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Thursday, March 31, 2016

शाश्वतीयता का सम्पूर्ण प्रभाव व उद्देश्य

"वैभव ही विभव है, विभव ही भाव है, भाव ही वर्तमान है, वर्तमान ही वैभव है.  अस्तित्व ही सम्पूर्ण भाव है एवं अस्तित्व ही नित्य वर्तमान होने के कारण भाव ही वर्तमान का मौलिक स्वरूप है.  वैभव का तात्पर्य प्रयोजनकारी गति व प्रयोजनपूर्ण गति से है.  प्रयोजन का अर्थ विकास, जागृति पूर्णता और उसकी निरंतरता से है.  अस्तित्व में विकास ही लक्ष्य है और उसकी निरंतरता ही प्रयोजन है.  विभव शाश्वतीयता का सम्पूर्ण प्रभाव व उद्देश्य को स्पष्ट करना ही है." - श्री ए नागराज

"The grandeur (of existence) itself is the display of full potential (by realities of nature), fullness of potential (of realities) itself is value (their role or participation in universal order), (flow of) values (among realities) itself is presence (universal harmony), and presence itself is the grandeur (of existence).  Existence itself is entire value, and because existence itself is the eternal presence - value is presence at the fundamental level.  The grandeur means purposeful activity or activity that results in fruition of purpose.  Purpose means development (progressing to higher state) , perfection in awakening and its continuity.  Development is the inherent goal in existence and purpose is to establish its continuity.  Realization of full potential (as awakened human being) is to clarify the entire effect and objective of permanence (of existence)."


3 comments:

Roshani said...

भैया जी प्रणाम,
"विभव" शब्द ठीक से समझ नहीं आया| कृपया इस पोस्ट को और विस्तृत रूप में समझाइए|
धन्यवाद
रोशनी

Rakesh Gupta said...


उद्भव, विभव और प्रलय - ये तीन चरण हैं किसी भी अवस्था की इकाई के. उद्भव मतलब - पैदा होना और फिर बड़े होना। विभव का मतलब है - अपने पूरे potential को व्यक्त करना। प्रलय मतलब - विरचित हो जाना। जैसे - बीज का अंकुर बनके पौधा बनना उद्भव है. उसका अपने पूरे वैभव के साथ वृक्ष रूप में हो जाना उसका विभव है. और उसका पुनः मिट्टी में मिल जाना प्रलय है.

विभव को मध्यस्थ भी कहते हैं. किसी भी इकाई की परिभाषा उसकी विभव स्थिति के अर्थ में होती है. उद्भव और प्रलय विभव के अर्थ में ही स्पष्ट होते हैं. इसी लिए इस दर्शन को मध्यस्थ दर्शन कहते हैं.

"वैभव ही विभव है" - अर्थात जो कुछ अस्तित्व में परंपरा रूप में हमारे सामने सजा है, वह मध्यस्थ के अर्थ में है. वह अपने पूरे potential या ताकत के साथ व्यक्त है. कुछ रोक नहीं रखा है, कुछ अव्यक्त नहीं है, कुछ रहस्य नहीं है. (भ्रमित मानव को छोड़ के! जिसको अभी अपने विभव की स्थिति को अभी प्राप्त करना शेष है.)

"विभव ही भाव है" - किसी भी इकाई का "भाव" या "मूल्य" उसके बाकी सब के साथ उपयोगिता और पूरकता के रूप में स्पष्ट होता है. अर्थात मध्यस्थ स्थिति में ही इकाई अपने भाव को सिद्ध करती है.

"भाव ही वर्तमान है" - वर्तमान का मतलब है, परंपरा के स्वरूप में होना और रहना। उपयोगिता और पूरकता को सिद्ध करते हुए ही कोई इकाई और अवस्था अपनी परंपरा को बनाये रख सकती है.

"अस्तित्व सम्पूर्ण भाव है..... " - इसका मतलब मूल स्थिति (सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति) ही सारे भावों को व्यक्त करती है. और यही मूल स्थिति अलग-अलग परम्पराओं के रूप में प्रकाशित है. इसलिए जो परम्पराओं के रूप में प्रकाशित है, उसी का भाव (मूल्य) है. इस वाक्य में बताया है - कि तीन स्तर पर अस्तित्व रूपी सत्य है. स्थिति सत्य - सम्पृक्ता के रूप में। वस्तुगत सत्य - भाव के रूप में. और वस्तुस्थिति सत्य - वर्तने के रूप में.

"वैभव का तात्पर्य प्रयोजनकारी गति व प्रयोजनपूर्ण गति से है." - इसका मतलब है जो कुछ भी अस्तित्व में स्थिति-गति है, संसार की सुंदरता है, वह प्रयोजन के अर्थ में है.

"प्रयोजन का अर्थ विकास, जागृति पूर्णता और उसकी निरंतरता से है." - सभी इकाइयों का प्रयोजन धरती पर विकास और जागृति को सिद्ध करना है.

"विभव शाश्वतीयता का सम्पूर्ण प्रभाव व उद्देश्य को स्पष्ट करना ही है" - मध्यस्थ या विभव का स्वरूप प्रकटन के साथ बदलता गया है. विभव का सबसे विकसित स्वरूप जागृत मानव है. जागृत मानव जगत (पदार्थ) के शाश्वत होने के उद्देश्य और उसके प्रभाव को स्पष्ट करता है, दूसरों को समझाता है. ज्ञान अवस्था में पूरे ताकत की स्थिति यही है.




Roshani said...

बहुत ही सुंदर स्पष्टीकरण भैया जी|
आभार