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Monday 29 September 2008

अनुभव की रोशनी का अर्थ

अनुभव की रोशनी में (मध्यस्थ-दर्शन का) अध्ययन होता है। "अनुभव की रोशनी" का क्या अर्थ है? किसके अनुभव की रोशनी?

अध्ययन कराने वाले व्यक्ति के अनुभव की रोशनी में विद्यार्थी अध्ययन करता है। अनुभव की रोशनी का अर्थ है - जीने में प्रमाण। अनुभव का प्रमाण जीने में ही होता है। अनुभव की रोशनी का अर्थ है - अनुभव संपन्न व्यक्ति के जीने में न्याय, धर्म, और सत्य स्वरूपी प्रमाण।

अध्ययन करने वाले विद्यार्थी में अनुभव की अपेक्षा ( प्रमाणित होने की अपेक्षा) होती है। बिना प्रमाणित होने की अपेक्षा के अध्ययन सफल हो ही नहीं सकता। अध्ययन सफल होने का मतलब है - सह-अस्तित्व साक्षात्कार होना।

अध्ययन एक अनुभव संपन्न "जीवित व्यक्ति" ही करा सकता है। प्रमाण के बिना अध्ययन कोई करा नहीं पायेगा - सूचना जरूर दे सकता है। पठन विधि से या उपदेश विधि से अध्ययन नहीं करवाया जा सकता। किताब से, audio-video recording से, internet माध्यम से केवल मध्यस्थ-दर्शन के प्रस्ताव की सूचना दी जा सकती है। अध्ययन एक जीवित अनुभव संपन्न व्यक्ति ही करा सकता है। अध्ययन कराना एक उपकार का काम है। यह प्रतिफल (मेहनताना) विधि से करवाया ही नहीं जा सकता। अध्ययन के बदले में विद्यार्थी केवल गुरु के प्रति कृतज्ञ ही हो सकता है।

अध्ययन में गुरु और शिष्य का सम्बन्ध प्रमाणित होता है। शिष्य की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए गुरु प्रामाणिकता का स्त्रोत है। गुरु के अनुभव की रोशनी में शिष्य अध्ययन करता है। शिष्य के अध्ययन सफल होने पर ही गुरु प्रमाणित होता है। यही जागृति की परम्परा का स्वरुप है। जैसे दीप से दीप जलते हैं - वैसे ही ज्ञान एक व्यक्ति से दूसरे में अध्ययन विधि से प्रवाहित होता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित

Saturday 27 September 2008

साक्षात्कार और प्रमाणित होने की इच्छा

यह आपको पहले सूचित हुआ है - जीवन में दस क्रियाएं हैं, जिसमें चित्त भाग में चिंतन और चित्रण नाम से दो क्रियाएं संपादित होती हैं। चिंतन क्षेत्र में साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार क्या? भाषा से जो बताया, भाषा के अर्थ में जो वस्तु कल्पना में आई उसका साक्षात्कार होता है। वह साक्षात्कार हुए बिना अनुभव होता नही है।

साक्षात्कार होने के लिए न्याय, धर्म, सत्य को जीने में प्रमाणित करने की इच्छा समाहित रहना आवश्यक है। प्रमाणित करने की इच्छा नहीं हो, तो साक्षात्कार होता नहीं है। प्रमाणित करना जीने में कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित ९ भेदों से होता है। प्रमाणित होने की इच्छा को हटा करके हम साक्षात्कार कर लें, अनुभव कर लें - यह होने वाला नहीं है। किसी को ऐसे साक्षात्कार, अनुभव नहीं होगा इस धरती पर! एक भी आदमी को नहीं होगा!!

अभी थोड़ी अधिक आयु वालों के साथ ऐसा है, वे कसौटी में लाने में निष्णात हैं। जिम्मेदारी के लिए वे निष्णात नहीं रहते हैं। "हम कसौटी में कस कर ही अपना सर इसमें डालेंगे। साक्षात्कार होता है कि नहीं - देख लेते हैं, फ़िर देखेंगे! अनुभव होता है कि नहीं - देख लेते हैं। अनुभव होता है - तो उसके बाद में सोचेंगे!" जबकि प्रमाणित करने की अपेक्षा के बिना श्रवण मात्र से यह अनुभव तक पहुँचता ही नहीं है। श्रवण से कल्पना का projection तुलन तक हो सकता है, किंतु यदि इस तुलन के साथ हम प्रमाणित होने का उद्देश्य नहीं रखेंगे तो वह साक्षात्कार में पहुंचेगा ही नहीं!

श्रवण के साथ मनन होता है - जिससे वृत्ति में तुलन होता है। क्यों तुलन करें? - इस बात का स्पष्ट उत्तर होने पर ही तुलन सफल होता है, और साक्षात्कार होता है। प्रमाणित करने के लिए तुलन करें तो साक्षात्कार होता है। अन्यथा श्रवण केवल भाषा का ही होता है, अर्थ मिलता नहीं है। ऐसे में तुलन, केवल तुलन के लिए हो जाता है। इसमें समय व्य्यतीत हो जाता है। समय को यदि save करना है तो ऊपर जो बात बतायी गयी है, उस तरीके को अपनाने की आवश्यकता है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)

Monday 22 September 2008

नियंत्रित -> व्यवस्थित -> प्रयोजनशील

मनुष्य की श्रेष्ठता के प्रमाणित होने का एक निश्चित क्रम है।

क्रमशः