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Friday, April 15, 2016

भाव

"भाव ही वैभव है.  अस्तित्व नित्य भाव है, इस कारण अस्तित्व नित्य वैभव है.  प्रत्येक स्थिति (क्रिया) अपने भाव संपन्न है.  अनन्त इकाइयों के कारण अनन्त स्थितियाँ स्पष्ट हैं.  अनन्त स्थितियाँ अनन्त भाव स्वरूप हैं.  अस्तित्व परम भाव होने के कारण भाव ही अपेक्षा है.  इस प्रकार भाव ही अस्ति, स्थिति, विकास, परस्परता, अपेक्षा और निर्वाह है."  - श्री ए नागराज

"Magnificence (of all creation) is but a manifestation of sentiments.  Existence is sentiment of eternity, and for this reason existence is manifested as eternal magnificence.  Each state (activity) of nature has its sentiment.  Infinite units mean infinite states in the form of infinite sentiments.  Existence (eternal presence or indestructibility) is sentiment at the fundamental level, therefore this sentiment itself is manifested as expectation (among units).  In this way, sentiment (of eternal presence) alone is manifested as beings, states, progress, mutuality, expectation and flow of values." - Shree A. Nagraj

3 comments:

Kamlesh Sahu said...

भाव ही अपेक्षा है इस पर और समझना है

Rakesh Gupta said...

हर इकाई में कुछ भाव है - चाहे वह जड़ हो या चैतन्य। हर स्थिति में भाव सम्पूर्णता और पूर्णता को पाने की अपेक्षा में है. जड़ में सम्पूर्णता और चैतन्य में पूर्णता। पूर्णता के लिए यह आशय या अपेक्षा पूर्ण सत्ता में सम्पृक्त होने के कारण हर इकाई में मौजूद है. यह सहअस्तित्व का प्रभाव है. इससे सब कुछ एक प्रयोजन के लिए जुड़ा है.

जैसे हम में भाव होते ही हैं - कभी क्रोध का, कभी उदारता का, कभी ममता का, तो कभी कृपणता का. वैसे ही हर मानव में भाव होते हैं. भाव का स्वरूप जीवों में दूसरा होता है. वहाँ वंश के अनुसार विषय कार्यों के अर्थ में भाव होते हैं. पेड़ पौधों में भी भाव होता है, पोषण या शोषण (सारक या मारक) के अर्थ में. वैसे ही मिट्टी पत्थर में भी भाव होता है, संगठन-विघटन के अर्थ में. भ्रमित मानव के अलावा सारे स्वभाव में स्थित हैं. भ्रमित मानव स्वभाव गति में स्थित नहीं है. लेकिन सह-अस्तित्व प्रभाव के कारण उसमे भी सुख, समाधान, व्यवस्था, पूर्णता की अपेक्षा है, भले ही वह दबी हुई हो.

Kamlesh Sahu said...

धन्यवाद भैया जी