की आवश्यकता आ गयी। उसी अर्थ में मध्यस्थ-दर्शन अध्ययन के लिए प्रस्तुत है। मध्यस्थ-दर्शन (जीवन विद्या) मनुष्य-जाति के लिए जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होने लिए प्रस्ताव है। मानव चेतना पूर्वक ही मानव-परम्परा धरती पर बनी रह सकती है। और किसी विधि से नहीं।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
Friday, November 28, 2008
प्रबोधन
प्रबोधन का मतलब है - परिपूर्णता के अर्थ में शब्दों को व्यक्त करना। प्रबोधन का प्रयोजन है - सामने व्यक्ति को बोध होना। बोध होने के बाद वही व्यक्ति जिसको बोध हुआ, अनुभव पूर्वक पुनः प्रबोधित करेगा। इस ढंग से यह multiply होता है। कितने भी multiply होने पर ज्ञान न कम होता है, न ज्यादा। न भाग होता है, न विभाग होता है। जितना हम दूसरों को बोध कराते हैं - हमारा प्रसन्नता उतना ही बढ़ता है। इस प्रसन्नता से और लोगों को बोध कराने का उत्साह बनता है। इससे मनुष्य थकने वाले गुण से मुक्त होता है। सत्य बोध जिनसे हुआ - उनके प्रति कृतज्ञ रहना ही बनता है। उसका return वही है। इससे ज्यादा उसका return होता भी नहीं है।
मंगल-मैत्री के बिना प्रबोधन सफल हो ही नहीं सकता। मंगल-मैत्री पूर्वक हम एक दूसरे पर विश्वास कर सकते हैं। सुनने वाले और सुनाने वाले दोनों। वही है संगीत। संगीत विधि से ही सम्प्रेष्णा होता है। सुनाने वाले को यह विश्वास हो कि सुनने वाला ईमानदारी से सुन रहा है - और उसको बोध होगा। सुनने वाले को यह विश्वास हो कि सुनाने वाला ईमानदारी से सुना रहा है - वह स्वयं बोली जा रही बात में पारंगत है, प्रमाण है।
अभी की स्थिति में १२ वी कक्षा के ८०% से अधिक बच्चे पढाने वाले को नालायक मानते हैं। उनसे अपने को श्रेष्ठ मानते हैं। पैसे के आधार पर। "हमने पैसा दिया है - यह पढाएगा!" - ऐसी इनकी सोच है। पढाने वाला स्वयम आत्म-विश्वास से संपन्न नहीं है। इस स्थिति में प्रबोधन की कोई बात ही नहीं है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
मंगल-मैत्री के बिना प्रबोधन सफल हो ही नहीं सकता। मंगल-मैत्री पूर्वक हम एक दूसरे पर विश्वास कर सकते हैं। सुनने वाले और सुनाने वाले दोनों। वही है संगीत। संगीत विधि से ही सम्प्रेष्णा होता है। सुनाने वाले को यह विश्वास हो कि सुनने वाला ईमानदारी से सुन रहा है - और उसको बोध होगा। सुनने वाले को यह विश्वास हो कि सुनाने वाला ईमानदारी से सुना रहा है - वह स्वयं बोली जा रही बात में पारंगत है, प्रमाण है।
अभी की स्थिति में १२ वी कक्षा के ८०% से अधिक बच्चे पढाने वाले को नालायक मानते हैं। उनसे अपने को श्रेष्ठ मानते हैं। पैसे के आधार पर। "हमने पैसा दिया है - यह पढाएगा!" - ऐसी इनकी सोच है। पढाने वाला स्वयम आत्म-विश्वास से संपन्न नहीं है। इस स्थिति में प्रबोधन की कोई बात ही नहीं है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान
साधना समाधि संयम पूर्वक जो मैंने अध्ययन किया - उसमें सर्वप्रथम सह-अस्तित्व को देखा। देखने का मतलब है समझा। इससे "पैदा होता है और मरता है" - इस विपदा से छूट गए। परिवर्तन होता है, परिणाम होता है - यह पता लगा। रचना की विरचना हो सकती है। मरता कुछ नहीं है। जैसे - शरीर की रचना गर्भाशय में होती है। शरीर की विरचना भी होती है। सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति को सह-अस्तित्व स्वरूप में देखा - यही परम सत्य है। नित्य-वर्तमान यही है। मैंने जो साधना की थी, उसके मूल में जिज्ञासा थी - "सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?" उसका उत्तर मिला - अस्तित्व में कुछ भी असत्य नहीं है। अस्तित्व सह-अस्तित्व स्वरूपी है। सह-अस्तित्व में असत्य की कोई जगह ही नहीं है। "ब्रह्म सत्य - जगत मिथ्या" - जो शास्त्रों में लिखा है, वह ग़लत सिद्ध हो गया। उसकी जगह होना चाहिए - "ब्रह्म सत्य - जगत शाश्वत"।- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक )
Tuesday, November 25, 2008
स्वभाव गति में ही अध्ययन होता है.
समझने के क्रम में यथासंभव स्वभाव-गति को बनाए रखें। स्वभाव-गति में ही मंगल-मैत्री होती है। आवेशित-गति में मंगल-मैत्री नहीं होती। बेहोश रहने में भी नहीं होती। तीसरे - चंचलता बने रहने में भी स्वभाव-गति नहीं रहती।
स्वभाव-गति में ही अध्ययन होता है।
मन सुनते समय भटकता है, इधर-उधर भागता है - तब स्वभाव-गति नहीं होती। मन को एक ही समय में तीन जगह रहने का अधिकार है - इसीलिये अध्ययन के लिए मन को एक जगह स्थिर करने की आवश्यकता है। इसी का नाम है - ध्यान। यदि आपने ध्यान दिया तो अस्तित्व में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो आपको बोध न हो। अस्तित्व में किसी वस्तु पर बुरका नहीं लगा है। अस्तित्व की सभी वास्तविकताएं सह-अस्तित्व स्वरूप में प्रकट ही हैं। इसीलिये अस्तित्व को समझे हुए आदमी द्वारा दूसरे को बोध कराना सहज है। इसी का नाम "प्रबोधन" है। प्रबोधन को सुनने वाला "स्वभाव-गति" में ही receive करता है। receive करने के बाद यदि कोई बात संतुष्टि नहीं दे पाता है, उस स्थिति में सुनने वाला "जिज्ञासा" करता है - संतुष्ट होने के लिए। इस प्रकार सुनाने वाले और सुनने वाले के बीच मंगल मैत्री पूर्वक सारे बात स्पष्ट हो सकता है। सुनने वाले और सुनाने वाले को वस्तु समान रूप से स्पष्ट हो गयी - तो दोनों के बीच कोई अन्तर नहीं रह गया। इसी को "अनन्यता" या "प्रेम" कहा है।
प्रेम या अनन्यता के बारे में परम्परा में नवधा-भक्ति (नारद भक्ति सूत्र) की बात किया गया है। इसमें ९ सीढियों से गुजरने की बात कहा गया है। कब उन नौ सीढियों को कोई पूरा करेगा, किसी को पता नहीं चला!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
स्वभाव-गति में ही अध्ययन होता है।
मन सुनते समय भटकता है, इधर-उधर भागता है - तब स्वभाव-गति नहीं होती। मन को एक ही समय में तीन जगह रहने का अधिकार है - इसीलिये अध्ययन के लिए मन को एक जगह स्थिर करने की आवश्यकता है। इसी का नाम है - ध्यान। यदि आपने ध्यान दिया तो अस्तित्व में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो आपको बोध न हो। अस्तित्व में किसी वस्तु पर बुरका नहीं लगा है। अस्तित्व की सभी वास्तविकताएं सह-अस्तित्व स्वरूप में प्रकट ही हैं। इसीलिये अस्तित्व को समझे हुए आदमी द्वारा दूसरे को बोध कराना सहज है। इसी का नाम "प्रबोधन" है। प्रबोधन को सुनने वाला "स्वभाव-गति" में ही receive करता है। receive करने के बाद यदि कोई बात संतुष्टि नहीं दे पाता है, उस स्थिति में सुनने वाला "जिज्ञासा" करता है - संतुष्ट होने के लिए। इस प्रकार सुनाने वाले और सुनने वाले के बीच मंगल मैत्री पूर्वक सारे बात स्पष्ट हो सकता है। सुनने वाले और सुनाने वाले को वस्तु समान रूप से स्पष्ट हो गयी - तो दोनों के बीच कोई अन्तर नहीं रह गया। इसी को "अनन्यता" या "प्रेम" कहा है।
प्रेम या अनन्यता के बारे में परम्परा में नवधा-भक्ति (नारद भक्ति सूत्र) की बात किया गया है। इसमें ९ सीढियों से गुजरने की बात कहा गया है। कब उन नौ सीढियों को कोई पूरा करेगा, किसी को पता नहीं चला!
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
Monday, November 24, 2008
समझदारी की घोषणा का मतलब
सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व की वास्तविकताओं को आपने सटीक पहचाना है, इसका प्रमाण आपके जीने में ही आएगा। व्यक्ति के प्रमाणित होने का मतलब - उस व्यक्ति द्वारा अन्य लोगों को समझा देना। प्रमाणित होने का स्वरूप है - समझे हुए को समझाना, सीखे हुए को सिखाना, किए हुए को कराना। समझदारी का और कौनसा प्रमाण हो सकता है - आप बताओ? समझा देना ही समझे होने का प्रमाण होता है।
प्रश्न: आपने अनुसंधान पूर्वक समझा, उसमें पूरा समझने के बाद ही दूसरों को समझाने की बात रही। लेकिन हम जो अध्ययन विधि से चल रहे हैं, उसमें आप कहते हैं - जितना समझे हो, उतना समझाते भी चलो। इसको समझाइये।
उत्तर: समझाने से अपनी समझ को पूरा करने का उत्साह बनता है। जैसे आपने थोड़ा सा समझा, उसको दूसरे को समझाया - उससे आप में और आगे समझने का उत्साह बनता है। यह खाका ग़लत नहीं है। यह समझने की गति बढाता है। हमें उत्सवित भी रहना है, सच्चाई को समझना भी है, और सच्चाई को प्रमाणित भी करना है। कुछ लोग पूरा समझ के ही समझाना चाहते हैं - वह भी ठीक है। कुछ लोग समझते-समझते समझाना भी चाहते हैं - वह भी ठीक है। लक्ष्य है - समझदारी हो जाए। समझदारी के बिना प्रमाण होता नहीं है। समझदारी के पूरा हुए बिना "जीना" तो बनेगा नहीं। यही कसौटी है। "जीना" बन गया तो समझदारी पूरा हुआ, समझाना बन गया। उसके बाद उत्साहित रहने के अलावा और क्या है - आप बताओ?
इसमें व्यक्तिवाद जोड़ा तो अकड़-बाजी होने लगती है। अकड़-बाजी होती है, तो हम पीछे हो जाते हैं। व्यक्तिवाद जोड़ने से पिछड़ना ही है।
प्रश्न: व्यक्तिवाद के चक्कर से बचने का क्या उपाय है?
उत्तर: स्व-मूल्यांकन को हमेशा ध्यान में रखा जाए। दूसरों को जांचने जाते हैं - तो दिक्कत है। जो स्वयं को पारंगत घोषित किया है, उसे ही जाँचिये। जैसे मैंने अपने को ज्ञान में पारंगत घोषित किया है, आप मुझको जांच ही सकते हैं। मुझको जांचने में किसीको झिझक नहीं होनी चाहिए। मुझको उससे कोई दिक्कत नहीं है।
प्रश्न: समझदारी की घोषणा का क्या मतलब है?
जो स्वयं को समझदार घोषित किया है, उसके परीक्षण से ही अध्ययन करने वाले को अपनी समझ की पुष्टि मिलती है। घोषित किए बिना आपको कोई जांचने जायेगा नहीं।
मैं पहला व्यक्ति हूँ - जिसने स्वयं को समझदारी का प्रमाण घोषित किया। एक आदमी के ऐसे घोषणा किए बिना इस कार्यक्रम में कोई गति हो ही नहीं सकती थी। कितना बड़ा भारी ख़तरा ओढ़ लिया है - आप सोचो!! इसके बावजूद मैं निर्भय हूँ, मुझे कोई आतंक नहीं, कोई शंका नहीं, किसी तरह का प्रतिक्रिया नहीं - क्या बात है यह? क्या चीज है यह? यह एक सोचने का मुद्दा है आप के लिए। मैंने जो समझदारी के प्रमाण होने का जो पहला मील का पत्थर रख कर जो रास्ता शुरू किया - वह ठीक हुआ, ऐसा मैं मानता हूँ।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
प्रश्न: आपने अनुसंधान पूर्वक समझा, उसमें पूरा समझने के बाद ही दूसरों को समझाने की बात रही। लेकिन हम जो अध्ययन विधि से चल रहे हैं, उसमें आप कहते हैं - जितना समझे हो, उतना समझाते भी चलो। इसको समझाइये।
उत्तर: समझाने से अपनी समझ को पूरा करने का उत्साह बनता है। जैसे आपने थोड़ा सा समझा, उसको दूसरे को समझाया - उससे आप में और आगे समझने का उत्साह बनता है। यह खाका ग़लत नहीं है। यह समझने की गति बढाता है। हमें उत्सवित भी रहना है, सच्चाई को समझना भी है, और सच्चाई को प्रमाणित भी करना है। कुछ लोग पूरा समझ के ही समझाना चाहते हैं - वह भी ठीक है। कुछ लोग समझते-समझते समझाना भी चाहते हैं - वह भी ठीक है। लक्ष्य है - समझदारी हो जाए। समझदारी के बिना प्रमाण होता नहीं है। समझदारी के पूरा हुए बिना "जीना" तो बनेगा नहीं। यही कसौटी है। "जीना" बन गया तो समझदारी पूरा हुआ, समझाना बन गया। उसके बाद उत्साहित रहने के अलावा और क्या है - आप बताओ?
इसमें व्यक्तिवाद जोड़ा तो अकड़-बाजी होने लगती है। अकड़-बाजी होती है, तो हम पीछे हो जाते हैं। व्यक्तिवाद जोड़ने से पिछड़ना ही है।
प्रश्न: व्यक्तिवाद के चक्कर से बचने का क्या उपाय है?
उत्तर: स्व-मूल्यांकन को हमेशा ध्यान में रखा जाए। दूसरों को जांचने जाते हैं - तो दिक्कत है। जो स्वयं को पारंगत घोषित किया है, उसे ही जाँचिये। जैसे मैंने अपने को ज्ञान में पारंगत घोषित किया है, आप मुझको जांच ही सकते हैं। मुझको जांचने में किसीको झिझक नहीं होनी चाहिए। मुझको उससे कोई दिक्कत नहीं है।
प्रश्न: समझदारी की घोषणा का क्या मतलब है?
जो स्वयं को समझदार घोषित किया है, उसके परीक्षण से ही अध्ययन करने वाले को अपनी समझ की पुष्टि मिलती है। घोषित किए बिना आपको कोई जांचने जायेगा नहीं।
मैं पहला व्यक्ति हूँ - जिसने स्वयं को समझदारी का प्रमाण घोषित किया। एक आदमी के ऐसे घोषणा किए बिना इस कार्यक्रम में कोई गति हो ही नहीं सकती थी। कितना बड़ा भारी ख़तरा ओढ़ लिया है - आप सोचो!! इसके बावजूद मैं निर्भय हूँ, मुझे कोई आतंक नहीं, कोई शंका नहीं, किसी तरह का प्रतिक्रिया नहीं - क्या बात है यह? क्या चीज है यह? यह एक सोचने का मुद्दा है आप के लिए। मैंने जो समझदारी के प्रमाण होने का जो पहला मील का पत्थर रख कर जो रास्ता शुरू किया - वह ठीक हुआ, ऐसा मैं मानता हूँ।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
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