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Monday, March 2, 2015

Imagination and Knowledge


Human being has the faculty of imagining.  This imagining process (kalpanasheelta) is equally present in the child who is born today and it is also there in the old man who is going to die tomorrow.  It is with imagination that human being tries to know or become aware of realities around and about them.  Imagining builds presumptions about realities.  We all have presumptions about ourselves, about this world and about how we can become happy.  We have inherited and built these presumptions or worldviews over time, using our faculty of imagining.    

We are continuously generating ideas using our imagination and exercising choice for materializing those ideas. 

The presence of imagining process in us humans makes us qualitatively different from animals.  Animals are also conscious beings like humans, but their conscious function is tied to their specie (bodily design) as hope to live on.  Animals only hope to live, while humans hope to live with happiness. 

This “hope to live with happiness” is the driving force for imagining process in human being.  Imagining process in human being is seeking its own fulfillment.  We generate and materialize ideas in expectation of happiness.  We seek knowledge using our imagination in expectation of happiness. 

It is with this tool of imagining process that we, the humans, set out on a quest for knowledge from the moment we first came into being on this Earth.
- based on Madhyasth Darshan

कल्पनाशीलता और मानव

मानव के पास कल्पना करने का अधिकार है.  यह कल्पनाशीलता आज पैदा हुए बच्चे से लेकर कल मरने वाले बूढ़े में समान रूप से मौजूद है.  कल्पनाशीलता द्वारा मानव अपनी और अपने आस पास की वास्तविकताओं के बारे में जानने या उनके बारे में सजग होने का प्रयास करता है.  कल्पना करने से वास्तविकताओं के अनुमान बनते हैं.  हम सभी के पास अपने बारे में, इस संसार के बारे में और कैसे सुखी हो जाएँ - इसको लेकर अनुमान बने हैं.  कल्पनाशीलता द्वारा ये अनुमान या वैश्विक दृष्टिकोण हमने लम्बे समय में बनाये हैं या ये हमको बिरासत में मिले हैं. 

कल्पनाशीलता द्वारा हम निरंतर मनाकार बना रहे हैं और चयन करते हुए उनको साकार भी कर रहे हैं.

कल्पनाशीलता हमको जीवों से गुणात्मक रूप से भिन्न बना देती है.  जीव भी मानव जैसे चैतन्य हैं, लेकिन उनकी चैतन्य क्रियाएँ जीने की आशा के स्वरूप में वंशानुगत कार्यकलाप से सम्बद्ध और सीमित रहता है.  जीवों में केवल जीने की आशा है, जबकि मानव में सुख से जीने की आशा है. 

सुख से जीने की आशा के अर्थ में मानव में कल्पनाशीलता काम करती रहती है.   मानव में कल्पनाशीलता अपने स्वयं की तृप्ति तलाश रही है.  हम सुख की आशा में ही मनाकार बनाते हैं और उनको साकार करते हैं.  हम ज्ञान को सुख की अपेक्षा में अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग से खोजते हैं.

कल्पनाशीलता के औजार के साथ ही मानव ज्ञान की तलाश में निकल पड़ा, जिस क्षण वह इस धरती पर सर्वप्रथम अवतरित हुआ तब से!

- मध्यस्थ दर्शन पर आधारित 

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