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Friday, December 19, 2008

अध्ययन का महत्त्व और अध्ययन की वस्तु - भाग २


"सह-अस्तित्व परम सत्य है।" - जैसे यह अध्ययन का एक मुद्दा है। "परम सत्य" का मतलब क्या होता है? सत्य वही है जो निरंतर और एक सा बना रहता है। होने के रूप में व्यापक है और अनंत एक-एक वस्तुएं हैं। कभी भी व्यापक वस्तु से एक-एक वस्तुएं अलग-अलग हो नहीं सकते। अलग होने की सम्भावना नहीं है। अलग होने का तौर-तरीका अस्तित्व में नहीं है। प्राकृतिक रूप में भी नहीं है, और अप्राकृतिक रूप में जो मनुष्य प्रयत्न करता है, वैसे भी नहीं है। न हों सकता है, न अभी तक हुआ है। इस तरह मनुष्य सह-अस्तित्व को परम-सत्य के स्वरूप में समझ कर, सह-अस्तित्व में व्यवस्था को पहचानता है। मनुष्य ने जितनी भी सह-अस्तित्व विरोधी कार्य किया, स्वयं समस्या में फंस गया।

समस्या में फँसना मनुष्य के दुःख का कारण हुआ। इसके लिए अध्ययन के लिए सूत्र दिया:

समस्या = दुःख
समाधान = सुख = मानव धर्म

दुःख से पीड़ा होता है। पीड़ित व्यक्ति स्वयं में स्वस्थ रहता नहीं है, दूसरों का उपकार तो स्वप्न में भी नहीं। पीड़ित आदमी केवल दूसरों के लिए परेशानी पैदा करेगा। और कुछ नहीं करेगा। यह आप को भी समझ में आता है, मुझ को भी समझ में आता है।

यह समझने के बाद हम अनुमान कर सकते हैं - "स्वस्थ आदमी स्वयम भी स्वस्थ रहता है, दूसरों को स्वस्थता देने का प्रयत्न भी करता है।" भले ही यह आज संसार में प्रचलित न हों, हम इस बात को अनुमान रूप में तो स्वीकार कर ही सकते हैं। स्वस्थ आदमी स्वयं स्वस्थ रहता है, और संसार को स्वस्थ करने के लिए हाथ-पैर मारता ही है - चाहे सफल हों, या असफल हों! आज तक के "अच्छे" आदमीयों के हाथ-पैर मारने को मैंने इस रूप में निकाल लिया। बहुत अच्छे आदमी संसार को उपकार करने के लिए कहीं न कहीं कोशिश किया है। इन कोशिशों में कोई कमी नहीं, उन पर कोई शंका नहीं, कोई कृपणता नहीं - पर सफलता का आंकलन करने जाते हैं, तो हमको पता लगता है - ये सफल नहीं हों पाये। क्यों सफल नहीं हों पाये, यह पूछने पर पता चलता है - "उपकार क्या है?" यह ध्रुवीकृत नहीं हुआ।

अभी हम जो अध्ययन करते हैं - उसमें पहले यह ध्रुवीकृत होता है कि उपकार क्या है? समझे हुए को समझाना है - पहला उपकार। सीखे हुए को सिखाना है - दूसरा उपकार। किए हुए को कराना है - तीसरा उपकार। इसमें से सीखने-सिखाने और करने-कराने के बारे में आदमी बहुत कुछ किया है। पर समझने-समझाने का भाग अधूरा रह गया। इसका कारण यह रहा - वैदिक विचार से लेकर भौतिकवादी विचार तक हम यह मान कर चले हैं कि "करके समझो!" इस बात को अच्छी तरह से ह्रदय में बैठाने की बात है - क्योंकि यह मूल मुद्दा है। मनुष्य-जाति आदि काल से "करके समझो" विधि से चला है। जबकि मानव-जाति में करके समझना नहीं होता। जीव-जानवरों में करके चलने की बात होती है। करके जीव-जानवर समझते नहीं हैं, केवल चलते हैं। हर काम को पीछे जीव (वंश) में जैसे किया था, वैसे ही करके चलता है। मनुष्य को जब "करके समझो" कहा गया - तो उससे करके करना ही बना, समझना नहीं बना। सीखे हुए से केवल सीखा हुआ ही रहा - समझ कोई उससे पैदा हुई नहीं। किए हुए से करता ही रहा - समझ उससे कोई पैदा हुई नहीं।

"समझ" क्या चीज है - यह अभी तक (मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान से पहले) ध्रुवीकृत नहीं हुआ।

- जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के उदबोधन पर आधारित (२२ अक्टूबर २००५, मसूरी)

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