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Sunday, March 15, 2015

स्वराज व्यवस्था

स्वराज की बात हमारे देश में आजादी से पहले से चल रही है.  "हिन्द स्वराज" और उसमें "ग्राम स्वराज" की परिकल्पना गाँधी जी ने प्रस्तुत की थी.  उसके बाद भी कई लोगों ने स्वराज के लिए आवाज उठाई।  इस दशक में आम आदमी पार्टी ने भी स्वराज के लिए बात की.  स्वराज की अपेक्षा जन-मानस में है - ऐसा मान सकते हैं.   स्वराज होता क्या है और कैसे आएगा - इसके लिए लोगों के अलग अलग मत रहे हैं.

स्वराज के लिए एक निश्चित समझ, निश्चित विचारधारा और निश्चित कार्यक्रम की आवश्यकता है, जो आदर्शवादी परंपरा गत दर्शनों और विचारधाराओं पर टिक नहीं सकती।  आदर्शवादी सोच समुदायवाद और रहस्य में जा कर अंत होती है.  भौतिकवादी सोच में तो स्वराज की अपेक्षा भी नहीं दिखती।  अभी तक के स्वराज के प्रयासों को आदर्शवादी विचारधारा पर टिकाने की असफल कोशिश रही है - चाहे वह गांधी जी हों या अरविन्द केजरीवाल।  नयी राज्य नीति, नयी अर्थ नीति, नयी धर्म नीति, नयी शिक्षा नीति, नयी सोच - ऐसा कोई मजबूत आधार या दर्शन उनकी बातों में दिखता नहीं है.  एक निश्चित समझ, निश्चित विचारधारा और निश्चित कार्यक्रम के अभाव में ये प्रयास थोड़ी देर उत्साह से साथ चलते दिखते हैं, फिर बुरी तरह आपस में लड़ते-झगड़ते दिखते हैं.  जिन समस्याओं को सुलझाने निकले थे, उनमें खुद उलझते दिखते हैं.  कुछ लोग "कुछ नहीं हो सकता", ऐसा कह कर निराश और विरक्त दिखते हैं.

मध्यस्थ दर्शन स्वराज के लिए एक निश्चित समझ, निश्चित विचारधारा और निश्चित कार्यक्रम को प्रस्तुत करता है - जो सम्पूर्ण मानवजाति अध्ययन पूर्वक अपना सकता है. 

(१) मध्यस्थ दर्शन के अनुसार "स्वराज" का क्या स्वरूप है?
(२) उस स्वराज को लाने की क्या विधि होगी?

यह लेख उपरोक्त दो मुद्दों पर कुछ चर्चा के लिए है। 

मध्यस्थ दर्शन के अनुसार "स्वराज"  अस्तित्व सहज सार्वभौम व्यवस्था में मानव के जीने का स्वरूप है.  अस्तित्व सहज से अर्थ है - जो प्राकृतिक हो.  जो स्वयं स्फूर्त हो.  जो नियति सहज हो.  जो रहस्य और शोषण से मुक्त हो.  जो वास्तविकता की समझ पर आधारित हो.  जो सभी स्थानो और सभी कालों में वर्तने के योग्य हो.

स्वराज का तात्विक अर्थ है - स्वयं का वैभव।  या जीवन का वैभव।  जीवन का वैभव या उसकी स्वयं-स्फूर्त अभिव्यक्ति ज्ञान के आधार पर, या अनुभव मूलक विधि से मानव-चेतना, देव-चेतना, दिव्य-चेतना रूप में होती है.  स्वराज के लिए मानव में एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है.  यह मौलिक बदलाव जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होने के रूप में है.  जीव-चेतना की सीमा में स्वराज हो नहीं सकता, चाहे कुछ कर लो! 

शासन नहीं व्यवस्था

शासन और व्यवस्था में भेद को समझने की आवश्यकता है.  शासन होता है - बल पूर्वक या डंडे के जोर पर अपनी बात मनवाना।  शासन के लिए शासक चाहिए।  शासन की शक्ति शासक में केंद्रित रहती है.  शासक किसी लिखित या अलिखित संविधान को अपना आदर्श मान सकता है और अपनी सुविधा अनुसार या अवसर को पा कर उसका उल्लंघन भी कर सकता है.   शासक मंत्रणा करने के लिए मंत्रियों को निर्धारित कर सकता है. उनको शासन के विभाग सौंप सकता है. 

शासन विधि से स्वराज हो नहीं सकता।  शासन शोषण से मुक्त नहीं है.  शासक विचारक नहीं हो सकता।

स्वराज स्वयं स्फूर्त जीने का स्वरूप है.  मानव के स्वयं स्फूर्त जीने के लिए उसका ज्ञान-संपन्न होना आवश्यक है.  ज्ञान संपन्न होना = सह-अस्तित्व में अनुभव संपन्न होना।  ज्ञान संपन्न होने पर मानव को अपने परिवार,समाज, राष्ट्र और अंतर्राष्ट्र के स्तरों पर कर्तव्यों और दायित्वों का बोध होता है.  उसके लिए अपने तन-मन-धन का समर्पण करना होता है.  व्यवस्था में भागीदारी प्रतिफल की अपेक्षा से नहीं होती।  नौकरी विधि से व्यवस्था में भागीदारी नहीं हो सकती।  जिस परिवार को जितनी दूर तक व्यवस्था में भागीदारी करनी है, उसके लिए उसको जितने धन की आवश्यकता है - उसको उपार्जित करने का काम उस परिवार को स्वयं करने की आवश्यकता है.  समाज से दान-चंदा इकट्ठा करके व्यवस्था में भागीदारी नहीं हो सकती। 

आदर्शवादी विधि में ऐसा सोचा गया था कि जो लोग समाज-सेवा करेंगे उनके परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी समाज लेगा।  वह तरीका बुरी तरह असफल हो चुका है.  आदर्शवादी विधि से व्यवस्था हो नहीं सकती, न व्यवस्था में भागीदारी हो सकती है।  भौतिकवादी विधि तो घोषित रूप से संघर्ष का समर्थक है.  संघर्ष के फल में व्यवस्था नहीं मिल सकती। 

परिवार मूलक

स्वराज व्यवस्था "परिवार मूलक" ही हो सकती है.  मानवीय व्यवस्था की मूल इकाई परिवार ही है.  परिवार अपने में एक व्यवस्था है जिसमें न्याय की शुरुआत है, उत्पादन की शुरुआत है, शिक्षा की शुरुआत है.  परिवार में ही जन्म होता है.  परिवार इसलिए एक प्राकृतिक व्यवस्था है.  परिवार के समझदार लोग मिलकर अपना एक "संयुक्त आचरण" प्रस्तुत करते हैं - जिससे अग्रिम व्यवस्था में उस परिवार की भागीदारी का स्वरूप निकलता है.  परिवार को छोड़ कर कोई व्यवस्था में भागीदारी का मतलब नहीं  है.  दूसरे, यदि परिवार समझदार नहीं है तो उसके व्यवस्था में भागीदारी करने का कोई आधार बनेगा नहीं।  नासमझ परिवार में क्लेश होना स्वाभाविक है.  क्लेश ग्रस्त परिवार व्यवस्था में भागीदारी कर नहीं सकता।  परिवार में एक व्यक्ति भी यदि समझदार हो (अनुभव संपन्न हो) तो वह परिवार अनुकरण विधि से स्वराज व्यवस्था में भागीदारी कर सकता है. 

दस सोपानीय

मध्यस्थ दर्शन के अनुसार "दस सोपानीय परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था" का स्वरूप निकलता है.  परिवार समूह से लेकर विश्व परिवार तक १० सोपानों को पहचाना गया है.  हर स्तर पर १० लोगों से मिल कर एक गठन.  १० व्यक्ति मिलके १ परिवार, फिर १० परिवार मिल के १ परिवार समूह, १० परिवार समूह मिल कर १ ग्राम या मोहल्ला, १० ग्राम मिलके १ ग्राम-समूह, १० ग्राम-समूह मिलके १ क्षेत्र, १० क्षेत्र मिलके १ मंडल, १० मंडल मिल के १ मंडल समूह, १० मंडल समूह मिल के १ मुख्य राज्य, १० मुख्य राज्य मिल के १ प्रधान राज्य, १० प्रधान राज्य मिलके १ विश्व राज्य। 


स्वराज की बात परिवार से शुरू होती है और विश्व-परिवार तक जाती है. स्वराज केवल ग्राम स्तर की बात नहीं है. अपने घर-परिवार में स्वराज व्यवस्था का मूल रूप प्रमाणित होता है.  घर-परिवार में स्वराज व्यवस्था न हो तो सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी की नहीं जा सकती।


धर्म और राज्य

वर्तमान समय में धर्म "समुदाय" रूप में  है.  जैसे हिन्दू समुदाय, मुसलमान समुदाय, ईसाई समुदाय।  फिर इन समुदायों के भी अलग-अलग खंड हैं, खण्डों के भी खंड हैं.  ये धर्म या समुदाय "मान्यता" और "आस्था" के रूप में है तथा इनमें "करो, न करो" के उपदेश हैं.  ऐसे में सार्वभौम मूल्यों और सार्वभौम संस्कृति को पाया नहीं जा सकता।  आस्था तर्क सम्मत नहीं है, इसलिए धर्म-समुदाय और उनके नेता लोगों का आज के समय मार्ग-दर्शन करने में सर्वथा असमर्थ हैं.  धर्म-नेताओं को पतित होते देख के उन पर से जनता का विश्वास उठ गया है. 

अभी राज्य "शासन" के रूप में है.  ऐसे में राज्य अधिक से अधिक जन-सुविधा (बिजली-पानी-सड़क) और अलग अलग मान्यताओं में बँटे विभिन्न समुदायों के बीच सहिष्णुता के लिए डंडा बजाने का काम कर सकता है - पर उससे सार्वभौमता और सर्व-शुभ का कोई स्वरूप निकलता नहीं है.   राज्य चाहे राजा विधि से हो या सभा विधि से - दोनों भृष्टाचार से ग्रसित होते देखे गए.  अभी के राज-नेताओं पर से जनता का विश्वास उठ गया है. 

धर्म और राज्य मिलके परंपरा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है.  आज आदमी इन दोनों पक्षों का विकल्प तलाश रहा है.  क्योंकि इनको नकारने से भी काम चल नहीं रहा है और इनको सकारना भी बन नहीं रहा है.

मध्यस्थ दर्शन द्वारा प्रस्तावित स्वराज व्यवस्था के भी दो पक्ष हैं - धर्म और राज्य। संस्कृति-सभ्यता के लिए धर्म-नीति है. विधि-व्यवस्था के लिए राज्य-नीति है. धर्म-नीति तन-मन-धन के सदुपयोग के लिए है. राज्य-नीति तन-मन-धन की सुरक्षा के लिए है. राज्य और धर्म दोनों की एकसूत्रता सह-अस्तित्व की समझ से संभव है.

हर सोपान पर धर्म-व्यवस्था और राज्य-व्यवस्था का एक स्वरूप है.  व्यवस्था के कुछ निर्णय परिवार के स्तर पर लिए जा सकते हैं, तो कुछ ग्राम के स्तर पर, तो कुछ मुख्य राज्य स्तर पर, तो कुछ विश्व राज्य स्तर पर. हर सोपान पर न्याय और व्यवहार का स्वरूप प्रस्तावित है.

राज्य-व्यवस्था के पाँच आयाम हैं: -

१. शिक्षा-संस्कार व्यवस्था
२. न्याय-सुरक्षा व्यवस्था
३. स्वास्थ्य-संयम व्यवस्था
४. उत्पादन कार्य व्यवस्था
५. विनिमय कोष व्यवस्था

हर सोपान पर राज्य व्यवस्था के पाँचों आयामों को क्रियान्वित करने के लिए पाँच समितियाँ हैं.  जैसे - शिक्षा-संस्कार समिति, न्याय-सुरक्षा समिति आदि.

हर सोपान पर धर्म व्यवस्था में आवश्यक मूल्यों की पहचान है और स्वीकृति है.  कुल ३० मूल्यों की बात है.  ९ स्थापित मूल्य, ९ शिष्ट मूल्य,  २  वस्तु मूल्य, ६ मानव मूल्य, ४ जीवन मूल्य। 

राज्य और धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.  हर मानव राज्य व्यवस्था और धर्म व्यवस्था दोनों का धारक-वाहक है.  जिन मूल्यों का निर्वाह धर्म व्यवस्था में है, उन्ही मूल्यों के अर्थ में भागीदारी राज्य व्यवस्था में है. 

दंड और पुरस्कार का स्वरूप

वर्तमान में जो राज्य द्वारा दंड विधान बने हैं, और उनको लागू करने की जो विधियां हैं - वे गलती करने वाले के साथ सम्बन्ध को नहीं मानते.  इसीलिए वे काम करते नहीं हैं.  "दंड देने का काम राज्य का है - समाज का नहीं!"  ऐसा बोलके समाज की व्यवस्था में भागीदारी को नकार दिया है.  दूसरे - जहाँ समाज ऐसे दंड लेने के फैसले चोरी-छिपे खुद लेलेता है (जैसे खाप पंचायत), उससे भी कोई सुधार होता नहीं है.  

गलती (अवैध) क्या है और सही (वैध) क्या है - इसमें अभी राज्य और समाज एक-मत नहीं हैं.  जैसे - ब्याज लेने को राज्य वैध मानता है, पर मुसलमान समाज ब्याज लेने को अवैध मानता है।  पर-नारी/पर-पुरुष सम्बन्ध को राज्य अवैध नहीं मानता, पर लगभग सभी समाज ऐसे संबंधों को अवैध मानते है.  मांसाहार को राज्य वैध मानता है, पर जैन समाज मांसाहार को अवैध मानता है. 

तो दो बातें हुई - पहला, गलती और सही का नीर-क्षीर न्याय कैसे हो?  दूसरा - गलती के सुधार की क्या व्यवस्था हो?

गलत और सही का निर्णय ले पाना आवश्यक है, तभी सही पर चला जा सकता है.  गलती को गलत कहना और सही को सही कहना आवश्यक है, नहीं तो हम गलती को ही बढ़ावा दे रहे हैं.  गलत और सही में भेद स्पष्ट होना ही समझदारी है.  जाने बिना मानने में टकराहट हो सकती है, जानने के आधार पर मानने में टकराहट हो नहीं सकती।

समझदारी से पहले आदमी गलती नहीं करे, ऐसा संभव नहीं है. समझदारी के बाद आदमी गलती करे, यह भी संभव नहीं है.

सभी के समझदार होने तक व्यवस्था के पाँचों आयामों में गलती करने वाले रहेंगे ही. उनके सुधार के लिए समाज जिम्मेदारी लेगा। जैसे परिवार में कोई बच्चा गलती करता है तो बड़े भाई या माँ उसके काम पर स्वयं स्फूर्त रूप में निगरानी करने लगते हैं. उसको प्यार पुचकार से लेकर डाँट फटकार से सुधारने का प्रयास करते हैं. ऐसे में बच्चे के साथ सम्बन्ध का सूत्र बना रहता है, उसके प्रति घृणा की बात होती ही नहीं है. बच्चे में भी सुधरने की चाहत और अपने बड़ों की अपेक्षाओं को पूरा करने की चाहत बनी ही रहती है. बिना सम्बन्ध के सूत्र के न तो प्यार-पुचकार काम करता है, न डाँट-फटकार!  

स्वराज व्यवस्था में हर सोपान पर समाज द्वारा गलती करने वाले के सुधार का एक निश्चित तौर-तरीका होगा।  इस बात को लेकर साधन भाई (अमरकंटक) ने बिलासपुर जेल में कैदियों के साथ एक प्रयोग किया, उसके बहुत अच्छे परिणाम आये.  उस प्रयोग के बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे! 

व्यवस्था में जैसे गलती के सुधार का प्रावधान है, वैसे ही सही को प्रोत्साहन देने का भी प्रावधान है. 

व्यवस्था में श्रेष्ठता का सम्मान होगा।  श्रेष्ठ व्यक्ति को राज्य द्वारा पुरस्कार और परिवार-समाज में पारितोष देने की बात होगी।  पुरस्कार और पारितोष स्वधन हैं, और श्रेष्ठ व्यक्ति को यशस्वी बनाने के लिए और उसको और अच्छा करने के लिए प्रेरणा देने के लिए हैं.  साथ ही जन-सामान्य को ऐसे लोगों से ही आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिलेगी।  वर्तमान में श्रेष्ठ कौन है, इसको पहचानने का कोई निश्चित आधार ही नहीं है.  यश मानव के लिए एक सार्थक चाहत है,  ऐसा आज के समय में स्पष्ट नहीं है. 

व्यापार नहीं विनिमय

स्वराज में आवर्तनशील अर्थ व्यवस्था होगी।  यह व्यापार और नौकरी से बिलकुल भिन्न बात है.   व्यापार और नौकरी के माध्यम से ही अभी शोषण और झूठ के सारे तौर-तरीके बने हैं.  इन दोनों के विकल्प में आवर्तन शील अर्थ व्यवस्था प्रतिपादित है. 

व्यापार के स्थान पर श्रम मूल्य के आधार पर विनिमय की बात रहेगी।  दरिद्रता की मानसिकता के साथ व्यवस्था हो नहीं सकती।  समाधान-समृद्धि संपन्न परिवार ही व्यवस्था में भागीदारी कर सकता है.  परिवार से ही उत्पादन-कार्य और विनिमय की शुरुआत होगी।  परिवार में व्यय के लिए आवश्यकताओं का निर्धारण होगा।  आवश्यकताओं का निर्धारण होना = उनका सीमित होना।  जीव-चेतना में हम सीमा को तय ही नहीं कर पाते। मानव चेतना में सीमित आवश्यकताओं से अधिक उपार्जन करने के लिए, या आय के लिए श्रम-नियोजन पूर्वक उत्पादन या सेवा कार्य परिवार-जनों द्वारा होगा।  "व्यय के लिए आय" सिद्धांत पर चलेंगे।  स्वधन से शरीर पोषण, संरक्षण और समाज-गति में भागीदारी होगी।  स्त्रोत को बनाये रखते हुए आहार, आवास, अलंकार, दूर-संचार और ऊर्जा-संतुलन सम्बन्धी मानव उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन होगा।  ज्यादा लोग उत्पादन करेंगे।  उत्पादित वस्तुओं का विनिमय होगा।  ज्ञान-व्यापार और धर्म-व्यापार निषेध होगा।  मतलब, सिखाने-समझाने के लिए प्रतिफल नहीं लिया जाएगा। 

वर्तमान अर्थ व्यवस्था पैसे के आधार पर है.  पैसा वस्तु का प्रतीक है, प्राप्ति नहीं है.  आवर्तनशील अर्थ व्यवस्था प्रतीक मूल्य पर आधारित न होकर मानव के श्रम पर आधारित होगी।   इस व्यवस्था में छोटे उद्योगों और बड़े उद्योगों दोनों का स्थान होगा।

निर्वाचन विधि

इस प्रस्तावित व्यवस्था के स्वरूप में निर्वाचन बिना खर्चे के किया जा सकेगा।  वोट और नोट के गठबंधन से मुक्ति मिलेगी।  परिवार के १० लोग मिलके अपने में से १ व्यक्ति को आगे भेजेंगे - अग्रिम व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए.  हर परिवार अपने में स्वायत्त रहेगा।  हर सोपान पर १० में से १ का निर्वाचन स्वयंस्फूर्त होगा।  धरती के ७०० करोड़ लोग कुछ ही मिनटों में दसों सोपानों की व्यवस्था को स्थापित कर सकते हैं.  इसके लिए कोई लाउडस्पीकर लगाने, प्रचार करने  की आवश्यकता नहीं रहेगी।  व्यवस्था में भागीदारी के लिए जो लोग पहले निर्वाचित हुए, वही आगे भी निर्वाचित हों - ऐसा आवश्यक नहीं है.  जैसे पहले छोटा भाई परिवार से परिवार-समूह में भागीदारी के लिए गया था, अगली बार हो सकता है बड़ा भाई आगे आये.  यह आवश्यकता अनुसार और स्वयंस्फूर्त होगा।

स्वराज और संविधान

अभी हर देश का अपना संविधान है.  भारत में एक संविधान है, पाकिस्तान में दूसरा, इंग्लैंड में तीसरा, अमेरिका में चौथा!  इस तरह इस धरती पर आज सैंकड़ों संविधान चल रहे हैं.  हर देश अपने संविधान को लागू करने के लिए डंडा बजाने में व्यस्त है.  हर देश का संविधान मूलतः ऐसा कह रहा है - "गलती को गलती से रोको!  अपराध को अपराध से रोको!  युद्ध को युद्ध से रोको!"  हर देश का संविधान असफल है.  मानव जाति की कितनी ऊर्जा इसमें लगी हुई है, इसकी कोई गणना नहीं है!  मध्यस्थ दर्शन के द्वारा प्रस्तावित स्वराज मानवीय संविधान के अनुसार होगा।  यह संविधान मानवीयता पूर्ण आचरण (मूल्य, चरित्र और नैतिकता) के जीने में प्रमाणों के आधार पर होगा। 

मानवीय संविधान की अपेक्षा सभी देशों के संविधानों में है, लेकिन उसकी सूत्र-व्याख्या नहीं है.  इसका मतलब है - कोई संविधान ऐसा नहीं कह रहा है कि गलती करो!  लेकिन सही क्या है, उसका प्रमाण वह नहीं बता रहा है. लेकिन यह कह रहा है - यदि कोई यह गलती करे तो उसको ये दंड दो!   ऐसे दंड देना दूसरी गलती हो जाती है.  उससे पहली गलती रुकती नहीं है.  कोई संविधान यह नहीं कह रहा कि अपराध करो!  लेकिन उसमें लिखा है किस अपराध के लिए कितना और कैसे मारना है, प्रताड़ित करना है!  उसमें यह नहीं लिखा कि न्याय क्या है, और न्याय का प्रमाण क्या होगा?  कोई संविधान यह नहीं कह रहा कि युद्ध करो!  लेकिन युद्ध करने के अधिकार किसके पास हैं, परमाणु बम डालने के अधिकार कैसे इस्तेमाल करना है - इस सबके बारे में उसमें वर्णन है.  उसमें यह नहीं लिखा है कि शान्ति क्या है, और शान्ति का प्रमाण क्या होगा?

सार रूप में - अभी के सभी राज्यों के संविधान गलती, अपराध और युद्ध को रोकने की असफल कोशिश करते रहते हैं.  इनके पास सत्य, न्याय और शान्ति के लिए कोई सूत्र-व्याख्या और प्रमाण नहीं है. 

मध्यस्थ दर्शन द्वारा प्रस्तावित मानवीय संविधान किसी भी देश के संविधान के विरोध में नहीं है.  यह सभी देशों के संविधानों के लिए प्रेरणा है.  यह पूरी मानव जाति के लिए Universal Civil Code का प्रस्ताव है.  मानवीय संविधान पर आचरण करना या मानवीयता पूर्ण आचरण किसी देश के संविधान की नजर में अपराधिक नहीं है.  हम स्वधन, स्व-नारी/स्व-पुरुष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार करें तो हमें कोई जेल में नहीं डाल देगा!   मानवीयता पूर्ण आचरण का विरोध करना किसी से बनेगा नहीं!  यही कारण है, इस संविधान के अनुसार हम आज भी जी सकते हैं.  आगे पीढ़ी के लिए इस तरह जीने की और परिस्थितियां निर्माण कर सकते हैं. 

स्वराज को लाने की विधि और योजना  

स्वराज व्यवस्था को लाने के लिए शिक्षा विधि है.  मानव ज्ञान-अवस्था की इकाई है.  मानव ज्ञान के आधार पर ही अपनी मौलिकता के अनुरूप स्वयं व्यवस्थित हो सकता है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी कर सकता है.

जहां हम हैं और जहां हमको पहुंचना है - उनके बीच सेतु का नाम "योजना" है.  लक्ष्य और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजना बनाई जाती है.  स्वराज व्यवस्था को लाने के लिए निम्न तीन योजनाएं हैं: -

(१) जीवन विद्या योजना
(२) शिक्षा का मानवीयकरण योजना
(३) ग्राम स्वराज योजना

जीवन विद्या योजना लोक शिक्षा के अर्थ में है.  यह मध्यस्थ दर्शन के श्री ए नागराज द्वारा अनुसंधान के बारे में सूचना जन-सामान्य को देने के लिए है.  ६-७ दिन के "परिचय शिविर" के माध्यम से इस बात से लोगों को अवगत कराया जाता है.    "जीवन विद्या अध्ययन बिंदु" में लिखे ४५ बिन्दुओं को प्रबोधक प्रस्तुत करता है.  प्रबोधक अपने खर्चे पर शिविर लेने जाते हैं और प्रबोधन कार्य का कोई प्रतिफल नहीं लेते।  शिविर में भाग लेने वाले लोग केवल अपने रहने-खाने का खर्च वहन करते हैं.  परिचय शिविर का प्रयोजन है - जिज्ञासु लोगों को इस दर्शन के अध्ययन से जोड़ना।  मध्यस्थ दर्शन का अध्ययन अब कई स्थानो पर कराया जाता है.

शिक्षा का मानवीयकरण योजना है - शिक्षा के द्वारा बच्चों को समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने के योग्य बनाना।  इसके लिए स्कूली पाठ्यक्रम में इस समझ का समावेश करना।  उसके बाद महाविद्यालय और विश्व-विद्यालय स्तर पर इस समझ के आधार पर शोध और अभ्यास।  इस योजना के अंतर्गत रायपुर में अभिभावक विद्यालय पिछले ४ वर्षों से कार्यरत है.  छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा में भी इसको समावेश किया है.  छत्तीसगढ़ में बेमेतरा जिले में दर्शन पर आधारित विश्व-विद्यालय को स्थापित करने का काम प्रगति पर है. 

ग्राम-स्वराज योजना - स्वराज व्यवस्था के तीन स्तरों (परिवार, परिवार-समूह और ग्राम) को आज की परिस्थिति में भी क्रियान्वित किया जा सकता है.  इसके लिए आवश्यक है कुछ परिवार समाधान-समृद्धि प्रमाण स्वरूप में उस गाँव में रहे, और उस गाँव में इस व्यवस्था के मॉडल को स्थापित करें।  ऐसा प्रयास कई स्थानों पर हो रहा है.  यह काम स्थानीय सरकारी शासन की सहमति के साथ सफल होगा, न कि उनके विरोध और असहमति के साथ. 

मूल में ये तीन ही योजनाएं हैं.  ये योजनाएं अनुभव मूलक हैं - अर्थात सह-अस्तित्व में अनुभव के आधार पर बनाई गयी हैं और इनका मूल्याङ्कन और दिशा-निर्धारण अनुभव मूलक विधि से ही होता है.  जैसे-जैसे अध्ययन विधि से अनुभव संपन्न होने की बात बनेगी, इन योजनाओं को और बल मिलता जाएगा, इनकी प्रगति और तेज होती जाएगी।  इन योजनाओं के समर्थन में इंटरनेट पर सूचना है, दूसरी भाषाओँ में अनुवाद हैं, अध्ययन गोष्ठियां हैं, सम्मलेन हैं. 

स्वराज व्यवस्था को स्थापित करने के लिए धरती के हम सभी मानवों को समझदार होना होगा।  जीव-चेतना से मानव-चेतना में संक्रमित होना होगा।  अच्छी बात यह है - इसकी चाहत हम में मौलिक रूप से बनी ही हुई है. 


- मध्यस्थ दर्शन पर आधारित 

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