This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
Saturday, December 22, 2012
Friday, December 21, 2012
भ्रम पर्यन्त जीवन की शरीर यात्राओं का स्वरूप
जागृति की ओर प्रवृत्ति होने के बाद पीढी से पीढी और अच्छा होने का क्रम बन जाता है। अंततोगत्वा चेतना-विकास के दरवाजे में आ जाते हैं। एक बार चेतना विकास की स्वीकृति होने पर अगली शरीर-यात्रा में वह और पुष्ट होता है।
- श्रद्धेय नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)
अनुभव शिविर 2007 - भाग 3
विगत के अध्ययन से जो सार्थक मिला है, उसको परंपरा में लाया जाए। विगत की जो निरर्थकता है, उसकी कड़ी भाषा से समीक्षा हो।