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Saturday, February 13, 2016

सुख

"सुख यदि घटित हुआ तो जीवन में उसकी निरंतरता होती है.  इन्द्रियों से हमें जो सुख भासता है वह सुख नहीं है - अनुकूलता प्रतिकूलता है.  इन्द्रियों में सुख नहीं होता।  जब सुख होता है तो शान्ति, संतोष, आनंद भी होता है.  सुख अनुभव पूर्वक ही है.  सुख चाहिए तो ज्ञानगोचर वस्तुओं को पहचानने की ज़रुरत है.  वास्तव में मानव के जीने में अधिकाँश भाग ज्ञानगोचर है और न्यूनतम भाग इन्द्रियगोचर है.  इसलिए ज्ञानगोचर को पहचानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.  ज्ञानगोचर वस्तुओं को पहचानने के लिए 'सहमति' होना पर्याप्त नहीं है, सहमति के साथ निष्ठा होना अनिवार्य है.  निष्ठा होने से ही अध्ययन प्राथमिकता में आता है.

सुख अर्थात मनः स्वस्थता।  मनः स्वस्थता अर्थात आत्मा के प्रभाव में मन की स्थिति-गति.  भ्रमित स्थिति में मन शरीर के प्रभाव में रहता है." - श्री ए नागराज

"Happiness if occurred then Jeevan would have its Continuity.  The elation that we feel from our Senses is not Happiness - it is mere Conduciveness.  Happiness is not there in the purview of Senses.  When Happiness happens - Peace, Contentment and Bliss also happen.  Happiness is only upon Realization (in Coexistence).  If one wants Happiness, then one needs to Recognize (ascertain) the realities that are Apprehensible.  Most of Human living is Apprehensible and least part is Tangible.  There is no other way (to Happiness) apart from ascertaining the Apprehensible realities.  Being in Agreement for ascertaining the Apprehensible realities alone is not enough.  Along with Agreement, one must have Dedication.  It is only with Dedication that Studying becomes one's Priority.

Happiness means Healthiness of Mind.  Healthiness of Mind means the State and Projection of Mind (mun) to be in Influence of atma (Realization).  Mind remains in the Influence of Body until Illusion." - Shree A. Nagraj 

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