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Saturday, June 14, 2008

अपेक्षा, श्रम, और उपलब्धि

मैं (एक जीवन) किसी लक्ष्य को पाने की अपेक्षा करता हूँ, उसके लिए श्रम नियोजित करता हूँ, जिसके फलन में मेरी कुछ उपलब्धि होती है।

यदि मेरी अपेक्षा मेरी उपलब्धि से ज्यादा होती है - तो मुझे (जीवन को) श्रम का क्षोभ या थकान होती है।
यदि मेरी उपलब्धि मेरी अपेक्षा से ज्यादा होती है - तो मुझे (जीवन को) विश्राम होता है।

इस तरह मेरा (जीवन का) हर श्रम विश्राम की अपेक्षा में ही है।

हर श्रम में "विचार" निहित रहता है। वह विचार ही हर श्रम द्वारा उपलब्धि की मात्रा का निर्णय करता है। विचार ही अधिक से अधिक उपलब्धि पाने की प्रत्याशा करता है - तथा उसके लिए कितना कार्य (श्रम) करना होगा, उसकी पूर्व-धारणा बनाए रखता है। "पूर्व-धारणा" और "उपलब्धि" में जो अन्तर है - वही श्रम का क्षोभ या थकान है। यह अन्तर कैसे न हो? यही वैचारिक समर्थता या योग्यता का उपार्जन करने के लिए अध्ययन है। अध्ययन के फलन में मनुष्य "श्रम का विश्राम" सिद्ध कर लेता है। इसी का दूसरा नाम समाधान है।

श्रम का विश्राम = वैचारिक समर्थता = समाधान = क्रिया पूर्णता

समाधान-संपन्न व्यक्ति को श्रम का क्षोभ नहीं होता। समाधान-संपन्न व्यक्ति कैसे, क्या, और कितना श्रम-नियोजन करना है, और इस श्रम-नियोजन से कितना, क्या उपलब्धि होगी - इसके बारे में स्पष्ट होता है। इस तरह समाधान-संपन्न व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र और फल भोगने में भी स्वतन्त्र होता है। समाधान-संपन्न व्यक्ति के लिए समृद्धि संपन्न होना सहज होता है।

- मध्यस्थ-दर्शन पर आधारित मेरी प्रस्तुति एक विद्यार्थी की हैसियत से है।

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