This blog is for Study of Madhyasth Darshan (Jeevan Vidya) propounded by Shree A. Nagraj, Amarkantak. (श्री ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ-दर्शन सह-अस्तित्व-वाद के अध्ययन के लिए)
Sunday 31 October 2010
Friday 29 October 2010
Monday 25 October 2010
Sunday 24 October 2010
Friday 22 October 2010
Saturday 16 October 2010
Friday 15 October 2010
Wednesday 13 October 2010
Friday 8 October 2010
Wednesday 6 October 2010
अमूर्त और मूर्त
मनुष्य-शरीर को जीवन चलाता है। ऐसे मनुष्य-शरीर को चलाते हुए जीवन 'अमूर्त' वस्तुओं की अपेक्षा में जीता है। सुख एक अमूर्त वस्तु है। सुख को मूर्त वस्तुओं (भौतिक-रासायनिक) में ढूढता है, तो वहां सुख मिलता नहीं है। मानव में सुखी होने की अपेक्षा है। यह यथास्थिति है। अमूर्त की चाहत में मनुष्य जीता है। अमूर्त की चाहत को प्रमाणित करने के लिए यह प्रस्ताव है। सारा प्रस्ताव मनुष्य के सुख पूर्वक जीने की चाहत के अर्थ में है। समाधान = सुख। मनुष्य ने अभी तक आँखों से जो दिखता है, केवल उसको सच्चाई माना - जिससे वह बुद्धू बना, अपराधी बना।
जो मनुष्य को दिखता है, और जो मनुष्य चाहता है - इन दोनों के योगफल में मनुष्य का अध्ययन किया जाए। इन दोनों के योगफल में ही हमको समाधान मिलता है।
समझदारी से समाधान होता है। समाधान हर व्यक्ति के "अधिकार" की चीज है। समाधान के "अधिकार" के आधार पर ही न्याय प्रगट होता है। न्याय की प्रक्रिया है - संबंधों को व्यवस्था के अर्थ में पहचानना, उसका निर्वाह करने के क्रम में मूल्यों का प्रगटन होना, मूल्यों का प्रगटन होने की स्थिति में मूल्याङ्कन होना। दो पक्षों के बिना न्याय की कोई बात नहीं है। दोनों पक्षों में यह मूल्याङ्कन होने की स्थिति बनना। मूल्याङ्कन पूर्वक उभय-तृप्ति होता है, तो न्याय है। अन्यथा न्याय नहीं है - समस्या है।
सह-अस्तित्व मूर्त और अमूर्त का अविभाज्य वर्तमान है। मानव सह-अस्तित्व का प्रतिरूप है। मानव सुख चाहता है - सुख अमूर्त है। समाधान मूर्त और अमूर्त दोनों है। व्यवहार में समाधान मूर्त रूप में रहता है, अनुभव में अमूर्त रूप में रहता है। समाधान जो अनुभव में अमूर्त रूप में है - वही सुख है। समझदारी अमूर्त है। कार्य-व्यवहार अमूर्त-मूर्त दोनों है।
अध्यात्मवादियों ने केवल अमूर्त वस्तु को सत्य माना। भौतिकवादियों ने केवल मूर्त वस्तु को सत्य माना। दोनों गड्ढे में गिरे! दोनों ने एक पैर पर खड़े होने का प्रयास किया। दोनों के पतन का कारण यही है। दोनों का परंपरा नहीं बना। दोनों से व्यवस्था का आधार नहीं बना।
जबकि सह-अस्तित्व मूर्त और अमूर्त का अविभाज्य संयुक्त स्वरूप है। मानव भी मूर्त और अमूर्त के अविभाज्य संयुक्त स्वरूप में ही जीता है। मूर्त और अमूर्त अविभाज्य हैं - ये अलग होते ही नहीं हैं! इनको अलग-अलग देख कर हम पार नहीं पायेंगे। इनको संयुक्त रूप में देख कर ही हम पार पायेंगे। अमूर्त और मूर्त अलग होते ही नहीं तो आप कैसे इनको अलग करोगे? इस दर्शन का पहला प्रतिपादन ही है - "सत्ता में प्रकृति 'अविभाज्य' है"। सत्ता से अलग करके प्रकृति को देखने की कोई जगह या स्थान ही नहीं है। सत्ता असीम है। प्रकृति सत्ता को व्यक्त करती है। इसमें सबसे विकसित प्रकृति को 'मानव स्वरूप' में पहचाना। मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है। जीवन विकसित है। मनुष्य-शरीर सबसे विकसित रचना है। मनुष्य-शरीर जीवन-जागृति प्रगट होने योग्य है। सह-अस्तित्व सहज प्रगटन विधि से मनुष्य-शरीर का प्रगटन है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)
जो मनुष्य को दिखता है, और जो मनुष्य चाहता है - इन दोनों के योगफल में मनुष्य का अध्ययन किया जाए। इन दोनों के योगफल में ही हमको समाधान मिलता है।
समझदारी से समाधान होता है। समाधान हर व्यक्ति के "अधिकार" की चीज है। समाधान के "अधिकार" के आधार पर ही न्याय प्रगट होता है। न्याय की प्रक्रिया है - संबंधों को व्यवस्था के अर्थ में पहचानना, उसका निर्वाह करने के क्रम में मूल्यों का प्रगटन होना, मूल्यों का प्रगटन होने की स्थिति में मूल्याङ्कन होना। दो पक्षों के बिना न्याय की कोई बात नहीं है। दोनों पक्षों में यह मूल्याङ्कन होने की स्थिति बनना। मूल्याङ्कन पूर्वक उभय-तृप्ति होता है, तो न्याय है। अन्यथा न्याय नहीं है - समस्या है।
सह-अस्तित्व मूर्त और अमूर्त का अविभाज्य वर्तमान है। मानव सह-अस्तित्व का प्रतिरूप है। मानव सुख चाहता है - सुख अमूर्त है। समाधान मूर्त और अमूर्त दोनों है। व्यवहार में समाधान मूर्त रूप में रहता है, अनुभव में अमूर्त रूप में रहता है। समाधान जो अनुभव में अमूर्त रूप में है - वही सुख है। समझदारी अमूर्त है। कार्य-व्यवहार अमूर्त-मूर्त दोनों है।
अध्यात्मवादियों ने केवल अमूर्त वस्तु को सत्य माना। भौतिकवादियों ने केवल मूर्त वस्तु को सत्य माना। दोनों गड्ढे में गिरे! दोनों ने एक पैर पर खड़े होने का प्रयास किया। दोनों के पतन का कारण यही है। दोनों का परंपरा नहीं बना। दोनों से व्यवस्था का आधार नहीं बना।
जबकि सह-अस्तित्व मूर्त और अमूर्त का अविभाज्य संयुक्त स्वरूप है। मानव भी मूर्त और अमूर्त के अविभाज्य संयुक्त स्वरूप में ही जीता है। मूर्त और अमूर्त अविभाज्य हैं - ये अलग होते ही नहीं हैं! इनको अलग-अलग देख कर हम पार नहीं पायेंगे। इनको संयुक्त रूप में देख कर ही हम पार पायेंगे। अमूर्त और मूर्त अलग होते ही नहीं तो आप कैसे इनको अलग करोगे? इस दर्शन का पहला प्रतिपादन ही है - "सत्ता में प्रकृति 'अविभाज्य' है"। सत्ता से अलग करके प्रकृति को देखने की कोई जगह या स्थान ही नहीं है। सत्ता असीम है। प्रकृति सत्ता को व्यक्त करती है। इसमें सबसे विकसित प्रकृति को 'मानव स्वरूप' में पहचाना। मानव जीवन और शरीर का संयुक्त स्वरूप है। जीवन विकसित है। मनुष्य-शरीर सबसे विकसित रचना है। मनुष्य-शरीर जीवन-जागृति प्रगट होने योग्य है। सह-अस्तित्व सहज प्रगटन विधि से मनुष्य-शरीर का प्रगटन है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)
व्यवस्था का मूल स्वरूप
परमाणु-अंश में आचरण निश्चित नहीं होता। किसी गठन से पृथक होने पर परमाणु-अंश किसी एक तरह का आचरण नहीं करता, उसका आचरण बदलता रहता है। गठन से पृथक परमाणु-अंश अस्तित्व में बहुत कम मिलते हैं।
परमाणु-अंश में व्यवस्था में होने की अपेक्षा है। परमाणु-अंश में व्यवस्था का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता।
व्यवस्था के स्वरूप की शुरुआत दो अंश के परमाणु से है। परमाणु व्यवस्था का आधार है - इसीलिये आगे अवस्था का भ्रूण तैयार कर दिया, स्वयं के यौगिक स्वरूप में प्रवृत्त होने के स्वरूप में। सह-अस्तित्व नित्य प्रगटन-शील है, इसलिए यह प्रगटन है।
यौगिक-क्रियाओं के बाद प्राण-कोशाओं का प्रगटन है - जिनमे सांस लेने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। प्राण-कोशाओं में निहित प्राण-सूत्रों में रचना-विधि में उत्तरोत्तर विकास के आधार पर अनंत रचनाएं तैयार हो गयी। जिसके फलस्वरूप स्वेदज, अंडज, पिंडज संसार का प्रगटन हो गया। इस प्रकार अनंत रचनाओं को हम देख पाते हैं, उनमें से एक मनुष्य-शरीर रचना भी है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव स्थली, भोपाल)
परमाणु-अंश में व्यवस्था में होने की अपेक्षा है। परमाणु-अंश में व्यवस्था का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता।
व्यवस्था के स्वरूप की शुरुआत दो अंश के परमाणु से है। परमाणु व्यवस्था का आधार है - इसीलिये आगे अवस्था का भ्रूण तैयार कर दिया, स्वयं के यौगिक स्वरूप में प्रवृत्त होने के स्वरूप में। सह-अस्तित्व नित्य प्रगटन-शील है, इसलिए यह प्रगटन है।
यौगिक-क्रियाओं के बाद प्राण-कोशाओं का प्रगटन है - जिनमे सांस लेने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। प्राण-कोशाओं में निहित प्राण-सूत्रों में रचना-विधि में उत्तरोत्तर विकास के आधार पर अनंत रचनाएं तैयार हो गयी। जिसके फलस्वरूप स्वेदज, अंडज, पिंडज संसार का प्रगटन हो गया। इस प्रकार अनंत रचनाओं को हम देख पाते हैं, उनमें से एक मनुष्य-शरीर रचना भी है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव स्थली, भोपाल)
Tuesday 5 October 2010
अनुसंधान के लोकव्यापीकरण की आवश्यकता
"अनुसन्धान पूर्वक हुई उपलब्धि के मूल में सम्पूर्ण मानव-जाति का पुण्य है" - ऐसा मैंने माना। मानव-जाति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने इसके लोकव्यापीकरण को शुरू किया। नहीं तो क्या जरूरत थी? हम पा गए, हम संतुष्ट हैं - इतना ही रहना था! आदर्शवाद के स्वांत-सुख की तरह। "सर्व-शुभ में स्व-शुभ समाया है।" इसको लेकर हम चल गए। इससे किसी से टकराव या वाद-विवाद की बात ही नहीं रही।
"आदमी को मानवत्व स्वरूप में जीना है, या जीवत्व स्वरूप में जीना है?" - इस प्रश्न का कोई भी आदमी क्या उत्तर देगा? सकारात्मक बात को नकारना आदमी से बनता नहीं है। सकारात्मक को मनुष्य चाहता ही आया है। न्याय चाहिए! समाधान चाहिए! सच्चाई चाहिए! इस चाहत के पीछे कई लोगों ने अपने प्राणों को न्योछावर किया है। मानव-जाति में जीवन-सहज सुख की अपेक्षा है। शरीर-सहज विधि से मनमानी की स्वीकृति है। जब तक हम शरीर-सहज विधि से चलते हैं, तब तक जीवन की उम्मीद के लिए संलग्न होने के लिए हम प्रयत्न ही नहीं कर पाते हैं।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)
"आदमी को मानवत्व स्वरूप में जीना है, या जीवत्व स्वरूप में जीना है?" - इस प्रश्न का कोई भी आदमी क्या उत्तर देगा? सकारात्मक बात को नकारना आदमी से बनता नहीं है। सकारात्मक को मनुष्य चाहता ही आया है। न्याय चाहिए! समाधान चाहिए! सच्चाई चाहिए! इस चाहत के पीछे कई लोगों ने अपने प्राणों को न्योछावर किया है। मानव-जाति में जीवन-सहज सुख की अपेक्षा है। शरीर-सहज विधि से मनमानी की स्वीकृति है। जब तक हम शरीर-सहज विधि से चलते हैं, तब तक जीवन की उम्मीद के लिए संलग्न होने के लिए हम प्रयत्न ही नहीं कर पाते हैं।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)
Monday 4 October 2010
जड़ और चैतन्य
जड़-प्रकृति और चैतन्य-प्रकृति दोनों गतिशील/क्रियाशील हैं - लेकिन दोनों की मौलिकताएं अलग-अलग हैं। चैतन्य-प्रकृति में परावर्तन और प्रत्यावर्तन दोनों हैं, जबकि जड़ प्रकृति में केवल परावर्तन है। परावर्तन का मतलब है - व्यक्त होना। प्रत्यावर्तन का मतलब है - समझना, मूल्याङ्कन करना।
कम्पनात्मक गति की अधिकता से, गठन-पूर्ण होने से, भार-बंधन और अणु-बंधन से मुक्ति से चैतन्य पद प्रतिष्ठा है। जड़ से चैतन्य में संक्रमण स्वयं-स्फूर्त होता है। चैतन्य इकाई को कोई 'बनाता' नहीं है। यह आदर्शवाद से भिन्न बात है - जिसमें कहा है, कोई पैदा करने वाला है, कोई मारने वाला है, कोई रक्षा करने वाला है। उसके गुण-गायन करने में ही आदर्शवाद के सारे पुराण-पंचांग हैं।
जीवन शक्तियां अक्षय हैं। यह एक बहुत मौलिक बात है। अनुभव हो जाना वैसा ही है, जैसे किसी खजाने की चाबी मिल जाना! अनुभव होना एक 'उपलब्धि' है - अनुभव होने के बाद कोई ऐसी बात नहीं बची जो मुझे समझ में न आयी हो। अनुभव में सारी समझ समाया रहता है, फिर उसको केवल उपयोग करने की बात रहती है। हर व्यक्ति को ऐसा ही होना है।
अध्ययन-विधि में स्वयं की उपयोगिता सिद्ध करने के अर्थ में समझने के लिए जिज्ञासा बनती है। अनुसंधान विधि में अज्ञात को ज्ञात करने के अर्थ में जिज्ञासा बनती है। 'सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है" - इस जिज्ञासा को लेकर मैंने अनुसंधान किया।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)
कम्पनात्मक गति की अधिकता से, गठन-पूर्ण होने से, भार-बंधन और अणु-बंधन से मुक्ति से चैतन्य पद प्रतिष्ठा है। जड़ से चैतन्य में संक्रमण स्वयं-स्फूर्त होता है। चैतन्य इकाई को कोई 'बनाता' नहीं है। यह आदर्शवाद से भिन्न बात है - जिसमें कहा है, कोई पैदा करने वाला है, कोई मारने वाला है, कोई रक्षा करने वाला है। उसके गुण-गायन करने में ही आदर्शवाद के सारे पुराण-पंचांग हैं।
जीवन शक्तियां अक्षय हैं। यह एक बहुत मौलिक बात है। अनुभव हो जाना वैसा ही है, जैसे किसी खजाने की चाबी मिल जाना! अनुभव होना एक 'उपलब्धि' है - अनुभव होने के बाद कोई ऐसी बात नहीं बची जो मुझे समझ में न आयी हो। अनुभव में सारी समझ समाया रहता है, फिर उसको केवल उपयोग करने की बात रहती है। हर व्यक्ति को ऐसा ही होना है।
अध्ययन-विधि में स्वयं की उपयोगिता सिद्ध करने के अर्थ में समझने के लिए जिज्ञासा बनती है। अनुसंधान विधि में अज्ञात को ज्ञात करने के अर्थ में जिज्ञासा बनती है। 'सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है" - इस जिज्ञासा को लेकर मैंने अनुसंधान किया।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जुलाई २०१०, अमरकंटक)
आभार - प्रवीण, आतिशी (मानव-स्थली, भोपाल)
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