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Friday, October 23, 2015

रूप, गुण, स्वभाव, धर्म


सह-अस्तित्व में हर प्रकटन सहज इकाई रूप-गुण-स्वभाव-धर्म की संयुक्त अभिव्यक्ति है.   हर इकाई के ये चार अविभाज्य आयाम हैं.

रूप = आकार, आयतन, घन

प्रकृति अनेक रूपों में प्रस्तुत है.  ये रूप निश्चित हैं.  किसी भी धरती पर इनका अनुपात भी निश्चित है.  जैसे - धरती के वातावरण में oxygen, nitrogen, hydrogen आदि का अनुपात निश्चित है.  यह अनुपात उतना है जिससे धरती पर अगली अवस्थाओं के प्रकटन के लिए अनुकूलता बनी रहे.  किसी भी धरती पर परमाणुओं की प्रजातियाँ वही हैं, उन सब का गठन एक ही है.  जीवन परमाणु भी एक रूप है.  

वनस्पतियाँ भी अनेक रूपों में हैं.  कुछ ऊँचे वृक्षों के रूप में, तो कुछ लताओं, झाड़ियों के रूप में, तो कुछ घास और काई के रूप में.  

जीव संसार अनेक रूपों में हैं.  शाकाहारी जीवों का रूप एक प्रकार का है तो मांसाहारी जीवों का रूप दूसरे प्रकार का है.  शाकाहारी जीव अनुपात में अधिक हैं.  

मानव अपने आप में एक रूप है.  पुरुष और स्त्री अलग अलग रूपों में हैं.  प्राण-अवस्था से लिंग की शुरुआत हो जाती है.  कुछ वनस्पतियों, स्वेदजों और जीवों में नर रूप मादा की तुलना में अधिक हैं तो कुछ में मादा अधिक हैं.   जिनके बीच प्रजनन हो सकता है, उनको एक जाति कहा.  रूप के अनुसार जाति है.  सर्वाधिक जातियाँ पदार्थ-अवस्था में, उससे कम प्राण-अवस्था में, उससे कम जीव-अवस्था में, और अंत में ज्ञान-अवस्था के मानव में केवल एक जाति है.  मानव ने काल्पनिक रूप में अभी अपने को अनेक रंग, नस्लों, जातियों का मान रखा है.  मात्र रूप के अध्ययन से पता चल जाता है कि मानव जाति एक है.   

गुण = परस्परता में प्रभाव 

हर इकाई का अपना एक प्रभाव-क्षेत्र है.  उस प्रभाव क्षेत्र में दूसरी इकाई आने पर उन दोनों इकाइयों के बीच निर्वाह होता है, या लेन-देन होता है.  प्रभाव को ही गुण कहते हैं.  इकाइयाँ मिल जुल के एक प्रभाव क्षेत्र भी बनाती हैं.  जैसे इस धरती पर अनेक इकाइयां मिल के इस धरती का एक संयुक्त प्रभाव-क्षेत्र बनायी हैं, जो इस धरती का वातावरण है.  हम सब इस धरती के वातावरण के अंतर्गत हैं.  इकाइयाँ मिल कर कैसे काम करती हैं यह उसके गुण की अभिव्यक्ति है.  यह हर स्तर पर है.  

पानी का भाप बनना, बादलों का बनना, उनका पहाड़ों पर बरसना, फिर पानी का नदी-नालों में बह कर समुद्र तक पहुंचना - ये सब पदार्थ-अवस्था में भौतिक गुणों का प्रकाशन है.  

वनस्पतियों का एक दूसरे पर प्रभाव डालना, एक अनुपात में उगना, उनका जीव और मानव शरीरों में आहार रूप में जाना, और निष्काषित मल-मूत्र का पुनः वनस्पतियों को प्रभावित करना - यह सब प्राण-अवस्था में रासायनिक गुणों का प्रकाशन है.  

जीव-जानवरों का अपने-अपने जातियों के साथ समुदाय रूप में रहना, विषय क्रियाओं को करना, मिलकर शिकार करना, विहार करना - यह सब जीवन और शरीर के संयुक्त गुणों का प्रकाशन है, जो शरीर प्रधान है. 

मानव का अन्य मानवों के साथ रहने का स्वरूप, परिवार में, समाज में, उत्पादन कार्य में, सभा में, आदि ये सब मानव के गुण है.

स्वभाव = उस अवस्था की व्यवस्था में भागीदारी

इकाई में अपनी अवस्था की अन्य इकाइयों के प्रति जो भाव बना रहता है, उसको स्वभाव कहते हैं.  स्वभाव के आधार पर अपने से पीछे वाली अवस्था के प्रति पूरकता और अपने से आगे वाली अवस्था के लिए उपयोगिता होती है.  स्वभाव गुणों का अंतरंग पक्ष है.  स्वभाव के आधार पर इकाई में व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में पहचान बनी रहती है, जो फिर गुणों के स्वरूप में व्यक्त होती है. अपनी अवस्था की दूसरी इकाइयों के प्रति स्व का भाव स्वभाव है.  स्वभाव इस तरह स्व का ही विस्तार है, self-projection या collective-identity या shared-worldspace है.  

पहले इसको मानव के सन्दर्भ में देखें, हम अभी भी किन्ही लोगों को अपना मानते हैं, उनको पहचानते हैं, उनके साथ हमारा कुछ लेन-देन या निर्वाह होता है.  जिनको अपना नहीं मानते उनको पहचानते नहीं हैं, उनके साथ हम कोई लेन-देन या निर्वाह करते नहीं हैं.  अपना मानने के मूल में यह रहता है, जो मेरे जैसे हैं - वे मेरे अपने हैं. तो जैसा मैं स्वयं को मानता हूँ, वैसा मेरा दूसरों के प्रति स्वभाव रहता है.  मानव चेतना में सभी मानवों को एक जाति - एक धर्म के रूप में जानना-मानना रहता है, इसलिए मानव-चेतना में स्वभाव धीरता-वीरता-उदारता का रहता है.  जीव-चेतना में मानव को एक जाति - एक धर्म के रूप में जाना नहीं रहता है, और कुछ काल्पनिक अपने-पराये की दीवारें रहती हैं, चाहे सम्प्रदाय के नाम पर हो, देश के नाम पर हो, प्रांत के नाम पर हो, अमीरी-गरीबी के नाम पर हो, नर-नारी के नाम पर हो.  

जीवों में भी स्वभाव होता है.  जो पालतु पशु रखते हैं, उनको इसका अच्छे से अनुमान होगा।  अगली अवस्था में पिछली अवस्था का स्वभाव समाया रहता है, इसलिए हमारा जीवों के साथ भी एक shared worldspace है.  हम उनके साथ अपने सम्बन्ध को इसी आधार पर पहचान पाते हैं.  जीव एक दूसरे के स्वभाव को भी पहचानते हैं, इनका भी एक shared worldspace है.  उसी आधार पर गायें साथ-साथ रहती हैं, गाय और शेर साथ-साथ नहीं रहते, भेड़िये साथ में शिकार करते हैं, आदि.  भ्रमित मानव में स्वभाव के प्रति जागृति का स्वरूप जीवों से बहुत भिन्न नहीं है.  इसी लिए भ्रमित मानव को जीव-चेतना में जीता हुआ कहा है.  जीव जीव-चेतना में रहते हुए व्यवस्था में भागीदारी यांत्रिक रूप में करते हैं, इनमें कर्ता पद होता नहीं है.  मानव जीव-चेतना में रहते तक अव्यवस्था में रहता है और अव्यवस्था फैलाता है.  मानव में कर्म करने की स्वतंत्रता है, इसलिए मानव कर्ता पद में है.  मानव अपनी इच्छा से अपने स्वभाव को शिक्षा ग्रहण करके बदल सकता है.  

वनस्पतियों और प्राण-अवस्था का भी स्वभाव होता है.  वनस्पतियों में परस्पर अनुकूलता की पहचान, स्व-पुष्टि के अर्थ में होती है, इसी क्रम में वे सारक-मारक स्वभाव को प्रकाशित करती हैं.  हमारा शरीर भी प्राण-अवस्था की इकाई है, उसका भी एक स्वभाव है, तभी तो प्राण-कोषा से रचित वस्तुओँ को आहार रूप में स्वीकार पाता है.  प्राण-कोषा मूलतः पेड़ पौधों, जीव-शरीरों और मानव-शरीरों में एक ही जैसी हैं.  इन सभी प्राण-अवस्था की रचनाओं में पुष्टि के अर्थ में भाव बना है, जो इनका स्वभाव है.  

पदार्थ संसार में भी स्वभाव होता है.  यहाँ "स्व" मात्र बने रहने या अविनाशिता के रूप में है, इसी अर्थ में दूसरी पदार्थ इकाइयों के प्रति भाव संगठन-विघटन (जुड़ने या बिखरने) का रहता है.  बहुत जुड़ना बिखरने का कारण बन जाता है, और बहुत बिखरना जुड़ने का कारण बन जाता है.  व्यवस्था के अर्थ में, अग्रिम विकास के अर्थ में, पदार्थ-अवस्था में एक अनुपात में जुड़ना (संगठन) या बिखरना (विघटन) होता है.  

धर्म = उस अवस्था के होने का प्रयोजन, जिससे उसको अलग नहीं किया जा सकता

प्रकृति में हर अवस्था का व्यवस्था के अर्थ में प्रयोजन है, जिससे उसको अलग नहीं किया जा सकता - यह हर इकाई में उसकी अटूट-निष्ठा के रूप में बना रहता है.  इसको पहले मानव में समझना होगा।  मानव का धर्म सुख है.  हर मानव का हर प्रयास सुख की अपेक्षा में होता है.  सुख की अपेक्षा में या (जागृत होने पर) सुख के प्रमाण में मानव सारा काम करता है.  इससे मानव को अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए यही मानव का 'स्व', self या identity है.  मैं सुखी हूँ या दुखी हूँ इसका मुझ ही को पता चलता है, यह self-sense मुझ में हर समय सोते-जागते उठते-बैठते बना ही रहता है.  ऐसा हरेक मानव में है.  

जीवों में शरीर स्व है.  इस स्व (शरीर) को बने रहना है, जीव का हर प्रयास इस आशा में होता है.  जीने की आशा पूरी हो रही है या नहीं, यह जीव को पता चलता है, जो उसका self-sense है.  

वनस्पतियों या प्राण-अवस्था की इकाइयों में "स्व" रसायन रचना के रूप में है.  इस रचना को बढ़ना है, वनस्पति रचना का सारा क्रियाकलाप (जैसे सूरज की ओर झुकना, पानी की ओर जड़ों का बढ़ना, अपने अनुकूल द्रव्यों को ग्रहण करना, श्वसन-प्रश्वसन की गति) इसी अर्थ में है.  यही वनस्पति का स्व है, पुष्टि की अनुकूलता या प्रतिकूलता (मोंटाना या सूखना) का वनस्पति को पता चलता है.  वनस्पतियों में self-sense इस स्वरूप में है.  
पदार्थ संसार में अपने बने रहने के रूप में स्व है.  पदार्थ का कितना भी सूक्ष्म टुकड़ा हो जाए, फिर भी वह नष्ट नहीं होता।  अपने गठन को बनाये रखने के रूप में पदार्थ का सारा क्रियाकलाप है.  पदार्थ का मूल रूप परमाणु है.  परमाणु अपने गठन को बनाये रखता है.  वातावरण के दबाव के प्रतिक्रिया में अंशों का मध्य के करीब आना या दूर जाना पदार्थ के बने रहने के अर्थ में होता है.  परमाणुओं का अणु स्वरूप में हो जाना, यौगिक स्वरूप में हो जाना, भौतिक रचना, रासायनिक रचना स्वरूप में हो जाना, रचनाओं का विरचित हो जाना - इन सब के  मूल में अपनी अविनाशिता की धारणा रहती है.  गठन के लिए वातावरण की अनुकूलता  या प्रतिकूलता का पदार्थ को पता चलता है, यह पदार्थ में self-sense है.  

साम्य सत्ता में सम्पृक्तता के कारण हर अवस्था की हर इकाई धर्म या प्रयोजन के साथ है.  प्रयोजन है - विकास और जागृति।  इसी अर्थ में किसी भी धरती पर अवस्थाओं का क्रमशः प्रकटन होता है.  धर्म विकास और जागृति के अर्थ में इकाई के श्रम की दिशा है.  

प्रकटन क्रम में किसी भी धरती पर ये चारों - रूप, गुण, स्वभाव. धर्म - समानांतर रूप से विकसित होते हैं.  ये चारों सत्य हैं.  अविभाज्य हैं.  इनमे से एक भी पक्ष को भुलावा दे कर प्रकृति का अध्ययन पूरा नहीं होता।  प्रकटन की अगली अवस्था में पिछली अवस्था के रूप, गुण, स्वभाव और धर्म विलय स्वरूप में रहते हैं.  

रूप और गुण इकाई के हैं या individual हैं.  जबकि स्वभाव और धर्म उस इकाई की पूरी अवस्था में साम्य या common हैं.  पूरी पदार्थ-अवस्था का स्वभाव संगठन-विघटन है.  जबकि अनेक तरह के रूप वाले पत्थर हैं, मणियाँ हैं - जिनके अलग-अलग गुण हैं.  पूरी ज्ञान-अवस्था (सभी मानवों) का धर्म सुख है.  जबकि हर मानव का रूप भिन्न है, उसका व्यक्तित्व अपने आप में अलग है.  तो प्रकृति में individuality भी है और commonality भी.  Commonality समझ में आने पर individuality के साथ निर्वाह करने का आधार मिलता है. 

- मध्यस्थ दर्शन पर आधारित 

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