अस्तित्व में जब किसी वस्तु की निश्चित या सुदृढ़ आवश्यकता बन जाती है - तो वह उपलब्धि तक अवश्य पहुँचती है।
हर मनुष्य में सुख, समाधान, न्याय, व्यवस्था की सहज - अपेक्षा है। यह अपेक्षा जब निश्चित और सुदृढ़ आवश्यकता में परिणित हो जाती है - तब उपलब्धि की सम्भावना उदय हो जाती है। यदि अपेक्षा ही नहीं होती - तो आवश्यकता, और उपलब्धि की बात ही नहीं होती। मनुष्य जब से धरती पर प्रकट हुआ है - उसमें सुख की अपेक्षा बनी ही हुई है। मनुष्य के सारे प्रयास सुख के लिए ही हैं। मध्यस्थ दर्शन के प्रकटन के पहले इन प्रयासों का स्वरुप अनुसंधान के रूप में ही रहा। अनुसंधान का मतलब है - अंधेरे में हाथ-पैर मारना। मध्यस्थ-दर्शन के प्रकटन के बाद मनुष्य के सुख के लिए किए जाने वाले प्रयासों को एक निश्चित दिशा मिल गयी है। अध्ययन निश्चित दिशा में किए जाने वाले प्रयास का नाम है।
आवश्यकता और उपलब्धि के बीच में प्रयास है। बिना प्रयास के आवश्यकता उपलब्धि में परिणित नहीं हो सकती। प्रयास जब निश्चित दिशा में होते हैं - तब उपलब्धि तक जल्दी पहुँच सकते हैं। मनुष्य में कर्म-स्वतंत्रता है - जिसका भ्रम-वश वह दुरुपयोग करता है। इसी दुरूपयोग के कारण मनुष्य के सुख के लिए प्रयासों के दिशा निश्चित नहीं हो पायी है।
बड़े स्तर पर देखें तो - धरती का बीमार हो जाना मनुष्य-जाति के लिए जागृत होने के लिए आवश्यकता है। अब "चलता है" बोलने से काम नहीं चलेगा। जैसे चल रहे हैं - उसी से धरती बीमार हुई है। यदि यह आवश्यकता हम सटीक पहचान लेते हैं, और इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए निश्चित-दिशा में प्रयास करते हैं - तो हम मानव-जाती के सदा सदा के लिए धरती पर खुश-हाली से रहने की उपलब्धि को प्रमाणित कर सकते हैं।
- मध्यस्थ-दर्शन पर आधारित मेरी प्रस्तुति एक विद्यार्थी की हैसियत से है।
Friday, 18 July, 2008
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