ANNOUNCEMENTS



Tuesday, November 3, 2015

पद, पदातीत और पदार्थ


सह-अस्तित्व में स्वयंस्फूर्त (self-inspired) प्रकटन (creative emergence) है - और इस प्रकटनक्रम में चार पद या planes हैं, और इन पदों (planes) के बीच तीन संक्रमण (irreversible transition) हैं.  हर पद में अनेक निश्चित यथास्थितियाँ हैं, और हर पद में ह्रास (self-dissolution) और विकास (self-transcendence) प्रक्रिया पूर्वक आवर्तनशीलता का एक स्वरूप है.

पदार्थ (Substance) उसको कहते हैं जो पद के अनुसार अपने अर्थ (meaning) को व्यक्त करे.  मूलतः प्रकृति (matter) ही पदार्थ है, जो प्रकटन के पद के अनुसार गठन (रूप) में भागीदारी करने के साथ साथ स्वभावगुण और प्रयोजन (धर्म) को व्यक्त कर देता है.  पदार्थ इस तरह प्रकृति की इकाइयों के स्वरूप में ही मिलता है.  हर इकाई अपने पद के अनुसार रूप, गुण, स्वभाव और धर्म को वर्तती है.  वर्तमान (presence) या वर्तने (evidencing presence) का मतलब है - होना (being) और रहना (becoming)।    हर पद की हर इकाई में निश्चित क्षमता (वहन क्रिया), योग्यता (प्रकाशन क्रिया) और पात्रता (ग्रहण क्रिया) होती है, जिसको वह ह्रास और विकास प्रक्रिया पूर्वक अर्जित करती है.

चार पद निम्न प्रकार से हैं: -

(१) प्राण पद (Physiological Plane)
(२) भ्रांत पद (Illusional Plane)
(३) देव पद (Trans-personal Plane)
(४) दिव्य पद या पद मुक्ति (Divine Plane)

मध्यस्थ दर्शन ने प्रकटन क्रम में तीन संक्रमण बिन्दुओं (irreversible transition points) को पहचाना।  यह इस दर्शन के अनुसंधान की एक मौलिक उपलब्धि है.

तीन संक्रमण निम्न प्रकार से हैं:

(१) गठन पूर्णता (configuration perfection)
(२) क्रिया पूर्णता (activity perfection)
(३) आचरण पूर्णता (conduct perfection)

संक्रमण सह-अस्तित्व के प्रकटन क्रम में वे पड़ाव हैं - जिनसे गुजरने के बाद वापस जाना नहीं होता।  पहला संक्रमण: गठन-पूर्णता - जड़ से चैतन्य का संक्रमण है.  चैतन्य अपने स्वरूप में एक परमाणु है जिसका गठन तृप्त हो चुका है.  गठन पूर्ण परमाणु को ही जीवन कहा है.  एक बार गठन तृप्त होने के बाद, या परमाणु के चैतन्य बनने के बाद उसका वापस जड़ स्वरूप में आना संभव नहीं है.  दूसरा संक्रमण: क्रिया पूर्णताभ्रम से जागृति का संक्रमण है.  यह मानव परंपरा में होता है.  समझदारी हासिल होने के बाद नासमझी करना संभव नहीं है, यही इस संक्रमण का दृष्ट स्वरूप है.  तीसरा संक्रमण:  आचरण पूर्णता - जागृति से जागृति-पूर्णता का संक्रमण है.  जागृत होने के बाद या समझदारी हासिल होने के बाद, उस समझदारी को अपने जीने के हरेक आयाम में प्रमाणित कर लेना आचरण पूर्णता है.  प्रमाणित करना दूसरे मानवों के साथ और मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ ही होता है.  तीनों संक्रमण पूर्णता की उपलब्धियाँ हैं.  पूर्णता के बाद उसकी निरंतरता होती है.  संक्रमण की कोई अवधि नहीं होती।  इसका मतलब है - संक्रमण से पहले और बाद की स्थितियों का तो प्रमाण मिलता है, पर संक्रमण होने में कोई समय नहीं लगता।  संक्रमण से पहले संक्रमण के लिए प्रवृत्ति है, प्रयास है.  संक्रमण के बाद संक्रमण का प्रमाण ही है.  जैसे - गठन पूर्ण और गठन शील के बीच में "आधा या चौथाई गठन-पूर्ण" स्थिति कोई नहीं है!  विकास है या विकास का क्रम है.  विकास-क्रम गठनशील ही है.  विकास गठन पूर्ण ही है.  भ्रम और जागृति के बीच कोई "थोड़ा भ्रमित, थोड़ा जागृत" स्थिति नहीं है.  जागृति है या जागृति का क्रम है.  जागृति-क्रम "भ्रम की सीमा" में ही है.  जागृति "भ्रम की सीमा" में नहीं है.

पदातीत (Transcendent) व्यापक (Space) को कहा है.  पदातीत इसलिए क्योंकि ये किसी पद में नहीं है, जबकि चारों पद इसी में समाहित हैं.  पदातीत को भी वस्तु कहा है, क्योंकि यह भी वास्तविकता को प्रकाशित करती है.  पदातीत की वास्तविकता पारगामी, पारदर्शी और व्यापक है.  पदातीत या सत्ता को स्थितिपूर्ण भी कहा है - क्योंकि इसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता।  पदातीत या सत्ता स्वयं में कोई गति, कोई तरंग, कोई दबाव नहीं है.  पदातीत इस तरह दबाव विहीन प्रभाव है.  पदातीत का प्रभाव नित्य प्रेरणा रूप में बना रहता है, और अपने पद के अनुसार इकाइयों में उस प्रेरणा की अविभाज्य धारणा होती है,जो धर्म है. 

प्रकृति को स्थितिशील कहा है - क्योंकि प्रकृति की हर क्रिया किसी न किसी स्थिति में होती है, और एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाती रहती है.  प्रकृति क्रियाशील है, इसलिए स्थितिशील भी है और गतिशील भी है.  प्रकटन की हर स्थिति, गति (दबाव और तरंग) के साथ है.  जैसे दो अंश का परमाणु अपने में एक स्थिति है, और उसमें घूर्णन, वर्तुल और कम्पन गति का एक स्वरूप है.  एक पत्थर भी अपने में एक स्थिति है, और उस में भी गति है.  धरती की भी एक स्थिति है और उसका एक गतिपथ है. एक मानव की भी एक स्थिति (भ्रम या जागृति) है और उसकी गति है, उसके व्यक्तित्व स्वरूप में.

प्राण पद (Physiological Plane) में भौतिक-रासायनिक संसार है - जिसको विकास-क्रम की सृष्टि या जड़-संसार भी कहते है.  गठन-शील परमाणुओं से रचित संसार, जिसमें रचना-क्रम में विकास गवाहित हुआ.  परमाणु से मिल कर बने अणु, अणु से मिलकर बनी अणु रचित रचनायें, यौगिक , रस, रसायन, ठोस-तरल-विरल द्रव्य, पुष्टि तत्व, रचना तत्व, प्राण सूत्र, प्राण कोषा, एक कोशीय, द्विकोशीय, बहुकोशीय रचनाएं, पेड़ पौधे, जीव शरीर, अंत में मानव शरीर - ये सब हुई प्राण-पद चक्र की यथास्थितियां।  इनमें एक विकास और ह्रास की आवर्तनशीलता है.  पेड़-पौधे, जीव-शरीर और मानव-शरीर विरचित हो कर (ह्रास प्रक्रिया) भौतिक पदार्थ (खाद आदि) में परिवर्तित हो जाते हैं, और पुनः वे उन्ही रचनाओं के निर्माण लिए (विकास प्रक्रिया) द्रव्य बन जाते हैं.  इस तरह पदार्थ अवस्था और प्राण अवस्था के बीच आवर्तनशीलता के बने चक्र को कहा - प्राण-पद चक्र।  भौतिक क्रिया में अंतिम विकास का स्वरूप हुआ एक धरती।   रासायनिक क्रिया में अंतिम विकास हुआ मानव शरीर। सभी गठन-शील परमाणु भूखे या अजीर्ण श्रेणी में हैं, जो उनमे पायी जाने वाली गठन-तृप्ति की अपेक्षा है.  प्राण-पद इस तरह आगे के चैतन्य संसार और उसकी जागृति के प्रकटन का आधार बनता है.

भ्रांत-पद (Illusional Plane) जीवन और शरीर की संयुक्त अभिव्यक्ति है, जो शरीर को जीवन मान कर जीता हुआ चैतन्य संसार है.  इसमें सभी जीव-जानवर (जीवनी क्रम) और भ्रमित मानव (जागृति क्रम) गण्य हैं.  जीवन एक गठनपूर्ण परमाणु है, जो चैतन्य है और शरीर भौतिक-रासायनिक रचना है, जो जड़ है.  गठन पूर्णता को परिणाम का अमरत्व भी कहा है.  विकसित जीवन अविकसित शरीर के प्रति आसक्त जीवों में यह वंश के अनुसार अक्रूर या क्रूर स्वभाव को प्रकाशित करने के रूप में होता है.  मानव में यह पशु-मानव और राक्षस मानव के स्वरूप में दीनता, हीनता, क्रूरता पूर्वक जीने के रूप में होता है.  जीव भ्रांत-पद में होते हुए भी उनमें भ्रम की पीड़ा नहीं है.  जबकि भ्रांत पद में मानव अपनी स्थिति के प्रति अस्वीकृति साथ अतृप्त जीता है.  तृप्ति को न जानते हुए भी भ्रांत-पद के मानव में तृप्ति की अपेक्षा बनी है.  यही उसमें तृप्ति के लिए शोध और अनुसंधान का कारण बनता है.  यहाँ ह्रास मतलब है - जीव शरीर को चलाने के रूप में जीवन का कार्य करना।  यहाँ विकास का मतलब है - मानव शरीर को चलाने के रूप में जीवन का कार्य करना।  मानव शरीर को चलाना "विकास" इसलिए कहा है क्योंकि मानव परंपरा में ही जीवन जागृति की संभावना है.

"भ्रांत पद" नाम से लगता है कि इस पद में सब कुछ "गलत" है, "अपराधिक" है.   जबकि ऐसा नहीं है.  इसको "भ्रांत-पद" इसलिए कहा है, क्योंकि इस पद में जीवन अपने स्वरूप के बारे में अज्ञात रहता है, और अपने को शरीर ही माने रहता है.  इसी पद में सारा जीव-संसार है जो संतुलन सहज व्यवस्था को प्रमाणित, गवाहित और वर्तमानित किया है.  इसी पद में मानव जाति का मनाकार को साकार करने के लिए सारा प्रयास है और जागृति के लिए सारा प्रयास है.  मानव इतिहास में जंगल युग से लेकर कबीला युग, कबीला युग से ग्राम युग, ग्राम युग से प्रौद्योगिकी युग, और प्रौद्योगिकी युग से सूचना युग उसकी जागृति-क्रम के सोपान हैं.  हर मानव-संतान जागृति-क्रम में ही जन्म लेता है और क्रम से आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और अनुभव में जागृत होता है.  यह अवश्य है, मानव अपनी जागृति सहज नियति के विपरीत जो असफल प्रयास जो किया है और अभी भी कर रहा है, वह भी जागृति-क्रम या भ्रांत-पद में गण्य है.  मध्यस्थ दर्शन सहज अनुसंधान भी मानव-जाति के जागृति-क्रम का ही एक भाग है.  मध्यस्थ दर्शन का शोध और अध्ययन भी जागृति-क्रम का ही एक भाग है.  मानव के नियति के विपरीत प्रयासों में सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता है, पर नियति सम्मत प्रयासों को जागृत मानवों द्वारा आगे का मार्ग-दर्शन करने की आवश्यकता है.

देव पद (Trans-personal Plane) मानव परंपरा में जागृति का स्वरूप है. व्यक्ति में समाधान, परिवार में समाधान-समृद्धि, समाज में समाधान-समृद्धि-अभय और समग्र व्यवस्था के साथ समाधान-समृद्धि-अभय और सह-अस्तित्व।  देव-पद में सोच की दृष्टि न्याय, धर्म और सत्य के अर्थ में हो जाती है और कार्यक्रम उपकार से सम्बद्ध हो जाता है.  यह सोच मैं और मेरा तक सीमित व्यक्तिवादी सोच से गुणात्मक रूप से विकसित है.  यह सर्व-शुभ की मानसिकता है.  इसको मानव-चेतना और देव-चेतना भी कहा है.  क्रिया पूर्णता संक्रमण के बाद मानव दृष्टा पद में स्थित होकर मानवीयता पूर्ण आचरण को प्रमाणित करने के योग्य हो जाता है.  मानव में होने वाली संवेदनाएं अब ज्ञान में अनुभव द्वारा नियंत्रित हो जाती हैं, इसलिए मानव अब अस्तित्व सहज व्यवस्था में भागीदारी करना शुरू कर देता है.  इसी को श्रम का विश्राम कहा है.  प्रमाणित करना क्रम से होता है, क्योंकि यह प्रक्रिया से जुड़ा है, देश-काल से जुड़ा है.  वित्तेषणा, पुत्तेषणा और लोकेषणा के साथ प्रमाणित करने की शुरुआत होती है.  देव-चेतना में लोकेषणा प्रधान जीना होता है, तथा वित्तेषणा और पुत्तेषणा विलय स्वरूप में रहते हैं.  मानव चेतना में श्रेष्ठता की शुरुआत है, तथा देव-चेतना श्रेष्ठतर है.  देव-पद में विकास और ह्रास "श्रेष्ठता" की सीमा में ही है.  दिव्य चेतना श्रेष्ठतम है - जो आचरण पूर्णता का संक्रमण है.

दिव्य पद (Divine Plane) को पद मुक्ति भी कहा है.  क्योंकि यह सारे प्रकटन की गति का गंतव्य है.  यह मानवीयता पूर्ण आचरण के मानव-जीवन के हर आयाम में प्रमाणित होने के उपरान्त है.  इस स्थिति में मानव का सारा कार्यक्रम केवल उपकार ही हो जाता है.  इसका मतलब यह नहीं है, इस स्थिति में मानव संसार के साथ व्यवहार और व्यवसाय नहीं करेगा।  इन आयामों की इससे पहली स्थिति में पूर्ण हो कर उनकी निरंतरता हो चुकी है, उनको बनाये रखने में अब अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं रही, अब मानव का जीना पूरी तरह दूसरों को अपने जैसा बनाने, व्यवस्था में जीने योग्य बनाने, उसकी प्रेरणा देने - इस में स्थापित हो जाता है.

सारे पदों और उनकी यथास्थितियों में एक क्रम है, लघु-मूल्य से गुरु-मूल्य की ओर क्रम है, जिसको अनुक्रम कहा है.  यह अनुक्रम स्पष्ट होना ही सह-अस्तित्व में अध्ययन का उद्देश्य है.  किसी भी स्थिति का मूल्याँकन करने के लिए, स्वयं का मूल्याँकन करने के लिए, और दूसरों का मूल्याँकन करने के लिए यह अनुक्रम स्पष्ट होना अति-आवश्यक है.  पूर्ण स्थिति के आधार (reference) पर ही अपूर्ण स्थितियों का मूल्याँकन संभव है.  एक अपूर्ण स्थिति के आधार पर दूसरी अपूर्ण स्थिति का मूल्याँकन और समीक्षा संभव नहीं है.  गठनपूर्णता (गठन तृप्ति) के आधार पर ही गठनशीलता (भूखे या अजीर्ण परमाणु) का मूल्याँकन है.  जागृति के आधार पर ही भ्रम का मूल्याँकन और समीक्षा है.  न्याय के आधार पर ही अन्याय का मूल्याँकन और समीक्षा है.  धर्म (समाधान) के आधार पर ही अधर्म (समस्या) का मूल्याँकन और समीक्षा है.  सत्य के आधार पर ही असत्य का मूल्याँकन और समीक्षा है.  स्वयं का सही मूल्याँकन नहीं होने के कारण ही हमसे गलतियाँ होती हैं.  स्वयं और संसार का स्पष्ट मूल्याँकन होने के बाद सहीपन की ओर मार्ग प्रशस्त हो जाता है - पहले अनुकरण, फिर अनुसरण, फिर अनुशासन, फिर स्वानुशासन

- मध्यस्थ दर्शन पर आधारित

No comments: