सही और ग़लत के बारे में आदमी सोचता आया है। सही और ग़लत की विभाजन रेखा के बारे में ही मतभेद लोगों में होता है।
मध्यस्थ-दर्शन की रोशनी में सही और ग़लत की विभाजन रेखा की पहचान होती है।
मानव-चेतना में सभी सही है। जीव-चेतना में सभी ग़लत है।
मानव चेतना का मतलब है - अनुभव मूलक जीना। जीव-चेतना का मतलब है - शरीर मूलक जीना।
अनुभव सम्पन्नता ही सही और ग़लत की विभाजन रेखा है।
मानव-चेतना विधि से जीव-चेतना को जाँचा जा सकता है। जीव-चेतना में स्वयं रहते हुए जीव-चेतना में रहते हुए दूसरे व्यक्ति को जाँचना सम्भव नहीं है। जीव-चेतना की सीमा में दूसरे की गलती को ग़लत ठहराना और अपनी गलती को सही ठहराने की बात होती है। यही मतभेद का स्वरुप है।
जीव-चेतना विधि से कितना भी सोच-विचार करें - हम एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँच ही नहीं सकते। मतभेद बना ही रहता है। इस तरह "अपना-अपना सही" की दलील निकल जाती है। अपना-अपना सही का मतलब है - आप अपनी जगह रहो, हमको हमारी जगह रहने दो। इस तरह अपने-पराये की दीवार बन जाती है। जो मेरी गलती को सही मानते हैं, उनको मैं अपना मान लेता हूँ। जो मेरी गलती को ग़लत कहते हैं, उनको मैं पराया मान लेता हूँ।
सही में हम मानव एक हैं। गलती में अनेक हैं। गलती में जीता हुआ मानव अनेक स्वरूपों में दिखता है। गलती करने के हजारों लाखों तरीके हैं। वे सभी तरीके जीव-चेतना में गण्य हैं। इन तरीकों से जीने वालों के बीच में मतभेद दिखाई देता है। सही करने का एक ही तरीका है - और वह है अनुभव-मूलक जीना। दो सही करने वालों में मतभेद नहीं हो सकता। दो अनुभव-संपन्न व्यक्तियों का सहीपन को लेकर एक ही मत होता है।
- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित
Friday, 25 July, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment