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Monday, April 13, 2015

मानवीय आहार

मानव क्या खाए? - इस बात का कैसे निश्चयन हो?   इसको लेकर अधिकाँश रूप में निम्न पाँच बातें ही सुनने को मिलती हैं.

(१) जो अच्छा लगता हो, वही खाओ!  (रुचि)

(२) जहाँ जो मिलता हो, वही खाओ! (परिस्थिति)

(३) जो आपके शरीर स्वास्थ्य के लिए अच्छा हो, वही खाओ! (हित)

(४) जो आप खरीद सकते हो, वही खाओ! (लाभ)

(५) जो आपके धर्म में मानते हों, वही खाओ!  (आस्थावादी रूढ़ि)


आहार को लेकर मानव-जाति अभी एकमत नहीं है.  दो तरीके की आहार पद्दतियाँ प्रचलन में हैं - शाकाहार और मांसाहार।  शाक-भाजी, फल आदि शाकाहार हैं तथा जीव-जानवरों को मारके उनका माँस खाना मांसाहार है. कुछ धार्मिक मान्यताओं में एक तरह का मांस खाना वैध है, दूसरी तरह का मांस खाना अवैध है.  जैसे - कुछ हिन्दू सम्प्रदाय बकरे का माँस खाने को वैध मानते हैं, यहां तक कि उसे अपने देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी चढ़ाते हैं, लेकिन गाय का वध करना या उसका मांस खाना निषेध या पाप मानते हैं.  मुसलमान लोग सूअर का मांस खाना निषेध या हराम मानते हैं, हलाल या वैध आहार के बारे में कुछ पद्दति बताते हैं.  फिर शाकाहार में भी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ को खाना वैध है, कुछ को खाना अवैध है.  जैसे - जैनी लोग प्याज-लहसुन का सेवन निषेध मानते हैं.  कुछ लोग अंडा खाना ठीक मानते हैं, कुछ नहीं मानते.  कुछ दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करना निषेध मानते हैं, कुछ उसको आहार का आवश्यक भाग मानते हैं.  कुछ धर्म शराब पीने को वैध मानते हैं तो कुछ उसको अवैध मानते हैं. 

जनवरी २०१५ अनुभव शिविर में बाबा जी के उद्बोधन और उसके बाद लोगों में चर्चा का विषय यही था. 

मानव ज्ञान-अवस्था की इकाई है और उसके जीने (व्यक्तित्व) के सभी आयामों का निर्धारण ज्ञान के आधार पर ही होता है.  जिसको भी वह ज्ञान मानता हो!  लेकिन ज्ञान मानने से ज्यादा की बात है.  ज्ञान जानने में आता है, फिर जीने में आता है.  बिना जाने, या अनुभव किये ज्ञान केवल मानने और तर्क की सीमा में रह जाता है.  ऐसे जीने को जीव-चेतना में जीना कहते हैं.  केवल सह-अस्तित्व ज्ञान, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही मानव के जानने या अनुभव में आता है.  और कोई रहस्य या तकनीक बोध या अनुभव की वस्तु नहीं बनता।  यह ज्ञान जो मानव के अनुभव में आता है, वह उसके विचार, व्यवहार और व्यवसाय में परावर्तित होता है.  ऐसे जीने को मानव-चेतना कहते हैं.  इस ज्ञान से मानव के एक निश्चित आचरण का स्वरूप बन जाता है, जो अस्तित्व सहज व्यवस्था के तद्रूप होता है.  यही लोकव्यापीकरण हो कर अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था के स्वरूप में बन जाता है. 

मानव के निश्चित आचरण का एक आयाम निश्चित आहार भी है.  जीव-चेतना की सीमा में मानव अपने आहार का निश्चयन रुचि, परिस्थिति, स्वास्थ्य, लाभ या मान्यता (रूढ़ि) के आधार पर करने जाता है तो उससे परस्पर-विरोध ही निकलता है.  मानव चेतना में विधि और निषेध का सही सही सीमांकन हो जाता है.  मानव के लिए शाकाहार-दुग्धपान वैध है, मांसाहार-मद्यपान अवैध (निषेध या अपराध) है और असन्तुलनकारी है.

शाकाहार और माँसाहार में अंतर

पदार्थ-अवस्था की वस्तुओं का रासायनिक वैभव से संपन्न होने के उपरान्त प्राणकोषा का प्रकटन हुआ.  सभी अन्न-वनस्पतियों, जीव-शरीर और मानव-शरीर प्राण-कोषाओं से ही बने हैं.  सभी प्राण-कोषाएं मूलतः एक ही स्वरूप और द्रव्य की हैं.  ऐसा सोचने पर लगता है शाकाहार और माँसाहार में कोई अंतर ही नहीं है!  चाहे गाजर-मूली खाओ, या मछली खाओ, या गाय को मार के खाओ, या आदमी को मार के खाओ - सब एक ही दर्जे का है!  प्रचलित विज्ञान की सोच से ऐसा ही निकलता है.  लेकिन शाक बिम्ब और जीव-शरीर व मानव-शरीर के विनियोजन (प्रयोजन के अर्थ में नियोजन) में भिन्नता है.  शाक बिम्ब का विनियोजन है - पदार्थ-अवस्था के लिए पूरक होना तथा जीवों व मानव के लिए उपयोगी होना।  जीव-शरीर और मानव-शरीर का विनियोजन है - जीवन के लिए पूरक होना।  जीव-शरीर जीवन द्वारा जीने की आशा को व्यक्त करने के लिए साधन है.  मानव-शरीर जीवन द्वारा ज्ञान को व्यक्त करने के लिए साधन है.  मानव जीव-शरीर के इस विनियोजन में बल पूर्वक हस्तक्षेप कर के माँसाहार करे तो असंतुलन होना स्वाभाविक है.  इसके विपरीत माँसाहारी जीव जो दूसरे जीवों को मार के खाते हैं, उनके ऐसे रहने से संतुलन ही होता है.  मानव द्वारा जीवों का अनुकरण करना नियति विरोधी या भ्रम है.  भ्रमित मानव के लिए जागृत मानव ही अनुकरणीय है, ताकि वह स्वयं जागृत हो सके.  जागृत मानव प्रकृति की सहज और क्रम-बद्ध व्यवस्था को समझते हुए, उसके संरक्षण की जिम्मेदारी का वहन करता है.

मनुष्येत्तर प्रकृति से मानव का सम्बन्ध

मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ मानव का सम्बन्ध है.  मानव ने अभी तक मनुष्येत्तर प्रकृति को अधिकांशतः अपने भोग की वस्तु माना है.  मानव मनुष्येत्तर प्रकृति से अधिक विकसित है, इसलिए उसे मनुष्येत्तर प्रकृति का उपयोग करने का अधिकार है.  भ्रम वश मानव इनका दुरूपयोग और शोषण करता है. 

मानव द्वारा मनुष्येत्तर प्रकृति का उपयोग करना वैध है.  मानव का जीव-जानवरों का उपयोग करना वैध है.  जैसे - गाय पालना और उसके दूध का उपयोग करना, घोड़े को सामान ढोने के लिए उपयोग करना  आदि.  मानव को जीवों को दंड देने का भी अधिकार है.  जैसे - जब जानवर खेती को नुक्सान करें तो उनको खदेड़ कर खेत से बाहर करना वैध है.  हिंसक पशुओं का उत्पात बढ़ने पर उसकी समुचित रोकथाम का उपाय करना मानव की आवश्यकता  है और यह वैध है.  लेकिन मानव की जीवों के प्रति पूरकता है.  जीव-अवस्था एक शरीर-प्रधान अभिव्यक्ति है, जिसमे जीवन शरीर व्यवस्था या वंश के अनुरूप स्वयं स्फूर्त कार्य करता है.  मानव उनकी वंश परंपरा को बनाये रखते हुए उनका उपयोग करे, उनके संरक्षण की जिम्मेदारी ले, जीवन के विनियोजन में हस्तक्षेप न करे.

मानव शरीर रचना शाकाहारी है

शाकाहारी जीवों की आँते लम्बी होती हैं, जबकि माँसाहारी जीवों की आँते छोटी होती हैं.  शाकाहारी जीवों के नाख़ून और दांतों की बनावट और माँसाहारी जीवों के नाखून और दाँतों की बनावट में अंतर होता है.  शाकाहारी जीव होठ से पानी पीते हैं, जबकि माँसाहारी जीव जीभ से पानी पीते हैं.  शाकाहारी जीवों की लार क्षारीय होती है, जबकि माँसाहारी जीवों की लार अम्लीय होती है. इन चारों मापदंडों के आधार पर देखें तो पता चलता है कि मानव शरीर रचना शाकाहारी है. 

मानवीय आहार और संविधान

मानव के जीने (या आचरण) में क्या वैध है और क्या निषेध है इसको सूत्रित करने का काम संविधान का है.  संविधान राष्ट्रीय चरित्र की सूत्र-व्याख्या करने के लिए है.  आहार किसी भी देश के नागरिक के जीने का एक आयाम है, और संविधान का इस बारे में दखल जायज है।  लेकिन मान्यता (रूढ़ि) के आधार पर यदि वैध-निषेध बताने जाते हैं, तो वह वाद-विवाद में चला जाता है और उसका कोई सर्व-सम्मत निष्कर्ष निकलता नहीं है.   यदि ज्ञान या अनुभव के आधार पर वैध-निषेध बताने जाते हैं, तो सब एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं.

संविधान में शाकाहार को वैध और माँसाहार को अवैध घोषित किया जा सकता है.  माँसाहार करने वालों को शाकाहार का महत्त्व समझाया जा सकता है, उनको शाकाहार में परिवर्तन की प्रेरणा दी जा सकती है. शाकाहार विषय पर जनचर्चा पूर्वक सर्व-सम्मति, फिर सर्व-स्वीकृति पाने की आवश्यकता है, फिर परंपरा में सदा-सदा के लिए अपनाने की आवश्यकता है. 

अभी संविधान इस बारे में भी मौन है कि बीड़ी-तम्बाकू, नशा करना वैध है या अवैध।  सरकार इनका व्यापार करना वैध मानती है.  इन व्यसनो के व्यवसायों और इन व्यसनों को करने वालों से प्राप्त टैक्स से सरकारी काम-काज चलता है.  अभी संविधान क्या आहार या सेवन वैध है और क्या अवैध, इसके प्रति अनजान बना है.  क्या इस संविधान के अनुसार जीना हितकर होगा, न्याय मिलना तो दूर रहा?  यह भारत देश की ही कमजोरी नहीं है, सब देशों का हाल बेहाल है.   फिर भी शाकाहार को अपनाने में किसी भी देश के संविधान को आज की स्थिति में भी आपत्ति नहीं है. 

आहार और संस्कृति

आहार का संस्कृति से गहरा सम्बन्ध है.  किस त्यौहार या उत्सव पर क्या बनाएंगे, किस ऋतु में क्या खाएंगे - यह सांस्कृतिक मुद्दा है.  संस्कृति को परिवार और समाज वहन करता है.  मानवीयता पर आधारित सार्वभौम संस्कृति में आहार विषय पर भी आगे शोध होता ही रहेगा।

सभी को शाकाहार मिल सकता है

यदि सब माँसाहारी शाकाहारी हो गए तो इतना अनाज-फल-सब्जियाँ कहाँ से आएगा?  माँसाहार से गरीब को पोषण मिल रहा है, वह फल कैसे खरीदेगा?  ये प्रश्न बेबुनियाद नहीं हैं.  शाकाहार पर मानव जाति यदि परिवर्तन को अपनाती है तो उसको योजना-बद्ध तरीके से ही क्रियान्वयन करना होगा। 

पहली बात, शाकाहार समझ पर आधारित हो न कि मान्यता पर.  शिक्षा में शाकाहार के महत्त्व पर बात होनी होगी।  प्रचलित शिक्षा में माँसाहार को अधिक पौष्टिक बताया जाता है. 

प्रचार माध्यमों में माँस और अंडे के लिए ललचाया जाता है.  जनचर्चा में शाकाहार के महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए प्रचार माध्यमों को आगे आने की आवश्यकता है.  इसके लिए आवश्यक शोध और सर्वेक्षण करने की आवश्यकता है.  एक किलो माँस प्राप्त करने के लिए वह जीव कितना शाक खाता है, उसको भी तो गिनना होगा।  यदि माँस के कारखानो और मांस के लिए पालने के बाड़ों के स्थान पर फलों के पेड़ लगें, खेती होने लगे तो उससे खाद्य उत्पादन बढ़ेगा ही.   सभी मानवों को शाकाहार मिल सकता है, इसकी अस्तित्व में प्राकृतिक व्यवस्था है. 

जीवों का वध बंद करने से असंतुलन नहीं होगा

 मानव के धरती पर प्रकट होने से पहले जीव-संसार और वनस्पति संसार संतुलित ही था.  मानव ने जीवों को पालतू बना कर या जंगली जीवों का शिकार करके उनका माँस खाना शुरू किया।  यदि मानव जीवों को मारना छोड़ कर उनको जीने देते हुए जीना शुरू कर देता है, तो उससे असंतुलन नहीं होगा।  इसके विपरीत अभी जो जानवरों को मांस की फैक्ट्री मान के कर रहे हैं, उससे असंतुलन हो रहा है.  जैसे - गाय को ऐसे इंजेक्शन देते हैं जिससे वह बिना जने ही दूध देने लगे.  गाय के वंश परंपरा में संकरीकरण से छेड़-छाड़ करते हैं, जिससे ज्यादा दूध मिले और बाद में ज्यादा मांस मिले।  यह गलत काम है, अमानवीय है, करने योग्य नहीं है.

मूल मुद्दा है - मानव का जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होना। 

मानव-चेतना में मानव का आहार शाकाहार ही है.  जीव चेतना में जीते हुए मानव का आहार निश्चित नहीं है.

मानव-चेतना को अनुसरण, अनुकरण और अध्ययन पूर्वक हम अपना सकते हैं. 

मानव चेतना में जीने का डिज़ाइन जीव चेतना में जीने के डिज़ाइन से भिन्न है. 

अध्ययन करने वाला अपने जीने (व्यक्तित्व) में पहले आहार, फिर विहार, फिर व्यवहार में सोच-विचार करके निर्णय पूर्वक बदलाव लाता है. 

शाकाहार "सही" है और माँसाहार "गलत" है - जब तक हम इस निर्णय पर स्वयं नहीं पहुँचते हैं, हम सही के लिए स्थायी बदलाव को स्वयं के लिए ला नहीं सकते। 

कोई समझदार व्यक्ति माँसाहार नहीं कर सकता। 

जीवन विद्या के संपर्क में आये अनेक लोग जो पहले माँसाहार करते थे, शाकाहार में परिवर्तित हो गए. उनकी गवाही को सुन सकते हैं.

- मध्यस्थ दर्शन के अध्ययन क्रम में 

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