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Thursday, February 18, 2016

निश्चित साधना

"साक्षात्कार के लिए निरंतर प्रयत्न की आवश्यकता है.  प्रयत्न करते हुए हमारे विचार, व्यवहार भी उसके अनुकूल होना आवश्यक है.  अपने करने और सोचने में विरोधाभास रहता है तो साक्षात्कार-बोध नहीं होता।

पहले रास्ता ठीक होगा तभी तो गम्यस्थली तक पहुंचेंगे?  रास्ते पर हम चले नहीं और गम्यस्थली मिल जाए, ऐसा नहीं होगा।  हमे यह जांचने की जरूरत है कि क्या हमारा 'करना' हमारे गम्यस्थली तक पहुँचने में अवरोध तो नहीं कर रहा है?

जैसे हम नियम का अध्ययन कर रहे हों और हमारा आचरण नियम के विपरीत हो तो इसमें अंतर्विरोध हो गया.  इस अंतर्विरोध के साथ नियम का साक्षात्कार नहीं होगा।  अध्ययन के साथ स्वयं का शोध चलता है.  अध्ययन एक निश्चित साधना है - समाधान-समृद्धि के अनुकरण के साथ." - श्री ए नागराज

"Direct Perception (of Reality) requires Perseverance.  While making efforts for understanding, our thoughts and behaviour also needs to be aligned with what we are trying to understand.  If thinking and doing are in conflict then direct-perception or integral view wouldn't happen.

First the Path needs to be cleared only then could Destination be reached.  It is not possible to reach Destination without taking steps on the Path.  We need to check whether what we 'do' is blocking our reaching the Destination.

For example - If our Conduct (the way of our living) contradicts Law (of Nature) while we are studying Law, then Direct Perception of Law cannot happen to us having this contradiction.  Study is with self scrutiny.  Study is a Definite Practice - which is with Emulation of living with Resolution and Prosperity." - Shree A. Nagraj.

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