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Tuesday, March 15, 2016

स्वीकृतियां

"अध्ययन क्रम में सहअस्तित्व सहज सत्यता, यथार्थता, वास्तविकता का श्रवण/पठन होता है.  श्रवण के पश्चात अस्तित्व में वस्तु को अर्थ सहित पहचानना होता है.  साथ ही न्याय पूर्वक जीने में निष्ठा पूर्वक अभ्यास भी होता है.  पहचानने के अनन्तर स्वीकृतियां होती हैं.  मूलतः जीवन धर्म सुख, शान्ति, संतोष, आनंद सहज प्रमाण नियम, न्याय, धर्म, सत्य ही है.  ये ही जीवन सहज स्वीकारने योग्य क्रियाएँ हैं.  स्वीकृतियों को अवधारणा के रूप में स्थापित होना पाया जाता है.  सम्पूर्ण अवधारणाएं मौलिकता के रूप में होना पाया जाता है.  मौलिकताएं धर्म और स्वभाव के ही सूत्र हैं.  सभी अवधारणायें अनुभव मूलक विधि से व्यवहार में प्रमाणित होती हैं.  इस तरह से मानवीय परंपरा में स्वीकृतियां जागृति के स्त्रोत हैं.  इन स्वीकृतियों के प्रभाव में अमानवीय मान्यताएं, विचार तिरोहित होने लगते हैं." - श्री ए नागराज

"The Process of Study (of Madhyasth Darshan) involves Listening/Reading about the Absolute, Intrinsic and Evident aspects of Realities in Coexistence.  Upon Listening, the Realities are to be recognized in Existence with their Meaning.  Along with this, one practices living with Justice with dedication.  As a result, one achieves acceptances of realities (in their entirety, and discovers that) the evidence of Happiness, Peace, Contentment and Bliss in Jeevan is in the form of Law (definite conduct), Justice (harmony in human relations), Religion (all round resolution), and Truth (eternal presence).  These Acceptances get established in oneself in the form of Integral View (of Universal Order in Existence).  Integral view is in the form of Fundamentals of Realities.  Fundamentals are but formulations of Religion (Innateness) and Intrinsic nature.  All aspects of Integral View become evident in human behaviour based on Realization.  In this way, Acceptances (of realities) are the Sources of Awakening in a Humane Tradition.  All beliefs and thoughts of Inhuman-ness start dissolving in influence of these acceptances."  - Shree A. Nagraj.

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