Wednesday, January 22, 2020

आत्मा और ब्रह्म



तुलन में न्याय-धर्म-सत्य आने पर साक्षात्कार होता ही है.  तुलन व साक्षात्कार होने पर बोध पूर्वक प्रमाणित करने का संकल्प होता है, फलस्वरूप अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित हो जाता है.  सहअस्तित्व स्वरूपी सत्य में न्याय और धर्म समाया ही है.  इसीलिये आत्मा जब सहअस्तित्व में अनुभूत होता है तो जीव-जगत सब समझ में आता है, फलस्वरूप हम प्रमाणित होने योग्य हो जाते हैं.  आत्मा मध्यस्थ क्रिया है, उसमें तो सत्य स्वीकृत होता ही है.  सत्य के अलावा आत्मा में और कुछ स्वीकृत ही नहीं होता.

प्रश्न:  आपने अनुभव दर्शन में लिखा है - "आत्मा प्रकृति का अंश होते हुए भी ब्रह्म से नेष्ठ नहीं है" इसका क्या आशय है?

उत्तर: ब्रह्म व्यापक वस्तु है.  आत्मा मध्यस्थ क्रिया होने से और ब्रह्म मध्यस्थ सत्ता होने से इन दोनों की साम्यता है.  इस साम्यता का बोध होने के फलस्वरूप अनुभव है.  आत्मा व्यापक वस्तु को ज्ञान स्वरूप में अनुभव कर लेता है.  अनुभव मूलक विधि से आत्मा ज्ञान को परस्परता में प्रमाणित करने योग्य हो जाता है.  परस्परता में सत्य संप्रेषित होता है तो वह आत्मा में अनुभव मूलक विधि से ही होता है.  आत्मा जीवन परमाणु का मध्यांश होते हुए, क्रिया होते हुए ब्रह्म से नेष्ठ इसीलिये नहीं है क्योंकि अनुभव मूलक विधि से ही परस्परता में सत्य प्रमाणित होता है, संप्रेषित होता है.

प्रश्न:  आपने लिखा है - "आत्मा सम और विषम से मुक्त है".  तो भ्रम में जीते हुए मानव, अध्ययनशील मानव और अनुभव संपन्न मानव तीनो में यह सम विषम से मुक्त होगी.  फिर अनुभव होने से आत्मा की क्रिया में अंतर क्या हुआ?

उत्तर: आत्मा का सम-विषम से मुक्त होना तो उसकी सदा-सदा की स्थिति है.  आत्मा में मध्यस्थ का प्रकाश होना या नहीं होना - इतना ही अंतर है.  बुद्धि में सत्य बोध न होने से मध्यस्थ का प्रकाश नहीं हुआ था.  इतना ही तो बात है.  हम अध्ययन जो करते हैं वह अनुभव होगा इसीलिये करते हैं, उसमे सिलसिले से समाधान निकलता जाता है.  इसीलिये अध्ययनशील विद्यार्थी में यह विश्वास बनता है कि अध्ययन से अनुभव होगा. 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

धैर्य और स्नेह का रास्ता

मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन विधि का रास्ता धैर्य और स्नेह का है - यह हड़बड़ी वाला रास्ता नहीं है, नाराजगी वाला रास्ता नहीं है, आलोचना वाला रास्ता नहीं है, विरोध वाला रास्ता नहीं है.  (अब तक की सोच के अनुसार चलने से) घटनाक्रम में हम सर्वनाश की ओर जा रहे हैं - सर्वशुभ की ओर दिशा के परिवर्तन के लिए यह प्रस्ताव है.  इसकी ज़रूरत है या नहीं - सोच लो! 

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

Friday, January 17, 2020

संवेदनाओं का नियंत्रण-बिंदु न मिलने से मानव जाति का इतना भटकाव हुआ



संवेदना = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों का क्रियाकलाप.  जीवन और शरीर का योग होने से संवेदना व्यक्त होता ही है.  आदिमानव में भी यह रहा, आज भी है.  अभी तक संवेदनाओं को पहचान सकने को जागृति माना गया, संवेदनाओं को नहीं पहचान सकने को मरा हुआ माना गया. 

अब यहाँ (मध्यस्थ दर्शन में) प्रस्तावित है - मानव चेतना पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहते हैं, जीव चेतना पूर्वक संवेदनाएं अनियंत्रित रहते हैं.  नियंत्रित संवेदनाओं के साथ मानव व्यवस्था में जीता है,  अनियंत्रित संवेदनाओं के साथ मानव अव्यवस्था में जीता है.

विज्ञान (भौतिकवाद) ने संवेदनाओं के अनियंत्रित होने को ही सच्चाई मान लिया.  आदर्शवाद ने संवेदनाओं के अनियंत्रण का विरोध तो किया, पर संवेदनाओं का नियंत्रण कैसे हो - इसकी पूर्ति नहीं कर पाया.

विज्ञान (भौतिकवाद) शरीर को ही चैतन्य मानता है. आदर्शवाद शरीर को चैतन्य मानने का विरोध तो किया है, लेकिन "आत्मा" नाम से जो कुछ उन्होंने चैतन्यता के बारे में बताया वो रहस्य में फंस गया.  उसके बारे में बात नहीं कर पाए, समझा नहीं पाए, प्रमाणित नहीं कर पाए - चुप हो कर चले गए.  चैतन्यता को बताने के लिए उत्तर भारत में दस अवतारों को माना, दक्षिण भारत में तीन आचार्यों को माना.   तीनो आचार्यों की परम्परा में आदर्शवाद ही रहा, किन्तु उनकी ध्यान और उपासना विधियों में भेद रहा.  इन सभी ने शुभ का आशय व्यक्त किया, पर शुभ के प्रमाणित होने से रह गए.  जहाँ तक अवतारों की बात है, सभी अवतार बल (वध-विध्वंस) के आधार पर प्रतिष्ठित हुए, और उसके साथ ज्ञान को भी जोड़े कि उनमे ऋषित्व होना चाहिए.  ऋषित्व के मूल में "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" ही बताया.  अब इस तरह अवतारों का जितना भी युद्ध हुआ मिथ्या के साथ ही हुआ!  फिर उसका क्या आशय हुआ?  अवतारों ने जो लड़ाइयाँ की और आज जो लड़ाइयाँ हो रही हैं - आदर्शवाद के अनुसार मिथ्या के साथ ही हैं! 

लड़ाइयों को लेकर यहाँ अवधारणा दिए हैं - पशुमानव और राक्षसमानव ही लड़ाई (युद्ध) करता है.  राक्षस मानव ज्यादा वध-विध्वंस करता है, पशु मानव वध-विध्वंस की आहुति होता है.

इस ढंग से आदर्शवादी विधि से मानव परम्परा में भय और प्रलोभन ही संप्रेषित हुआ.  स्वर्ग के प्रति प्रलोभन, नर्क के प्रति भय.  पुण्य के प्रति प्रलोभन, पाप के प्रति भय.  आदर्शवाद के सारे भाषण और उपदेश का अर्थ इतना ही है.  सारे अवतार राक्षसों को नष्ट करने के स्वरूप में रहे.  अलग अलग अवतार कई प्रकार के राक्षसों का संहार करने के लिए सम्मान पाए.  इसके साथ-साथ वे उपदेशात्मक ज्ञान भी दिए कि आदमी को राक्षस नहीं होना चाहिए, नैतिक होना चाहिए, ज्ञानी होना चाहिए, विवेकी होना चाहिए.  आदमी को ज्ञानी होना चाहिए - यह सभी अवतार कहे.  राम भी कहे, कृष्ण भी कहे.  ज्ञान के पास गए तो अव्यक्त-अनिर्वचनीय हो गए.  अब कौनसा ज्ञान है?  जो वचन में आना ही नहीं है, व्यक्त होना ही नहीं है - फिर प्रमाण क्या होगा?  इस प्रकार आदर्शवाद प्रमाणित होने से किनारा कर लिया.

उधर भौतिकवाद सुविधा-संग्रह के चक्कर में आदमी को फंसा दिया.  सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिंदु मिलना ही नहीं है.  सकल अपराध को वैध मानने के बाद भी सुविधा-संग्रह का तृप्ति-बिंदु नहीं मिला.  इस बीच धरती ही बीमार हो गयी.

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों का नियंत्रण-बिंदु न मिलने से इतना भटकाव हुआ.  मानव चेतना पूर्वक संवेदनाओं के नियंत्रण-बिंदु को पाते हैं.  इस नियंत्रण-बिंदु का स्वरूप है - समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व.  मानव चेतना को संवेदनाओं द्वारा व्यक्त करने से "मानव संचेतना" कहलाया.  संचेतना का अर्थ है - पूर्णता के अर्थ में चेतना.  पूर्णता का अर्थ मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना ही होता है.  मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना सहज पूर्णता को पाने के लिए "समझदारी" चाहिए.  उसके लिए ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय को स्पष्ट किया.  पहले आदर्शवाद में ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय तीनो को ब्रह्म ही बताया था, अब यहाँ कह रहे हैं - जीवन ज्ञाता है, सहअस्तित्व ज्ञेय है, ज्ञान तीन भाग में है - सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान.  इस ज्ञान को विकल्प विधि से लाये. 

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक)

तीन भूत और तीन देवता

छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री के साथ वार्ता में मैंने प्रस्ताव रखा - आप अभी शिक्षा में तीन भूत (लाभोन्मादी अर्थशास्त्र, कामोन्मादी मनोविज्ञान, भोगोन्मादी समाजशास्त्र) सब विद्यार्थियों पर चढाते हो.  उन तीन भूतों के साथ तीन देवताओं (आवर्तनशील अर्थशास्त्र, मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान, व्यव्हारवादी समाजशास्त्र) को भी चढाओ!  फिर देख लो इन में से कौन विजय पाता है. 

इससे ज्यादा liberal और इससे ज्यादा generalized कार्यक्रम क्या होगा?

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००८, अमरकंटक) 

Monday, January 13, 2020

परम्परा की समीक्षा हो, न कि व्यक्ति की शिकायत

अपने मन में किसी भी तरह की शिकायत मत रखना.  शिकायत मुक्त होने पर ही हम पूरे हो पाते हैं - नहीं तो वह कहीं न कहीं प्रभाव डालता ही है.  जैसे ही हम अपने मन में किसी के प्रति विरोध लाते हैं हम अपना ही मार्ग अवरुद्ध कर लेते हैं.  शिकायत तो होना ही नहीं, परम्परा का समीक्षा होना है.  परम्परा की हम बात करेंगे.  भौतिकवादी परम्परा यह दिया, उससे यह सद्घटना और यह दुर्घटना हुआ.  आदर्शवादी परम्परा हमको यह दिया, उससे यह सद्घटना और यह दुर्घटना हुआ. 

परम्परा की समीक्षा करने में चूकना नहीं, व्यक्ति को शिकायत का आधार बनाना नहीं.

सभी व्यक्ति किसी न किसी परम्परा में डूबे ही हैं.  अलग से व्यक्ति को क्यों कटघरे में लायें?  परम्परा कहते हैं, तो उसमे सभी व्यक्ति आ गए.  यदि व्यक्तियों का नाम लेने बैठोगे तो कितने व्यक्तियों का नाम लोगे?

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

विश्लेषण के स्पष्ट अथवा सार रूप में मूल्य स्वीकृत होता है.


प्रश्न:  आपने कर्म दर्शन में लिखा है - "विश्लेषण के स्पष्ट अथवा सार रूप में मूल्य स्वीकृत होता है."  इसको और स्पष्ट कर दीजिये.

उत्तर:  हर व्यक्ति अपने मन में अपेक्षा के अनुसार आस्वादन करता है.  जीव चेतना में रुचि (संवेदनाओं की तृप्ति) के अनुसार आस्वादन होता है.  मानव चेतना में व्यवस्था (लक्ष्य व मूल्य) के अनुसार आस्वादन होता है.  व्यवस्था मानव के लिए इच्छित वस्तु है.  व्यवस्था के स्वरूप को अभी तक विश्लेषित करना नहीं बना था, अब बन गया है.  व्यवस्था का स्वरूप अब सूत्रित व्याख्यायित हो गया है.   स्वयं का भी विश्लेषण, जिसको पाना है उसका भी विश्लेषण। 

जीव चेतना में बिना विश्लेषण के संवेदनाओं की तृप्ति के लिए आदमी दौड़ रहा है.  जबकि विश्लेषण पूर्वक ही मूल्यों को स्वीकारना बनता है.  मूल्यों को स्वीकारना विश्लेषण के बिना नहीं होगा.  मूल्यों को स्वीकारने के फलस्वरूप मानव चेतना होगा.

मूल्यों की स्वीकृति चित्त में होती है - जो साक्षात्कार है.  वही बोध व अनुभव में जा कर पूरा होता है.

सात सम्बन्ध विश्लेषित होने के बाद ही मूल्यों के बारे में स्वीकृति होती है कि उनका निर्वाह होना ज़रूरी है.  मूल्यों की स्वीकृति होने के बाद स्वाभाविक रूप में उनका निर्वाह होता है.

विश्लेषण से पूर्व रूचि के अनुसार प्रिय-हित-लाभ की स्वीकृति रहती है.  विश्लेषण के बाद न्याय-धर्म-सत्य की स्वीकृति रहती है.

अभी तक की शिक्षा प्रिय-हित-लाभ के लिए भय और प्रलोभन के साथ ही पढ़ा रहा है.  आदर्शवादी भी जो कुछ बताये वह भय और प्रलोभन के आधार पर ही बताये.  वही भौतिकवादी शिक्षा में भी चल रहा है.  जितने भी आदर्शवादी शास्त्र और कथाएँ हैं वे भय और प्रलोभन के साथ हैं.  वे यह माने हुए हैं कि भय और प्रलोभन पूर्वक ही सच्चाई बोध होगी.  झूठ के प्रति भय और सच्चाई के प्रति प्रलोभन होने से आदमी सच्चाई की तरफ जाएगा - ऐसा वहां माना है.  जबकि उससे एक भी सच्चाई बोध नहीं हुआ.  इन्द्रिय संवेदनाओं और चार विषयों से आगे बढ़ नहीं पाए.

अब यहाँ कह रहे हैं - व्यवस्था के स्वरूप के विश्लेषण के सार रूप में मानव में मूल्य स्वीकृत होता है.

- श्रद्धेय ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)

Saturday, January 11, 2020

मृत्यु, भय और आसक्ति


प्रश्न:- मृत्यु क्या है?  मृत्यु के भय से कैसे मुक्त हो सकते हैं?

उत्तर:  मृत्यु एक घटना है.  रचना का विरचना होने की घटना.  प्राणपद चक्र में मृत्यु घटना नियति है.  प्राणावस्था में रचना-विरचना होना नियम ही है, जिसकी परम्परा है.  भौतिक-रासायनिक वस्तुओं में आरोह-अवरोह स्वाभाविक है.  हर भौतिक-रासायनिक वस्तु किसी अवधि के बाद विरचित होता ही है. 

जीवन अमर है.  समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व पूर्वक जीने से जीवन तृप्ति मिलती है.  समाधानित परम्परा में मृत्यु का शोक व भय नहीं होता.  जब भी, जहाँ भी शरीर यात्रा करेंगे उसमें सफल होंगे - यह रहता है.  जीवन को नहीं समझने तक ही मृत्यु का भय है.  आदर्शवाद में "आत्मा का अमरत्व" प्रतिपादित है.  यहाँ मौलिक परिवर्तन है - "जीवन का अमरत्व" का प्रतिपादन.  जीवन पर विश्वास हो जाने पर शरीर की विरचना से लगने वाला भय समाप्त हो जाता है.  चार विषयों के प्रति आसक्ति भी उसी के साथ समाप्त हो जाता है.  आसक्ति नहीं होना चाहिए - यह सभी कहते हैं.  पर आसक्ति से मुक्ति होगा कैसे?  जीवन पर विश्वास होने से आसक्ति से मुक्ति है.  उसी के साथ शरीर की उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनशीलता पर विश्वास होता है.  समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना उपयोगिता है.  समाधान-समृद्धि-अभय पूर्वक जीना सदुपयोगिता है.  शरीर सहित व्यवस्था में जीते हुए सहअस्तित्व प्रमाणित होना ही प्रयोजनशीलता है.

अभयता में शरीर की विरचना के भय से मुक्त रहना एक भाग है, विषयों की आसक्ति से मुक्त रहना दूसरा भाग है.  इसमें कहाँ गलती है - आप बताओ!  इस समझ के साथ जीने में आदमी के बर्बाद होने की जगह कहाँ है - आप बताओ!  इसको छोड़ के आदमी बर्बाद होने के अलावा क्या होगा - आप बताओ!

- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००७, अमरकंटक)