Friday, 18 July, 2008

अनुभव से पहले मध्यस्थ-क्रिया (आत्मा) का कार्य-रूप क्या होता है?

प्रश्न: मध्यस्थ-दर्शन के प्रस्ताव के अनुसार जीवन अपने स्वरुप में एक गठन-पूर्ण परमाणु है। आत्मा चैतन्य परमाणु (जीवन) के मध्यांश बताया गया है। आत्मा को मध्यस्थ-क्रिया भी कहा गया है, जो सह-अस्तित्व में अध्ययन के पूर्ण होने पर अस्तित्व में अनुभव करती है। सह-अस्तित्व में अनुभव के बाद जीवन अनुभव-मूलक विधि से काम करता है। अनुभव से पहले आत्मा (मध्यस्थ-क्रिया) का क्या कार्य-रूप होता है?

उत्तर: अनुभव से पहले मध्यस्थ-क्रिया (आत्मा) गठन-पूर्णता और उसकी निरंतरता को बनाए रखने में व्यक्त होता है। भ्रमित-मानव (जागृति-क्रम) में मध्यस्थ-क्रिया के कारण ही अव्यवस्था से होने वाली पीड़ा प्रकट होती है। मध्यस्थ-क्रिया के कारण ही भ्रमित-मानव में व्यवस्था की भास् पूर्वक आवश्यकता और व्यवस्था को पाने की इच्छा प्रकट होती है। इसी आवश्यकता और इच्छा के कारण भ्रमित-मानव में जागृति के लिए अनुसंधान या अध्ययन के रूप में प्रयास होता है। अध्ययन काल में बुद्धि में बोध-सम्पन्नता की प्रक्रिया का साक्षी आत्मा (मध्यस्थ-क्रिया) रहता है।

- मध्यस्थ-दर्शन पर आधारित मेरी प्रस्तुति एक विद्यार्थी की हैसियत से है।

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