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Monday, October 19, 2015

होना-रहना


"होना", जो कुछ भी अस्तित्व में है, नियति विधि से है.  अस्तित्व में स्वयंस्फूर्त प्रकटन विधि से समस्त "होना" हुआ है.  अपने होने की अडिग-स्वीकृति हर अवस्था की हर इकाई में है.  होना चार अवस्थाओं के रूप में है, और हर अवस्था में अपने होने की स्वीकृति का स्वरूप प्रकटन के साथ बदलता गया है.  होने की इस अडिग स्वीकृति ( जिससे जिसका विलगीकरण न हो सके )  या धारणा को ही धर्म कहा है.  रूप और धर्म मिला कर "होना" है.   धर्म को 'स्व' या identity या self भी कहते हैं.   रूप होने का बहिरंग (exterior) आयाम है, जबकि धर्म (स्व) होने का अंतरंग (interior) आयाम है.  मानव के होने को देखें तो हर मानव अपने में एक रूप है, और हर मानव सुख-धर्मी है.  इसको हम स्वयं में जांच सकते हैं.  मैं जो हूँ उसका एक बाहरी पक्ष है - जो मेरी शरीर-रचना के रूप में है, और एक मेरा आतंरिक पक्ष भी है, जो मुझसे कभी छूटता नहीं है - जो है, मेरी सुख की चाहत, जिस पर मेरा सारा कार्य-कलाप आधारित है - यह मेरा धर्म (स्व) है, यही प्रयोजन भी है.  धर्म या प्रयोजन कोई आस्था या मनोकामना नहीं है.  यदि मानव है तो उसका धर्म या प्रयोजन सुख है, चाहे वह उसको माने या न माने, जाने या न जाने.  यह यह अनुमान में आ ही सकता है कि ऐसे ही एक जीव के होने का भी एक बाहरी पक्ष (अंडज, पिण्डज, उद्भिज रूप) है और एक आतंरिक पक्ष (जीने की आशा धर्म) है.  वैसे ही, एक झाड़ का भी धर्म (अस्तित्व सहित पुष्टि) है, एक पत्थर का भी धर्म (अस्तित्व) है.  धर्म "कुछ" वास्तविकता है, हर इकाई का होता है, यह पहले तर्क में स्पष्ट होना है, फिर अपने आप में समझ आना है, फिर सभी अवस्थाओं का धर्म एक-साथ अनुभव में आना है.

इकाई का मतलब है - पदार्थ का गठन जो अपने में एक व्यवस्था हो और समग्र व्यवस्था में भागीदार हो, या निश्चित आचरण को प्रस्तुत करे.  परमाणु व्यवस्था की मूल इकाई है.  अनेक प्रकार की परमाणु इकाइयाँ हैं - जो परमाणु-अंशों से मिलकर बने निश्चित गठन हैं.  जीवन चैतन्य इकाई है, जो अपने स्वरूप में एक गठनपूर्ण परमाणु है, जो अणु-बंधन और भार-बंधन से मुक्त है, अमर है, और चैतन्य बल और शक्तियों को (जीव और मानव शरीर के माध्यम से) प्रकाशित करता है.  जड़ परमाणुओं से मिलकर बने अणु.  अनेक प्रकार की अणु इकाइयाँ.  इसी क्रम में अणुओं से मिलकर बनी भौतिक-रासायनिक रचना रूपी इकाई।  जीव इकाई (जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में)।  मानव इकाई (जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में)।  मानव परिवार इकाई।  परिवार समूह इकाई।  आदि.

"होने" के निश्चित सोपान हैं, और उनका एक निश्चित क्रम है.  इस क्रम को ही अनुक्रम या नियति-क्रम कहते हैं.  मानव, हम सब, इस अनुक्रम या नियति-क्रम की एक कड़ी हैं.  हमसे पीछे कुछ कड़ियाँ हैं, हमसे आगे कुछ कड़ियाँ हैं.

इकाइयाँ अनेक हैं, इसलिए उनकी परस्परता होगी ही.  एक इकाई भी तो अनेक से मिल कर बनी है.  इकाई का अन्य इकाइयों के साथ "रहना" होता है.  हर "होने" के स्वरूप के साथ एक "रहने" का स्वरूप है.  "होना" और "रहना" अविभाज्य है.  रहने के भी दो आयाम हैं - बहिरंग और अंतरंग।  बहिरंग आयाम को कहा - गुण, जो है इकाई का अपनी परस्परता पर प्रभाव।  अंतरंग आयाम को कहा - स्वभाव, जो है इकाई की मौलिकता।  हर इकाई में जो भाव बना रहता है, उसके अनुसार वह परस्परता पाने पर व्यक्त हो जाती है - वही उसका स्वभाव है.  स्वभाव के आधार पर ही इकाई अन्य इकाइयों को पहचानती है, कि कौन मेरे "स्व" जैसे हैं, यह पहचान उसमें बनी रहती है, फिर उस पहचान के अनुसार निर्वाह करती है, या अपने गुणों को व्यक्त करती है.  जितनी दूर तक एक इकाई के साथ दूसरी इकाइयाँ निर्वाह कर सकती हैं, उसको उस इकाई का प्रभाव-क्षेत्र कहते हैं.  अनेक इकाइयों का मिल जुल कर जो प्रभाव-क्षेत्र बनता है, उसको वातावरण कहते हैं.  जैसे - इस धरती का भी एक वातावरण है.  स्वभाव और गुण मिला कर "रहना" होता है.  स्वभाव को "त्व" भी कहते हैं.  इसको अपने आप में जाँच सकते हैं.  मेरा एक व्यक्तित्व है - जो मेरे खान-पान, रहन-सहन और व्यवहार का स्वरूप है, वह मेरा बहिरंग (exterior) पक्ष है.  मेरे व्यक्तित्व के मूल में हर समय मुझ में संसार के प्रति कुछ भाव ("अच्छा" या "बुरा") बना रहता है, और मैं जब किसी दूसरे से मिलता हूँ तो उस भाव के आधार पर मेरा उस परस्परता में निर्वाह तय हो जाता है.  जो भाव मुझ में (interior) संसार के प्रति बना रहता है, जिसके अनुरूप मैं दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों को स्वीकारे रहता हूँ, वही मेरा स्वभाव है.  जैसा मैं व्यक्त होता हूँ, भागीदारी करता हूँ, वही मेरा गुण है.  मेरे स्वभाव-गुण से मेरी संतुष्टि-असंतुष्टि का एक स्वरूप है.  मेरे स्वभाव-गुण से दूसरों की संतुष्टि-असंतुष्टि का भी एक स्वरूप है.  उसी तरह दूसरों के स्वभाव-गुण से मेरी संतुष्टि-असंतुष्टि का भी एक स्वरूप है.  दोनों पक्षों में व्यवहार पूर्वक संतुष्टि की भी एक स्थिति हो सकती है - उसको न्याय कहा.  उस स्थिति में हर मानव के प्रति स्वजन का भाव होगा, ऐसा अनुमान किया जा सकता है.  उसी स्थिति को मानवीय स्वभाव कहा है - जो धीरता, वीरता, उदारता स्वरूप में परिभाषित है.  इससे पहले सभी मानवों को स्वजन के रूप में पहचानना नहीं बन पाता, और अपने-पराये की दीवारें बनी ही रहती हैं.  इस स्थिति को अमानवीय स्वभाव कहा है - जो दीनता, हीनता, क्रूरता के रूप में परिभाषित है.  यह कल्पना में आ ही सकता है कि ऐसे ही एक जीव के रहने का भी एक बाहरी पक्ष (जलचर, नभचर, थलचर) है और एक आतंरिक पक्ष (अक्रूर-क्रूर स्वभाव) है.  वैसे ही, एक झाड़ का भी स्वभाव (सारक-मारक स्वभाव) है और गुण हैं, एक पत्थर का भी स्वभाव (संगठन-विघटन स्वभाव) है और गुण हैं.  मानवीयता के स्वभाव और गुण के आधार (reference) से ही अमानवीयता और उससे पहले मनुष्येत्तर प्रकृति के स्वभाव-गुणों का ठीक-ठीक अध्ययन हो सकता है.


मनुष्येत्तर प्रकृति में "होने" के साथ "रहने" का स्वरूप निश्चित है.   मानव को कैसे रहना है, यह उसको सीखना-समझना पड़ता है.  मानव का "होना" प्राकृतिक विधि से हो चुका है, पर मानव का "रहना" निश्चित नहीं हो पाया है.  इसका मतलब मानव का स्वभाव और गुण का स्वरूप निश्चित नहीं हो पाया है.   अभी मानव जाति में झगडे का मूल कारण यही है.  हर अवस्था में "होना" नियति विधि से निश्चित होता है और "रहना" अनुषंगियता पूर्वक निश्चित होता है.  अनुषंगियता का मतलब है - परंपरा का स्वरूप, कैसे नयी पीढ़ी पिछली पीढ़ी का अनुकरण करती है.  हर अवस्था अनुषंगियता विधि से "परंपरा" स्वरूप में "रहती" है.  पदार्थ-अवस्था में परिणाम-अनुषंगियता है, प्राण-अवस्था में बीज-अनुषंगियता है, जीव-अवस्था में वंश-अनुषंगियता है.  मानव में संस्कार-अनुषंगियता है.  अर्थात मानव का "रहना" शिक्षा द्वारा ही सुनिश्चित होता है.  और किसी अवस्था को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है. प्रचलित शिक्षा मानव को मानवीय स्वरूप में कैसे "रहना" है, यह समझा नहीं पाती है.  प्रचलित शिक्षा में संस्कार है ही नहीं।  मानव के "निश्चित आचरण" या मानवीयता पूर्ण आचरण  के स्वरूप को शिक्षा में आने की आवश्यकता है.

मनुष्येत्तर प्रकृति की इकाइयों में निर्णय पूर्वक "रहने" की बात नहीं है, उनमे प्रकटन के साथ होने-रहने का स्वरूप निश्चित है.  मानव में निर्णय पूर्वक "रहने" की बात है.  मानव को, हम सब को, अपने बाहरी स्वरूप (रूप और गुण) के साथ अपने आतंरिक स्वरूप (स्वभाव और धर्म) के प्रति जागृत होने की आवश्यकता है.  अपने आतंरिक स्वरूप के प्रति स्पष्ट होने के साथ-साथ हम मनुष्येत्तर प्रकृति के आतंरिक स्वरूप के प्रति भी स्पष्ट होते हैं.  पहले पूर्ण (जागृत मानव) के प्रति स्पष्ट होंगे, फिर पूर्ण के पीछे की कड़ियों  (भ्रमित मानव, जीव अवस्था, प्राण अवस्था, पदार्थ अवस्था) के बारे में स्पष्ट होंगे।  इस प्रकार अध्ययन करने से सारी प्रकृति आतंरिक और बाहरी व्यवस्था है, यह प्रकृति प्रयोजनशील है, इसमें विकास और जागृति की दिशा है, यह बोध हो जाता है.  व्यवस्था में बोध होने पर आत्म-बोध और साम्य सत्ता में अनुभव होता है.  जो अस्तित्व में प्रकटन की उपलब्धि है.  यह अनुभव हमारे फिर सारे जीने के कार्यकलाप का आधार या मूल बन जाता है, जो फिर पीछे नहीं जा सकता.    इस तरह हमारा स्वभाव ज्ञान-अवस्था की धारणा के अनुरूप होकर सुनिश्चित हो जाता है, जिससे हमारा व्यक्तित्व या गुण भी मानवीय हो जाता है.  इसी को "चेतना विकास" या "जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमण" कहा है.  मानव-चेतना को जीने में प्रमाणित करना हर मानव की सहज अपेक्षा है, जिसके लिए मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है.


- मध्यस्थ दर्शन पर आधारित 

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