मध्यस्थ-दर्शन चेतना-विकास के लिए "अध्ययन का मार्ग" प्रस्तावित करता है। जैसा मुझे अभी तक समझ आया है - इस मार्ग के सात चरण हैं।
पहला चरण है - परिचय। यह इस अनुसन्धान के प्रस्ताव के प्रति ध्यान-आकर्षण कराने के लिए है। जीवन-विद्या परिचय शिविर इसके लिए पर्याप्त है। यही जीवन-विद्या परिचय-शिविर की सीमा भी है।
दूसरा चरण है - पठन या श्रवण। इस प्रस्ताव की सूचना का ठीक से (सही-सही) श्रवण (सुनना) या पठन। मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व वाद का वांग्मय इसके लिए पर्याप्त है। यही इस प्रस्ताव की सूचना की सीमा भी है।
तीसरा चरण है - मनन या विचार-मंथन। इस प्रस्ताव को सुनने या पढने के बाद स्वयं में तोलना कि क्या यह बात श्रेष्ठ है या मैं अभी तक जैसे जीता रहा, वह श्रेष्ठ है? इस तरह स्व-निरीक्षण पूर्वक निष्कर्ष पर पहुंचना। मुझे मानव-लक्ष्य "समाधान और समृद्धि" पूर्वक ही जीना है, इस निष्कर्ष पर पहुंचना। यही तर्क की सीमा है। "जीव-चेतना यह है" और "मानव-चेतना यह है" - ऐसा स्पष्ट हो जाना और मानव-चेतना श्रेष्ठ है, ऐसा निष्कर्ष निकाल लेना ही तर्क का प्रयोजन भी है। इस चरण के आगे तर्क नहीं है।
चौथा चरण है - मानना या स्वीकारना। मानव-लक्ष्य के प्रति निष्कर्ष पर पहुँच कर, इसको मैं जियूँगा यह स्वीकार लेना - ऐसा अनुकरण-अनुसरण करने का संकल्प। मानने के साथ जीने (आचरण में लाने) का प्रयास शुरू हो जाता है। जागृत व्यक्ति का समाधान और समृद्धि के अर्थ में अनुकरण और अनुसरण करना होता है।
इस तरह "मान" कर जीते हैं, तो "जानना" आवश्यक हो जाता है। अनुशासन (अनुकरण अनुसरण पूर्वक) में जीते हैं, तो स्वानुशासन में जीने की आवश्यकता स्वयं में उदय हो जाती है। बिना "माने" - "जानना" संभव नहीं है। यह संभव है कि इस तरह "मान कर जीने" के क्रम में वापस दूसरे या तीसरे चरण पर जाना पड़े, संशोधन के लिए। इस चरण की परिणति है - जब कल्पनाशीलता सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में तदाकार हो जाए। यहीं तक अध्ययन में पुरुषार्थ है। अध्ययन के बाकी चरण स्वयं-स्फूर्त हैं।
पांचवा चरण है - जानना या अनुभव। कल्पनाशीलता सह-अस्तित्व में तदाकार होने पर सह-अस्तित्व में बोध संपन्न हो जाते हैं, जिससे अनुभव स्वयं स्फूर्त हो जाता है। अनुभव पूर्वक ज्ञान-संपन्न हो जाते हैं। इससे ज्ञान स्वत्व बन जाता है। पांचवे चरण से गुजरने के बाद पीछे जाने की कोई सम्भावना नहीं है। अनुभव ही अध्ययन का फल है।
छठा चरण है - जीना या क्रिया-पूर्णता। अनुभव की रोशनी अपने जीने के हर आयाम में आ जाए। जिससे समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना स्वयं-स्फूर्त हो जाए। यह चौथे चरण (मानकर जीना) से अधिक है - क्योंकि यहाँ जानते हुए और मानते हुए हम जीते हैं। बाहरी तौर पर जीने का स्वरूप चौथे चरण जैसा ही रहता है, पर स्वयं में गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है। यही 'श्रम का विश्राम' या क्रिया-पूर्णता है। इसकी फिर निरंतरता होती है। यही मानव-चेतना है। यहीं से देव-चेतना की शुरुआत है।
सातवाँ चरण है - उपकार या आचरण-पूर्णता। दूसरे मानव को अपना जैसा बना देना ही सातवाँ चरण है। यही मानवीय परंपरा का स्वरूप है। इसी को उपकार कहते हैं। सातवाँ चरण सफल तभी है जब जागृत व्यक्ति ने अपनी जागृति के प्रमाण में दूसरे को अपने जैसा जागृत बना दिया। यही आचरण पूर्णता या 'गति का गंतव्य' है। इसकी फिर निरंतरता होती है। यही दिव्य-चेतना है।
मुझे लगता है, हमको पूरा रास्ता पता होना चाहिए - और उस रास्ते में हम कहाँ खड़े हैं, इसका सही मूल्यांकन होना चाहिए। कहाँ हमको पहुंचना है - वहां से मार्ग-दर्शन और प्रेरणा मिलती रहनी चाहिए। तभी हम दृढ़ता और निश्चयता से इस मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। जितने लोग अध्ययन मार्ग से अनुभव तक पहुंचेंगे, प्रमाणित होंगे, उतना ही यह मार्ग आगे और सुगम होता जाएगा।