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Sunday 21 December 2008

अध्ययन का महत्त्व, अध्ययन की वस्तु - भाग ११

अभी के समय में हम जिसको व्यवस्था माने जा रहे हैं - उसका स्वरूप कैसा है? इस बारे में आप को कुछ कहना चाहते हैं। अभी की पूरे विश्व में जितने भी राज्य और धर्म कहलाये जा रहे हैं - वे "शक्ति केंद्रित शासन" विधि से शासन-संविधान है। धर्म-संविधान भी शासन के ही पक्ष में है। क्या यह समझ में आता है? यह सबको समझ में आना चाहिए।

शासन के पक्ष में संविधान लिखा गया है। संविधान में शासन की मंशा के अनुसार चलने वालों को हम सुप्रजा कहते हैं। शासन की मंशा के विरुद्ध व्यक्ति को हम अपराधी मानते हैं। संविधान में अपराधियों को दंड देने का प्रावधान है। धर्म-संविधान में गलती करने वालों के लिए प्रायश्चित्त करने का प्रावधान है। इस तरह से संविधान लिखे गए हैं। इन संविधानों पर आधारित होती है - शक्ति केंद्रित शासन व्यवस्था।
"शक्ति केंद्रित" का क्या मतलब है? डंडा बजा कर अपनी बात मनवाना। उसके लिए - गलती को गलती से रोकने का प्रयास, अपराध को अपराध से रोकने का प्रयास, और युद्ध को युद्ध से रोकने का प्रयास। एक व्यक्ति अपराध करता है - उसको रोकने के लिए १० लोगों को अपराध में पारंगत बनाना होता है। हर देश में ऐसी ही व्यवस्था रखा है। अब आप बताओ - इस तरह आदमी अपराध-प्रवृत्ति के लिए तैय्यार हुआ, या न्याय के लिए? इस तरह हम फंस चुके हैं। आदमी फंसा है। आदमी को चलाने वाला आदमी भी फंसा है। यही अमानवीय कार्यक्रम है। दूसरे शब्दों में - जीव-चेतना में जीते हुए विवशता पूर्वक किया हुआ कार्यक्रम। इसमें एक चलाने वाला होता है, उसको नाम दिया "राक्षस मानव"। दूसरा चलने वाला होता है, उसको नाम दिया "पशु मानव"। राक्षस मानव चलाता है, पशु मानव चलता है। यह मेरे द्वारा लिखे हुए दर्शन का एक भाग है।

जीव चेतना से मानव-चेतना में परिवर्तित होने पर ही हम मानवीय व्यवस्था को पाते हैं। मानवीय व्यवस्था है - (१) परिवार, (२) अखंड समाज, (३) सार्वभौम व्यवस्था।

- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के उदबोधन पर आधारित (२२ अक्टूबर २००५, मसूरी)

1 comment:

varun jaiswal said...

वाकई अपने अद्ध्ययन की विशिष्टता को इस लेख में उभारा है |
आपको साधुवाद |