ANNOUNCEMENTS



Friday, November 13, 2015

इन्द्रियगोचर और ज्ञानगोचर


जीवन ज्ञान का धारक-वाहक है.  शरीर जीवन के लिए साधन है,  जीवंत शरीर में संवेदनाएं प्रकट होती हैं.  संवेदनाओं को जीवन ही पहचानता है.  शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध - ये पाँच संवेदनाएं हैं.

जो अस्तित्व में है उसी का ज्ञान होता है.  जीवन स्वीकृतियों (मान्यताओं) के स्वरूप में ज्ञान का "वाहक" है.  अर्थात जीवन में जैसी स्वीकृति रहती है, उसके अनुसार वह जीता है.  अस्तित्व के बारे में कुछ न कुछ स्वीकृति जीवन में रहती ही है, उस स्वीकृति का वह वाहक होता है.  जीवन में सुख की धारणा है, या जीवन सुख का "धारक" है.  जीवन ऐसी वस्तु है जो सुख हेतु ही क्रियाशील है.

जीव-संसार में "शरीर ही जीवन है", ऐसी स्वीकृति रहती है.  इसमें "मैं" अलग से कुछ हूँ और "शरीर" अलग से कुछ है, इसका कोई अता-पता नहीं होता है.  इसको कहा - "शरीर से जीवन तदाकार है" अतः वंश के अनुसार जीवन कार्य करता रहता है.  यहाँ जीवन के इससे अधिक व्यक्त होने की संभावना ही नहीं है.  यह जीव-शरीर की सीमा है.  जीव-शरीर द्वारा वंश-अनुषंगियता से अधिक और कुछ व्यक्त हो नहीं सकता।  मानव जो जीवों से काम करा लेता है, उन कामों को वे जीव सोच-विचार के कर रहे हों, ऐसा नहीं है.  वे अपने वंश को ही यंत्रवत जी रहे होते हैं.  जीव-संसार में "सुख" का प्रमाण नहीं है.  यहाँ "जीने की आशा" विषय कार्यकलाप (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) के स्वरूप में प्रमाणित होती है.

मानव-संसार में समृद्धि-पूर्ण मेधस है.  मानव परंपरा में जीवन अपनी धारणा (सुख) को "वहन" कर सकता है.  मानव में सुख पहले "अच्छा लगना" और "बुरा लगना" के रूप में स्पष्ट होता है.  इन्द्रियों की अनुकूलता में अच्छा लगता है, और उनकी प्रतिकूलता में बुरा लगता है.   इन्द्रियों में सुख की निरंतरता नहीं है, यह सुख के लिए शोध-अनुसंधान का कारण बनता है.  ज्ञान पूर्वक सुख की निरंतरता है, यह प्रस्ताव है.  विषय-ज्ञान और इन्द्रिय-ज्ञान सुख की निरंतरता के लिए पर्याप्त नहीं है.  इससे अतिरिक्त कुछ ज्ञान की आवश्यकता है.

ज्ञान पहले मानव के "मानने" में आता है, फिर "जानने" में आता है.  बिना जाने हुए मानने को हम "आस्था" कहते हैं.  जाने हुए को मानने को हम "विश्वास" कहते हैं.  जो जान लिया और मान भी लिया - उसको "समझ लिया" कहते हैं.

दो संभावनाएं हैं - इन्द्रियों से पहचानी हुई वस्तु समझने के लिए मिलना।  दूसरे, समझी हुई वस्तु इन्द्रियों से पहचानने के लिए मिलना।  दो तरह की वस्तुएं हैं - सत्ता और प्रकृति।  प्रकृति की हर वस्तु रूप-गुण-स्वभाव-धर्म के संयुक्त स्वरूप में हैं.  इसमें से रूप और गुण का कुछ भाग इन्द्रियों से पहचान में आता है, या इन्द्रियगोचर है.  स्वभाव और धर्म इन्द्रियों से पहचान में नहीं आता है, इसलिए उसको ज्ञानगोचर कहते हैं.  सत्ता इन्द्रियों से केवल खाली-स्थली के रूप में दिखती है पर उसका स्वरूप इन्द्रियों से पहचाना नहीं जा सकता, इसलिए सत्ता ज्ञानगोचर है.

ज्ञानगोचर की पहचान जीवन में होने के लिए ज्ञान की बातों की जीवन में स्वीकृति बननी होगी।  उस मान्यता का एक पूरा एक दृष्टिकोण जीवन में बनना होगा, उसके अनुसार अपने जीने का लक्ष्य निश्चित होना होगा।  मानव में कल्पनाशीलता है, तभी यह संभव है.  कल्पना ज्ञान का आरंभिक स्वरूप है.  दर्शन की परिभाषाएं कल्पना को दिशा देती हैं.  शब्द से अर्थ, अर्थ स्वरूप में अस्तित्व में वस्तु की पहचान।  ज्ञानगोचर वस्तु की पहचान होना = साक्षात्कार।  ज्ञानगोचर वस्तु की स्वीकृति होना = बोध.  साक्षात्कार और बोध क्रमशः होता है, जिसके पूर्ण होने पर ज्ञान में अनुभव होता है।  ज्ञान और व्यापक-वस्तु (जो हर परस्परता में खाली स्थली के स्वरूप में दिखती है) में भेद अनुभव पूर्वक समाप्त हो जाता है.  "सत्ता ही ज्ञान है" - यह मानव के अनुभव में आता है.  सत्ता "ज्ञानगोचर" स्वरूप में अध्ययन होता है और "ज्ञान" स्वरूप में अनुभव होता है.

 मध्यस्थ दर्शन का ईश्वर केंद्रित चिंतन से कोई मेल नहीं है.  न ही इसका प्रचलित विज्ञान से कोई मेल है.  इन दोनों में जो अपूर्णता है, उसके विकल्प स्वरूप में यह है.  यह उनको नकारने या उनकी अवहेलना करने की बात नहीं है.  ये दोनों मानव की जागृति-क्रम के सोपान रहे हैं.  इन दोनों का योगदान है, जिसका ठीक-ठीक मूल्यांकन करना आवश्यक है, क्योंकि हम अभी उसी धरातल पर होते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं.  हम जहाँ खड़े हैं, उसको नकार कर कैसे हम अगला कदम ले सकते हैं?

शब्दों से जीवन में मध्यस्थ दर्शन के इस प्रस्ताव का एक खाका तो बन जाता है, लेकिन उतना पर्याप्त नहीं है.  इस प्रस्ताव को स्वत्व बनाने के लिए जीवन द्वारा उस खाके में तदाकार होना शेष रहता है.  तदाकार नहीं हो पाने का कारण है, पूर्ववर्ती किन्ही मान्यताओं या स्वीकृतियों को बनाये रखना।  स्वत्व तब तक नहीं बनता जब तक श्रेष्ठता के प्रति पूरा समर्पण नहीं होता।  यह कोई जबरदस्ती वाली बात नहीं है.  इसमें किसी पर कुछ लादने की कोई बात नहीं है.  ज्ञान की आवश्यकता मानव में है, इसलिए देर-सवेर श्रेष्ठता के प्रति ध्यानाकर्षण और समर्पण होता ही है.  बिना अर्हता के कोई बात प्रमाणित नहीं होती।  अर्हता हासिल करने का एक निश्चित मार्ग है, उस पर चलते हैं तो उस तक पहुँचते ही हैं.  इसमें वातावरण और अध्ययन का महत्त्वपूर्ण योगदान है.  हमारी अभी तक की स्वीकृतियों का भी रोल है.  अध्ययन से स्वीकृतियां बदलती हैं, स्वीकृतियां बदलने से वातावरण बदलता है.  अध्ययन का पूरा होना, स्वीकृतियों का अस्तित्व-सहज होना, और उन स्वीकृतियों के अनुरूप वातावरण तैयार होना - इन तीनों के पूरा होने पर ही यह प्रस्ताव स्वत्व बन सकता है.

- मध्यस्थ दर्शन पर आधारित 

1 comment:

faryal naaz said...

Nice article. This is so much more than I needed! But will all come in use thanks!
Darsen