ANNOUNCEMENTS



Tuesday, August 19, 2008

नियम

मध्यस्थ-दर्शन के अनुसार: नियति-विधि ही नियम है। सम्पूर्ण नियम अस्तित्व में हैं ही।
नियम से ही अस्तित्व में पदार्थ-अवस्था से प्राण-अवस्था, प्राण-अवस्था से जीव-अवस्था, और जीव-अवस्था से ज्ञान-अवस्था प्रकट हुई।

भौतिकवाद या विज्ञान ने अपनी हवस के अनुसार नियम प्रतिपादित किए या बना दिए। जबकि नियम होते हैं, बनते नहीं हैं। ये जो नियम बनाए - वे नियति-विरोधी थे, उन पर चलने से धरती बीमार हो गयी। इन नियमो के रहते मानव का धरती पर बने रहना खतरे में है।

उसके पहले आदर्शवाद ने "ईश्वरीय नियम" बताये। सभी ईश्वरीय नियम ऐसे ही हैं - ईश्वर के अधीन में रहो, ईश्वर को रिझाओ, तुम्हारा कल्याण होगा! ईश्वर क्या है? - यह पूछा तो बताया "तुम समझोगे नहीं!" अब करो! परम्परा में सामान्य आदमी का फंसावट यहीं रहा।

अब मध्यस्थ-दर्शन से जो उपरोक्त दोनों विचारधाराओं का विकल्प जो आया - उससे यह स्पष्ट होता है:

प्राकृतिक रूप में गवाहित रहना ही नियम है।
प्राकृतिक रूप में प्रमाणित रहना ही नियम है।
प्राकृतिक रूप में वर्तमान रहना ही नियम है।

अध्ययन के लिए इन तीनो बातों को reference में रखना आवश्यक है। पदार्थावस्था, प्राणावस्था, और जीवावस्था नियम को गवाहित, प्रमाणित, और वर्तमानित करती रहती हैं। ज्ञान-अवस्था के मानव को भी अपने नियमो को पहचानने की आवश्यकता है। मानव ज्ञान-अवस्था में होने के कारण मानव में ज्ञान ही गवाहित, प्रमाणित, और वर्तमानित होगा। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, और भागीदारी - ये चारों जगह पर जब मानव पूरा हुआ, तभी मानव ने अपनी गवाही को प्रस्तुत किया। इस विधि से मनुष्य का ज्ञान-अवस्था में होने का qualification पूरा हो जाता है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Sunday, August 17, 2008

"जीने" के आंशिक भाग में "करना" है.

आज की स्थिति में आदमी के पास "करने" का load ज्यादा है। "सोचने" का load उससे कम है। "समझने" का load शून्य है। यह load जीवन में "इच्छा" के स्वरुप में है। यंत्रों को संचालित करने को "करना" माना है। उसके लिए सोच जो है - वह लाभ-हानि के आधार पर तुलन है। पैसे के आधार पर लाभ-हानि को पहचाना। आज की स्थिति में "करने" को ही "जीना" मान लिया गया है। अभी पूरा शिक्षा-तंत्र और पूरा व्यवस्था तंत्र "करने" को ही "जीना" मान करके चल रहा है - जिसके मूल में लाभ-हानि को लेकर तुलन-विश्लेषण है।

मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव आज की जो स्थिति है - उससे बिल्कुल उल्टा है। आज की स्थिति में "करना" है, और "करने" के लिए ही "सोचना" है। यह तरीका "समझने" तक पहुँचता ही नहीं है। मध्यस्थ-दर्शन में "समझ के करने" का प्रस्ताव है। "समझ" पूर्वक ही परिवार में अपनी आवश्यकता का निर्धारण होता है - उसके लिए क्या और कैसे "करना" है वह निर्धारण होता है। निर्धारण हेतु "सोच विचार" के लिए "समझ" पूरी रहती है।

"समझने" पर ही "जीने" की विधि आती है। समझदारी से यह निकलता है - "जीने" के आंशिक भाग में "करना" है।

"समझने" की ज़रूरत को पूरा करने के लिए मध्यस्थ-दर्शन का प्रस्ताव है। मध्यस्थ-दर्शन में जीने की विधि के लिए प्रस्ताव है - समाधान सम्पन्नता पूर्वक समृद्धि के साथ गति।

समाधान "समझे" बिना हो नहीं सकता।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००७, अमरकंटक )

श्रुति, स्मृति, अध्ययन, प्रमाण

श्रुति-स्मृति का मतलब है - भाषा को सुनना और बोल कर सुनाना। यहाँ तक मनुष्य-जाति पहुँच गया था। अध्ययन, वास्तविकताओं को लेकर पारंगत होना, और प्रमाण इसके आगे की कडियाँ हैं - जिनको मध्यस्थ-दर्शन द्वारा जोड़ा गया है। भाषा को सुनना और उसको बोल कर सुनाना अध्ययन के लिए आवश्यक है। भाषा आदर्शवाद की देन है। इससे पढ़ना, पढाना, बोलना, सुनना यह सब अच्छे से आदमी आज कर सकता है। लेकिन इतने भर से आदमी का काम चला नहीं। जब तक अध्ययन, वास्तविकताओं में पारंगत होना, और प्रमाणित होने की कडियाँ जुड़ती नहीं हैं - तब तक आदमी का काम चलता नहीं है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (दिसम्बर २००७, अमरकंटक)

Saturday, August 16, 2008

अध्ययन-क्रम में पड़ाव

प्रश्न: आप कहते हैं - मनुष्य जीने में दो ही स्थितियों में हो सकता है। या तो भ्रम में जीता है, या जागृति में जीता है। भ्रम में जीवन की ४.५ क्रिया प्रकाशित होती हैं। जागृति में जीवन की १० क्रियाएं प्रकाशित होती हैं। अध्ययन-क्रम में जीवन की क्रियाओं की क्या स्थिति होती है?

उत्तर: भ्रमित जीने में हम अपने जीवन की ४.५ क्रियाओं को शरीर के साथ लगाए रहते हैं। ऐसे समस्याओं में जीते हुए, हमारा अनुमान हुआ - यह पर्याप्त नहीं है। इससे जिज्ञासा जो उदय हुई - उसके आधार पर हमको दसों क्रियाओं को चालू करने का स्त्रोत (मध्यस्थ-दर्शन के प्रमाण के रूप में) मिल गया। उसका हम अध्ययन करने में लग गए। ऐसे अध्ययन करने में हमको लगा - कुछ भाग हमको बोध हो गया है, कुछ बोध होना अभी शेष है। तब तक हमारे जीवन की ४.५ क्रियाओं का समर्पण दसों क्रियाओं को चालित करने के लिए हो गया। इससे ४.५ क्रिया से उत्थान की ओर गति हुई। उत्थान हो गया - तब कहेंगे, जब दसों क्रिया प्रमाणित हुआ।

प्रश्न: क्या अध्ययन-क्रम में कोई निश्चित पड़ाव (या माइलस्टोन) हैं?

उत्तर: पड़ाव कुछ नहीं हैं। वरीयता क्रम की बात है। समझ कर जीने की वरीयता स्वयं में बनती है - तो हम जल्दी अध्ययन पूरा कर लेते हैं। यदि दूसरे-तीसरे नम्बर पर यह वरीयता रहती है - तो हम धीरे-धीरे अध्ययन पूरा करते हैं। इतना ही है।

भाषा से पठन को पूरा करने तक हम पहुँच जाते हैं। उसके बाद वस्तु का अनुभव ही है। यह जिए बिना होता नहीं है। बातों से यह नहीं होता। भाषा से पठन को पूरा करने के बाद दो ही स्थितियों में आदमी मिल सकता है - (१) जीने का प्रयत्न करते हुए। (२) अनुभव को जीने में प्रमाणित करते हुए। ये दो ही स्थितियाँ हैं - उसके अलावा तीसरा स्थिति नहीं है। यह हर व्यक्ति के साथ प्राण-संकट है - या सौभाग्य है। शरीर के साथ जोड़ते हैं - तो प्राण-संकट है। जीवन के साथ इसको जोड़ते हैं - तो सौभाग्य है!

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)

Thursday, August 14, 2008

भाषा से ज्ञान तक

ध्वनि के एक तरीके को हम भाषा कह रहे हैं। इन्द्रियों के साथ शब्द तैयार होता है। शब्द अंततोगत्वा भाषा के नाम से आया। भाषा है - भासना। शब्द के अर्थ से वस्तु का भास् होना। शब्द के अर्थ से वस्तु का स्वरुप कल्पना में आना। अपनी कल्पना में आने के बाद वह साक्षात्कार हो जाए। वह अनुभव में आ जाए। वह प्रमाणित हो जाए। प्रमाणित होना = जीने में, बोलने में, समझाने में अनुभव प्रमाणित होना।

जैसे - "ज्ञान" एक शब्द है। ज्ञान वह समझ है जो मनुष्य के जीने में सामरस्यता के रूप में प्रमाणित होता है। पहले चार विषयों को ही ज्ञान मान लिया गया। वह पर्याप्त न होने पर पाँच इन्द्रियों के द्वारा होने वाली स्वीकृतियों को ज्ञान मान लिया। वह भी पर्याप्त न होने पर उसको भी नकारा गया, और होना क्या चाहिए, इस पर सोचा गया। मैंने इसी बिन्दु से शुरू किया था। मैंने जो प्रयास किया वह सफल हो गया। मैंने ज्ञान को पहचान लिया - जो मनुष्य के जीने में सामरस्यता के रूप में प्रमाणित होता है।

इन्द्रिय-गोचर वस्तुओं का ज्ञान मनुष्य को हो गया है। ज्ञान-गोचर सब बचा हुआ है। मध्यस्थ दर्शन ज्ञान-गोचर वस्तुओं की पहचान कराने के अर्थ में है। जैसे - जीवन ज्ञान-गोचर है। मानव-मूल्य - विश्वास, सम्मान, आदि - ज्ञान-गोचर हैं। ये ज्ञानगोचर वस्तुएं यदि साक्षात्कार होता है, तो अनुभव होता ही है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Wednesday, August 13, 2008

कैसे सुने?

जो कहा जा रहा है, उतना ही सुने - उसके साथ मिलावट नहीं किया जाए। मिलावट करने से हम रुक जाते हैं। अनसुनी करने से हम रुक जाते हैं। अनदेखी करने से हम रुक जाते हैं।

यह कुल मिला कर जागृत मनुष्य के रूप में होने के लिए सुझाव है। इसको ध्यान से सुनने की ज़रूरत है।

अनदेखी नही किए - मतलब ध्यान देना शुरू कर दिए।
मिलावट नहीं किए - मतलब सतर्क रहना शुरू कर दिए।
अनसुनी नहीं किए - मतलब एकाग्रता आ गयी।

इस बात को पूरा समझने के बाद निर्णय लीजिये - इसमें क्या कमी है। समझने के पहले ही हम इसमें कमी निकालने लगे, कुछ इसके बारे में निर्णय लेने लगे - तो अनसुनी और अनदेखी होगी। इसको समझने के बाद विचार कीजिये - यह हमारे लिए कितना सार्थक है, उपकारी है, ज़रूरत है। फ़िर कोई विरोधाभास लगता है, तो मुझे बताइये। हर सूत्र, हर बिन्दु मनुष्य में समाने के लिए ही है। कुछ भी विरोधाभास में जाता ही नहीं है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

विचार पहले, आचरण उसके बाद में

विगत में (आदर्शवाद ने) बताया - आचरण पहले, विचार बाद में। आचरण के नियम बताये - यह करो, यह मत करो। वह सब रूढियों में परिवर्तित हो गया।

जबकि मध्यस्थ-दर्शन के अनुसार - विचार पहले, आचरण उसके बाद में । विचार में हम स्वस्थ हो जाते हैं, तो आचरण में स्वस्थ होते ही हैं। "करो, न करो" - यह रूढी है, समझ नहीं है। सोच-विचार यदि पूरा हो जाता है, अनुभव-मूलक हो जाता है - तो वह आचरण में आता ही है। विचार में समाधान स्थापित हुए बिना कोई मानवीयता पूर्ण आचरण नहीं करेगा। उसके लिए अध्ययन ही एक मात्र उपाय है।

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)